पीएमओ बनाम चुनाव आयोग: चुनाव आयुक्तों की PMO के साथ बातचीत पर क्या है विवाद, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने क्यों उठाए सवाल
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Fri, 17 Dec 2021 01:54 PM IST
सार
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कानून मंत्रालय की ओर से भेजे एक सरकारी नोट में चुनाव आयुक्तों को पीएमओ की एक बैठक में मौजूद रहने को कहा गया था। जबकि चुनाव आयुक्तों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी स्वतंत्रता और तटस्थता बनाए रखने के लिए सरकार से दूरी बनाकर रखेंगे।
भारतीय चुनाव आयोग (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से 16 नवंबर को बुलाए गए वर्चुअल अनौपचारिक बातचीत में मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और दो चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और अनूप चंद्र पांडे शामिल हुए। चुनाव आयुक्तों के पीएमओ के साथ इस तरह की अनौपचारिक बातचीत को लेकर विवाद शुरू हो गया है। जहां एक तरफ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने इसे गैर सांविधानक बताया है, वहीं कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इस मुद्दे पर लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। मनीष तिवारी के मुताबिक चुनाव आयुक्तों का बैठक में शामिल होना बताता है कि संस्थानों की स्वायत्तता से समझौता किया गया है।
अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले महीने 16 नवंबर को हुई बैठक से कुछ दिनों पहले चुनाव आयोग को कानून मंत्रालय के एक अधिकारी से एक असामान्य पत्र मिला। जिसमें कहा गया कि प्रधान मंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ‘आम मतदाता सूची’ को लेकर एक बैठक की अध्यक्षता करेंगें और इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्त की उपस्थित की 'अपेक्षा' की जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक पत्र में इस तरह के शब्दों से चुनाव आयोग में हड़कंप मच गया क्योंकि इसे एक समन की तरह देखा गया जिससे संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन होता है।
भारतीय चुनाव आयोग (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से 16 नवंबर को बुलाए गए वर्चुअल अनौपचारिक बातचीत में मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा और दो चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और अनूप चंद्र पांडे शामिल हुए। चुनाव आयुक्तों के पीएमओ के साथ इस तरह की अनौपचारिक बातचीत को लेकर विवाद शुरू हो गया है। जहां एक तरफ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने इसे गैर सांविधानक बताया है, वहीं कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इस मुद्दे पर लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। मनीष तिवारी के मुताबिक चुनाव आयुक्तों का बैठक में शामिल होना बताता है कि संस्थानों की स्वायत्तता से समझौता किया गया है।
अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले महीने 16 नवंबर को हुई बैठक से कुछ दिनों पहले चुनाव आयोग को कानून मंत्रालय के एक अधिकारी से एक असामान्य पत्र मिला। जिसमें कहा गया कि प्रधान मंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा ‘आम मतदाता सूची’ को लेकर एक बैठक की अध्यक्षता करेंगें और इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्त की उपस्थित की 'अपेक्षा' की जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक पत्र में इस तरह के शब्दों से चुनाव आयोग में हड़कंप मच गया क्योंकि इसे एक समन की तरह देखा गया जिससे संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन होता है।
डा.एस वाई कुरैशी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त
- फोटो : Amar Ujala
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने पत्र मिलने के बाद कानून मंत्रालय को अपनी "नाराजगी" जाहिर की और यह बता दिया कि वह बैठक में शामिल नहीं होंगे। चंद्रा की तरह दोनों आयुक्त भी इस आधिकारिक वर्चुअल मीटिंग से दूर रहे और उनके अधीनस्थ अधिकारियों ने इसमें हिस्सा लिया। लेकिन इस बैठक के खत्म होने के बाद तीनों आयुक्त तुरंत मिश्रा के साथ अनौपचारिक बातचीत में शामिल हुए। सूत्रों ने कहा कि पीएमओ के साथ अनौपचारिक बातचीत के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को विभिन्न चुनावी सुधारों को मंजूरी दे दी, जिसे चुनाव आयोग संसद के चल रहे शीतकालीन सत्र में लाने पर जोर दे रहा था।
