केंद्र सरकार ने किसानों की ज्यादातर मांगों पर अपनी सहमति दे दी है। कृषि कानूनों की वापसी के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य के सबसे जटिल मुद्दे पर भी समाधान खोजने के लिए एक कमेटी के गठन का ऐलान कर दिया गया है जिसमें कृषि विशेषज्ञों के साथ-साथ सरकार के प्रतिनिधि और किसान नेता भी शामिल होंगे।
सरकार का अनुमान है कि इस कमेटी के गठन के साथ ही किसानों की नाराजगी खत्म हो जाएगी और वे अपने घरों को लौट जाएंगे। लेकिन खबर है कि किसान केवल एमएसपी कमेटी के गठन से ही आश्वस्त होने को तैयार नहीं हैं। वे इसके स्वरूप, अधिकार और सदस्यों के नाम तय होने के बाद ही आंदोलन के भविष्य को लेकर कोई अंतिम निर्णय करेंगे।
संयुक्त किसान मोर्चा के नेता अविक साहा ने अमर उजाला को बताया कि कृषि मंत्री की एमएसपी पर कमेटी के गठन की घोषणा के 24 घंटे बीत जाने के बाद भी अब तक उनसे बातचीत की कोई पहल नहीं की गई है। अभी उन्हें कमेटी के स्वरूप, अधिकार और उसके सदस्यों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में केवल कमेटी के गठन की घोषणा पर आंदोलन के भविष्य पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता।
किसान नेता ने कहा कि पूर्व में भी सरकारें कमेटियों का गठन कर किसी संवेदनशील मुद्दे को हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डालने का नुस्खा आजमाती रही हैं। किसानों के मुद्दों पर भी इसके पहले अनेक कमेटियां गठित की गई हैं। कमेटियों के गठन के बाद मामला शांत पड़ जाता है। सरकारें कमेटियों की अनुशंसाओं को लागू करने की कोशिश नहीं करतीं। इससे स्थिति जस की तस बनी रहती है। उन्होंने कहा कि स्वामीनाथन आयोग ही अपने आप में पर्याप्त था। यदि उसकी अनुशंसाओं को ही लागू कर दिया गया होता तो आज किसानों को आंदोलन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
किसान अब इस प्रस्तावित कमेटी को भी स्वामीनाथन आयोग की तरह केवल सिफारिश तक नहीं ले जाना चाहते, बल्कि अब कमेटी के गठन के समय उसकी अनुशंसाओं को लागू कराने के विकल्पों के बारे में भी बातचीत की जाएगी। इससे इस मामले का स्थाई समाधान निकल सकेगा।