यहां बात किसानों की हो रही है। केंद्र सरकार ने अपनी इस सोच के साथ तीनों बिल लोकसभा में पेश कर दिए कि निजीकरण में ही शांति है, लाभ है। किसानों को व्यापारियों के अधीन कर दो। लोकसभा में ये बिल पारित भी हो गए। राहुल गांधी ने इन अध्यादेशों को 'काला कानून' कहा है। हमें किसानों के प्रतिनिधि कह लो या उनके नेता, कुछ भी मान लो, एक सवाल हमारा भी है। पीएम या उनके मंत्री बता दें कि 'काले कानून' का खाका तैयार करने से पहले क्या उनकी किसान से बात हुई थी। एक किसान या उनके प्रतिनिधि का नाम बता दें।
एआईकेएससीसी के सदस्य अविक के अनुसार, कोरोना काल में अचानक सरकार को किसानों की याद कैसे आ गई। उनके बुनियादी ढांचे में बदलाव करने के लिए सरकार ने आखिर यही वक्त क्यों चुना है। सरकार झूठ बोल रही है कि नए कानूनों के बाद एमएसपी और मंडी बनी रहेगी। न मंडी रहेगी और न एमएसपी मिलेगा।
अभी तक छह फीसदी किसानों को एमएसपी मिल रहा है, सरकार ने हर किसान को एमएसपी देने के लिए कदम क्यों नहीं उठाया। भाजपा को अपना यह कदम पीछे हटाना पड़ेगा। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, झारखंड, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु और दूसरे सभी राज्यों में 25 सितंबर को बंद का व्यापक असर देखने को मिलेगा।
कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (संरक्षण एवं सशक्तिकरण) बिल और आवश्यक वस्तु संशोधन बिल को लेकर राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर हमला बोला है। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा, मोदी जी ने किसानों की आय दुगनी करने का वादा किया था, लेकिन मोदी सरकार के ‘काले’ कानून किसान-खेतिहर मजदूर का आर्थिक शोषण करने के लिए बनाए जा रहे हैं। ये 'जमींदारी' का नया रूप है और मोदी जी के कुछ ‘मित्र’ नए भारत के ‘जमींदार’ होंगे।
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसान विधेयक पर ट्वीट किया और कहा कि लोकसभा में ऐतिहासिक कृषि सुधार विधेयकों का पारित होना देश के किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है। ये विधेयक सही मायने में किसानों को बिचौलियों और तमाम अवरोधों से मुक्त करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ये बिल किसानों को सशक्त बनाएगा। इस कृषि सुधार से किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए नए-नए अवसर मिलेंगे, जिससे उनका मुनाफा बढ़ेगा। इससे हमारे कृषि क्षेत्र को जहां आधुनिक टेक्नोलॉजी का लाभ मिलेगा, वहीं अन्नदाता सशक्त होंगे।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि किसानों को भ्रमित किया जा रहा है। इस काम में बहुत सारी शक्तियां लगी हुई हैं। मैं अपने किसान भाइयों और बहनों को आश्वस्त करता हूं कि एमएसपी और सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रहेगी। ये विधेयक वास्तव में किसानों को कई और विकल्प प्रदान कर उन्हें सही मायने में सशक्त करने वाले हैं।
कांग्रेस पार्टी के नेता जयराम रमेश का कहना है कि किसान को खेत के नजदीक स्थित अनाज मंडी-सब्जी मंडी में उचित दाम किसान के सामूहिक संगठन तथा मंडी में खरीददारों के परस्पर मुकाबले के आधार पर मिलता है। मंडी में पूर्व निर्धारित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ किसान की फसल के मूल्य निर्धारण का बेंचमार्क है। यही एक उपाय है, जिससे किसान की उपज की सामूहिक तौर से ‘प्राइस डिस्कवरी’ यानि मूल्य निर्धारण हो पाता है।
अनाज-सब्जी मंडी व्यवस्था किसान की फसल की सही कीमत, सही वजन व सही बिक्री की गारंटी है। अगर किसान की फसल को मुट्ठीभर कंपनियां मंडी में सामूहिक खरीद की बजाय उसके खेत से खरीदेंगे, तो फिर मूल्य निर्धारण, वजन व कीमत की सामूहिक मोलभाव की शक्ति खत्म हो जाएगी। स्वाभाविक तौर से इसका नुकसान किसान को होगा। सरकार कह रही है कि किसान अपनी फसल देश में कहीं भी बेच सकता है, पूरी तरह से सफेद झूठ है। आज भी किसान अपनी फसल किसी भी प्रांत में ले जाकर बेच सकता है।
देश में 86 फीसदी किसान पांच एकड़ से कम भूमि के मालिक हैं। जमीन का औसत मालिकाना हक दो एकड़ या उससे भी कम है। ऐसे में 86 फीसदी किसान अपनी उपज नजदीक अनाज मंडी-सब्जी मंडी के अलावा कहीं दूसरी जगह पर ट्रांसपोर्ट के जरिए न तो ले जा सकता है और न ही बेच सकता है।
मंडी प्रणाली नष्ट होते ही सीधा प्रहार स्वाभाविक तौर से किसान पर होगा। मंडियां खत्म होते ही अनाज-सब्जी मंडी में काम करने वाले लाखों-करोड़ों मजदूरों, आढ़तियों, मुनीम, ढुलाईदारों और ट्रांसपोर्टरों आदि की रोजी रोटी और आजीविका अपने आप खत्म हो जाएगी। सरकार एक जिद पूरी कर रही है। अगर यह कानूना इतना ही अच्छा होता है तो किसान संगठन इसके विरोध में नहीं खड़े होते।