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श्रीलंकाई नागरिक की जमानत बरकरार: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की एनआईए की दलील; निचली अदालत का आदेश क्यों पलटा?

Tue, 27 Oct 2026 09:40 PM IST
निर्मल कांत पीटीआई, नई दिल्ली।

सार

यूएपीए के तहत विदेशी नागरिक को जमानत देने से सिर्फ इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता कि वह भारत का नागरिक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने श्रीलंकाई नागरिक की जमानत बरकरार रखते क्या कहा? पढ़िए रिपोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने पर रोक नहीं है। इसके लिए जरूरी है कि आरोपी भारत में पहली बार कानूनी और अधिकृत तरीके से आया हो।
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न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम पांचोली की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने आतंकवाद से जुड़े एक मामले में श्रीलंकाई नागरिक की जमानत रद्द करने के निचली अदालत के आदेश को खारिज कर दिया था।

शीर्ष कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने कहा, यूएपीए की धारा 43डी (7) के तहत विदेशी नागरिक को जमानत देने के लिए कड़ी शर्तें हैं। इसके बावजूद अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी भारत में पहली बार अवैध तरीके से आया था।
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पीठ ने कहा, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर सकी, जिससे पहली नजर में यह साबित हो कि आरोपी भारत में बिना अनुमति या अवैध तरीके से आया था। बाद में दर्ज एफआईआर में भी आरोप लगाया गया कि प्रतिवादी मोहम्मद रिफास उर्फ मोहम्मद रिगबास वैध वीजा पर भारत आया था। उसका वीजा समाप्त होने के बाद ही उसका भारत में रहना अवैध हुआ। इसी वजह से विदेशियों से संबंधित कानून के तहत जरूरी कार्यवाही शुरू की गई है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, हमारा सुविचारित मत है कि मौजूदा अपील में कोई दम नहीं है। इसलिए इसे खारिज किया जाता है। नतीजतन, आपराधिक अपील में मद्रास हाईकोर्ट की ओर से 12 दिसंबर, 2023 को पारित विवादित आदेश को बरकरार रखा जाता है।

किस आरोप में गिरफ्तार किया गया था आरोपी?
रिफास को धार्मिक समुदायों के बीच सद्भाव बिगाड़ने और सरकार के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

पीठ ने कहा कि यूएपीए की धारा 43डी (7) के तहत किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने का विरोध करने के लिए अभियोजन पक्ष को तीन शर्तें साबित करनी होती हैं। पहली शर्त यह है कि व्यक्ति पर यूएपीए के तहत दंडनीय अपराध का आरोप हो। दूसरी शर्त यह है कि वह व्यक्ति भारत का नागरिक न हो। तीसरी शर्त यह है कि उसने भारत में बिना अनुमति या अवैध तरीके से प्रवेश किया हो।

पीठ ने कहा, दूसरी और तीसरी शर्तें एक-दूसरे से जुड़ी हैं। इन्हें साथ पढ़ना जरूरी है, क्योंकि इनके बीच 'और' शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब है कि किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने से इनकार करने के लिए दोनों शर्तों का पूरा होना जरूरी है।

पीठ ने कहा, केवल किसी आरोपी का विदेशी नागरिक होना साबित कर देना, उसे जमानत देने से इनकार करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय यह भी साबित करना होगा कि उस विदेशी आरोपी ने भारत में पहली बार अवैध तरीके से या बिना अनुमति प्रवेश किया था। तभी जमानत से इनकार करने वाला यह प्रावधान लागू होगा।

एनएआईए ने क्या आरोप लगाया था?
एनआईए ने आरोप लगाया था कि आरोपी श्रीलंकाई नागरिक है। वह 2009 में भारत आया था और वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद भी यहां रुका रहा। एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया था कि उसने मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड समेत भारतीय पहचान से जुड़े दस्तावेज बनवा लिए थे। उसने शादी भी कर ली थी।

जांच एजेंसी तय कानूनी अवधि के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं कर सकी थी। इसके बाद जुलाई 2018 में निचली अदालत ने शुरुआत में उसे डिफॉल्ट जमानत दे दी थी। बाद में केंद्र सरकार ने निचली अदालत में उसकी जमानत रद्द करने की मांग की। सरकार की दलील थी कि आरोपी ने अपनी श्रीलंकाई नागरिकता की जानकारी छिपाई थी। निचली अदालत ने उसकी जमानत रद्द कर दी।

हालांकि, दिसंबर 2023 में मद्रास हाईकोर्ट ने निचली अदालत के इस आदेश को खारिज कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूएपीए के तहत विदेशी नागरिकों को जमानत दी जा सकती है। हालांकि, कानून में इसका अपवाद भी है। इसके तहत जमानत देने के लिए 'बहुत ही असाधारण परिस्थितियां' होनी चाहिए और 'कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना' जरूरी है। ये शर्तें धारा 43डी (7) के अंतिम हिस्से में दी गई हैं।

पीठ ने कहा, उक्त अभिव्यक्ति से यह स्पष्ट होता है कि ऊपर बताई गई तीनों शर्तें पूरी होने पर भी किसी विदेशी नागरिक को जमानत देने के लिए अपवाद बनाया जा सकता है। हालांकि, ऐसा अपवाद लागू करने की सीमा बेहद सख्त है। यह बात 'बहुत ही असाधारण परिस्थितियां' और 'कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना' जैसे दो शब्दों के इस्तेमाल से ही स्पष्ट होती है।

निचली अदालत के जमानत रद्द करने के अधिकार पर पीठ ने कहा कि अदालतों के पास जमानत रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति होती है। हालांकि, इस अदालत ने नए हालात पैदा होने की शर्त के बिना भी जमानत देने पर विचार करते समय अदालतों की शक्ति का दायरा बढ़ाया है। फिर भी, इस शक्ति का इस्तेमाल उचित तर्कों के आधार पर होना चाहिए। इसका मनमाने ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि मामला किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है।
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शीर्ष कोर्ट ने कहा, अभियोजन पक्ष को उस स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जब तक कि निष्पक्ष सुनवाई से जुड़ा कोई अत्यंत महत्वपूर्ण हित खतरे में पड़ने की आशंका न हो। 


 
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