पीएमओ इस तरह की बैठक नहीं बुला सकता
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ एस वाई कुरैशी ने इस पूरे मामले पर गंभीर टिप्पणी की है। उन्होंने अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में कहा 'पीएमओ इस तरह किसी बैठक में चुनाव आयुक्तों को नहीं बुला सकता। औपचारिक बातचीत क्या होती है? सीईसी का पहला रिएक्शन अच्छा था, लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि वे अनौपचारिक बातचीत में शामिल हुए। चुनाव आयुक्तों की सरकार के साथ औपचारिक या अनौपचारिक कोई बातचीत नहीं हो सकती'।
यह गलत परंपरा
डॉ एस वाई कुरैशी के मुताबिक चुनाव आयोग ने सरकार से पहले कभी इस तरह की बातचीत नहीं की। यह एक गलत परंपरा है। हां, आयोग चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दलों की बैठकें जरूर बुलाता है और चुनाव की तारीखों और तैयारी को लेकर उनकी राय ली जाती है। इसमें सभी दलों की बात सुनी जाती है। कभी-कभी किसी खास मुद्दे पर अपनी बात लेकर राजनीतिक दल चुनाव आयोग भी आते रहे हैं।
चुनाव आयोग
- फोटो : social media
चुनाव आयोग एक स्वतंत्र सांविधानक संस्था
कुरैशी सवाल करते हैं, क्या पीएमो या पीएम खुद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को ऐसे बुला सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग बराबर है। चुनाव आयोग एक स्वंत्र सांविधानिक संस्था है और पीएमओ इस तरह चुनाव आयोग को बैठक में शामिल होने के लिए नहीं कह सकता है।
सांविधानक दायित्व पर सवाल
एक अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने नाम नहीं लिखे जाने की शर्त पर कहा 'पीछे से चुपके से इस बातचीत का क्या मतलब है? चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और सांविधानिक पद पर बैठे तीन आयुक्त यह सुनिश्चित करते हैं कि वे सरकार से दूरी बनाए रखें। लेकिन इस मामले में यह साफ दिखाई दे रहा है कि वे सरकार के साथ बातचीत में शामिल हो रहे हैं। पीएमओ के साथ बातचीत चाहे अनौपचारिक हो या औपचारिक आयुक्तों को अपने सांविधानिक उत्तरदायित्व को समझते हुए इस समय और सावधानी से (पांच राज्यों में चुनावों की घोषणा जल्द होनी है) व्यवहार करने की जरूरत थी। इससे निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने के आयोग के सांविधानिक दायित्व पर सवाल उठ सकता है'।
कांग्रेस ने उठाए सवाल
मीडिया रिपोर्ट के बाद कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। पार्टी ने पूछा कि चुनाव के निष्पक्ष होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए पूछा कि पीएमओ इस तरह नहीं कर सकता है। चुनाव आयोग के निष्पक्ष रहने की उम्मीद की जाती है। ना केवल उम्मीद की जाती है, बल्कि यह एक स्वतंत्र निकाय है। वे चुनाव आयोग को कैसे बुला सकते हैं? तब हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि चुनाव निष्पक्ष होंगे? पांच राज्यों में चुनाव होने हैं। हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि हमें आने वाले चुनावों में न्याय मिलेगा?
सांविधानिक संस्थाओं की गरिमा गिराने में जुटा केंद्र: सुरजेवाला
केंद्र पर निशाना साधते हुए कांग्रेस ने शुक्रवार को कहा कि मोदी सरकार निर्वाचन आयोग को अपने अधीनस्थ की तरह इस्तेमाल कर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, पीएमओ की ओर से बैठक बुलाकर सरकार ने एक बार फिर सांविधानिक संस्थाओं की गरिमा गिराने वाला काम किया है। यह सरकार निरंतर नीचे गिरती जा रही है। आज के पहले देश में कभी ऐसा नहीं हुआ जब कानून मंत्रालय ने पीएमओ की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में शामिल होने के लिए मुख्य निर्वाचन आयुक्त को निर्देशित किया हो। कानून मंत्रालय का पत्र असल में सीईसी को समन करने जैसा है।
यह चौंकाने वाली खबर: कुरैशी
पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी ने इस खबर पर कहा, यह बिलकुल चौंकाने वाली बात है। उनसे जब इसे और स्पष्ट करने को कहा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि मेरा यह प्रतिक्रिया पूरे मामले में समग्र और पर्याप्त है।