देशभर में लगातार हो रही बारिश ने सिर्फ जनजीवन को ही बुरी तरह अस्त-व्यस्त नहीं किया है, बल्कि इसने कई जिंदगियों को लील लिया, परिवारों को बेघर कर दिया और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। बिहार और असम में भीषण बाढ़ के एक महीने बाद ही दक्षिण और पश्चिमी राज्यों में मूसलाधार बारिश हो रही है और ये बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। आइए जानते हैं किन इलाकों ने बाढ़ का कहर झेला और क्यों हर साल यह सिलसिला जारी है।
जोरदार मानसूनी बारिश से उत्तर और मध्य केरल के 14 जिलों में भीषण बाढ़ आ गई। बारिश से कम से कम भूस्खलन के 83 मामले सामने आए। राज्यभर में ढाई लाख से ज्यादा प्रभावित लोगों को 1,332 राहत शिविरों में पहुंचाया गया।
महाराष्ट्र
मृतकों की संख्या - 43
पुणे समेत 10 जिलों में बारिश ने कहर ढाया। कोल्हापुर और सांगली जिले सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए। करीब 4.5 लाख लोगों को बचाव दल ने 372 राहत शिविरों में पहुंचाया। बाढ़ की वजह से मुंबई-बंग्लूरू राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 4 को बंद कर दिया गया। जिसकी वजह से दोनों ओर हजारों वाहनें सड़क में फंस गईं।
कर्नाटक
मृतकों की संख्या - 48
कम से कम 17 तटीय और उत्तरी जिले प्रभावित हुए। कम से कम पांच लाख लोगों को जगह खाली करा कर 1,168 राहत शिविरों में पहुंचाया गया। शुरुआती अनुमान के मुताबिक करीब 4.2 लाख हेक्टेयर खेती की जमीन बर्बाद हो गई।
गुजरात
मृतकों की संख्या - 31
मध्य गुजरात और सौराष्ट्र के इलाकों में मूसलाधार बारिश हुई। अकेले वडोदरा में महज 24 घंटों में रिकॉर्ड 50 से.मी. बारिश दर्ज की गई। वडोदरा में सड़क, रेल और हवाई यातायात को रोकना पड़ा। नाव के जरिए बचाव अभियान जारी रहा और भारतीय वायुसेना के जवानों ने सैकड़ों लोगों को एयरलिफ्ट किया।
उत्तराखंड
मृतकों की संख्या - 6
मानसूनी बारिश और खासतौर पर चमोली जिले में हुई भारी बारिश से भूस्खलन हुआ जिसमें कई लोगों की जान चली गई।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक ये आंकड़े 12 अगस्त तक के हैं।
भारत में बाढ़ आना कोई नई बात नहीं है
भारत में हर साल बाढ़ आती है, लेकिन साल दर साल आपदा प्रबंधन के लिहाज से कोई नए कदम नहीं उठाए गए। भारत के लगभग 15 फीसदी भू-भाग पर बाढ़ का खतरा मंडराता रहता है। साल में 2000 लोगों की जान चली जाती है और 80 लाख हेक्टेयर खेती की जमीन बर्बाद हो जाती है जिससे करीब 1,800 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। अभी एक महीने पहले ही बिहार और असम में आई बाढ़ से 175 लोगों की मौत हो गई और करीब एक करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए।
लेकिन सरकार फिर भी कदम नहीं उठाती
भले ही रिकॉर्ड तोड़ बारिश के मत्थे भीषण बाढ़ का ठीकरा फोड़ा जा सकता है लेकिन कमजोर योजना और प्रबंधन को भी कम जिम्मेवार नहीं माना जा सकता। सरकार बाढ़ से बचाव के लिए जितना खर्च करती है उससे कही ज्यादा वह बाढ़ के बाद मुआवजा देने में खर्च कर देती है।
सरकारी एजेंसियों को मौसम के अतिवादी रवैया को भांपने के लिए पूर्वानुमान के तकनीकों को अपनाना चाहिए। बड़े पैमाने पर खनन और उत्खनन, खासतौर पर पर्वतीय इलाकों में, की वजह से भूस्खलन होते हैं (जैसे केरल के वायनाड में हुआ)। वहीं नदियों में बालू के उत्खनन के कारण बाढ़ प्रभावित इलाके का दायरा बढ़ जाता है।
2017 की कैग रिपोर्ट में पाया गया कि 219 नियोजित टेलीमेट्री स्टेशन, जिससे बाढ़ की भविष्यवाणी की जाती है, केवल 56 स्थापित किए गए थे और 60 प्रतिशत मौजूदा स्टेशनों में काम नहीं होता।