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Farm Laws: क्या भाजपा ने विपक्ष के हाथों से छीन लिया मुद्दा, जानिए पंजाब में अब किसका हो सकता है नुकसान?

प्रतिभा ज्योति
Updated Fri, 19 Nov 2021 01:57 PM IST

सार

विवादित कृषि कानून का मुद्दा न केवल सरकार के खिलाफ विपक्ष के लिए एक बड़ा हथियार था, बल्कि वह धागा भी था जो विपक्षी दलों को एकजुट किए हुए था और विपक्षी एकता का आधार था। किसान आंदोलन को भुनाने की कोशिश कर रहे विपक्ष के लिए मोदी सरकार का यह दांव एक बड़ा झटका है क्योंकि कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा का समय बहुत कुछ बताता है।
 
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नरेंद्र मोदी- प्रियंका-अखिलेश- कृषि कानूनों की वापसी से छीनगया मुद्दा
कहां तो विपक्ष खुश थी कि चुनाव में किसान आंदोलन को बड़ा मुद्दा बनाकर अगले साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ  नकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश की जाएगी, लेकिन शुक्रवार की सुबह जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापिस लेने की घोषणा की विपक्षी कैंप में मायूसी फैल गई।

हालांकि पीएम के फैसले के बाद ताबड़तोड़ विपक्ष की प्रतिक्रिया आने लगी लेकिन जब सुबह पीएमओ का ट्वीट आया कि प्रधानमंत्री मोदी सुबह नौ बजे देश को संबोधित करेंगे तो किसी को अंदाजा नहीं था वे एक बहुत बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेलने जा रहे हैं जो  विपक्ष को निशस्त्र कर देगा। राजनीति के जानकार कहते हैं पीएम की कुछ मिनट के संबोधन ने एक साल से सरकार को घेरने के लिए बनी और बनाई जा रही विपक्ष की रणनीति के चक्रव्यूह को एक झटके में तोड़ दिया। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल और कांग्रेस की सारे सियासी समीकरण इस एक फैसले से बिगड़ गए हैं। 


कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर पिछले एक साल से कई किसान संगठन दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर आंदोलन कर रहे हैं। इन कानूनों को लेकर सरकार पिछले एक साल से विपक्ष के निशाने पर थी। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में आंदोलनकारी किसान संगठनों ने खुलेआम भाजपा के खिलाफ अभियान चलाया। कृषि कानूनों का सबसे बड़ा विरोध पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में हो रहा था। किसानों में आक्रोश इस बात को लेकर था और कई गांवों में भाजपा नेताओं को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था। कई केंद्रीय मंत्रियों को भी विरोध का सामना करना पड़ रहा था। कृषि कानूनों का विरोध करने के नाम पर कुछ अराजक तत्वों ने भाजपा नेताओं की पिटाई की घटनाओं को भी अंजाम दिया।

 
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नरेंद्र मोदी- प्रियंका-अखिलेश- कृषि कानूनों की वापसी से छीनगया मुद्दा
कहां तो विपक्ष खुश थी कि चुनाव में किसान आंदोलन को बड़ा मुद्दा बनाकर अगले साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ  नकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश की जाएगी, लेकिन शुक्रवार की सुबह जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापिस लेने की घोषणा की विपक्षी कैंप में मायूसी फैल गई।

हालांकि पीएम के फैसले के बाद ताबड़तोड़ विपक्ष की प्रतिक्रिया आने लगी लेकिन जब सुबह पीएमओ का ट्वीट आया कि प्रधानमंत्री मोदी सुबह नौ बजे देश को संबोधित करेंगे तो किसी को अंदाजा नहीं था वे एक बहुत बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेलने जा रहे हैं जो  विपक्ष को निशस्त्र कर देगा। राजनीति के जानकार कहते हैं पीएम की कुछ मिनट के संबोधन ने एक साल से सरकार को घेरने के लिए बनी और बनाई जा रही विपक्ष की रणनीति के चक्रव्यूह को एक झटके में तोड़ दिया। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल और कांग्रेस की सारे सियासी समीकरण इस एक फैसले से बिगड़ गए हैं। 

कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर पिछले एक साल से कई किसान संगठन दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर आंदोलन कर रहे हैं। इन कानूनों को लेकर सरकार पिछले एक साल से विपक्ष के निशाने पर थी। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में आंदोलनकारी किसान संगठनों ने खुलेआम भाजपा के खिलाफ अभियान चलाया। कृषि कानूनों का सबसे बड़ा विरोध पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में हो रहा था। किसानों में आक्रोश इस बात को लेकर था और कई गांवों में भाजपा नेताओं को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था। कई केंद्रीय मंत्रियों को भी विरोध का सामना करना पड़ रहा था। कृषि कानूनों का विरोध करने के नाम पर कुछ अराजक तत्वों ने भाजपा नेताओं की पिटाई की घटनाओं को भी अंजाम दिया।

 

मुजफ्फरनगर में जीआईसी मैदान में राकेश टिकैत ने रैली की थी (फाइल फोटो) - फोटो : amar ujala
यहां तक कि मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके थे। 2014, 2017 और 2019 के चुनावों में भाजपा की जबरदस्त सफलता के पीछे एक बड़ा हाथ पश्चिमी यूपी के जाट समुदाय का था। लेकिन तीनों कृषि कानूनों के कारण यह समुदाय भाजपा से इतना नाराज बताया जा रहा था कि वह 2022 के चुनाव में सबक सिखाने को तैयार हो गया। लेकिन अब भाजपा कृषि कानूनों को वापस लेकर डैमेज कंट्रोल में कामयाब हो सकती है।

नुकसान की भरपाई कर लेगी भाजपा
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार बताते हैं तीनों कृषि कानूनों को वापिस लेने की बात से भाजपा ने एक झटके में विपक्ष के हाथों से मुद्दा छीन लिया है। विपक्ष इस कानूनों और किसान आंदोलन को लेकर उत्तर प्रदेश खासकर पश्चिमी यूपी की सियासत गरमाए हुए था और चुनाव में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की उनकी तैयारी में थी, लेकिन किसान वोट बैंक के नजरिए से देखें तो भाजपा ने उस नुकसान को कवर अप कर लिया है, लेकिन ऐसा नहीं है कि चुनाव में यह मुद्दा बिल्कुल नगण्य या शून्य हो जाएगा।

संजय कुमार कहते हैं वैसे विपक्ष चाहे तो आंदोलन के दौरान किसानों के साथ हुई त्रासदी और सैंकड़ों किसानों की मौत को अभी भी मुद्दा बना सकता है और सरकार को घेर सकता है, लेकिन यदि तब तक किसान अपने घर लौट जाते हैं तो फिर यह मुद्दा प्रभावहीन हो और बेअसर हो जाएगा। 

2024 के लिए 2022 में यूपी में कमल खिलना जरूरी
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विशेषकर जाट समुदाय में भाजपा के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश था, जो विधानसभा चुनाव में पार्टी को भारी पड़ सकता था। देर से ही सही, लेकिन भाजपा ने चुनाव से ठीक पहले कृषि कानूनों, खासकर पश्चिमी यूपी को वापस लाने की कोशिश की है। संजय कुमार कहते हैं भाजपा जानती है कि मिशन 2024 के लिए 2022 में भी यूपी में कमल खिलना बहुत जरूरी है।


 

अमित शाह के साथ कैंप्टन अमरिंदर सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : PTI (File Photo)
पंजाब में भाजपा को कितना फायदा ? 
पंजाब की राजनीति के जानकार एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कृषि कानूनों की वजह से ही भाजपा और अकाली दल के ढाई दशक के रिश्ते टूट गए जिसकी बदौलत भाजपा पंजाब में राजनीति करती रही। अब कानून वापस लेने के बाद भाजपा को पंजाब में अपने लिए एक ठोस जमीन तैयार करने का मौका मिला है। तीनों कृषि कानूनों का वापिस लिए जाने की घोषणा करने से पार्टी को पंजाब में सबसे ज्यादा फायदा हो सकता है। इसमें कैप्टन अमरिंदर सिंह मददगार साबित हो सकते हैं। जल्दी ही पंजाब में एक नई सियासत की शुरुआत हो सकती है।

दो महीने पहले जब कैप्टन ने मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कांग्रेस के खिलाफ बगावत की थी, तो ऐसी अटकलें थीं कि मोदी सरकार कृषि कानूनों को वापस ले सकती है और पंजाब कांग्रेस में मची उथल-पुथल को राज्य में अपने आधार के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। वैसे कृषि कानूनों को वापस लेने से भाजपा और अकाली के एक साथ आने के दरवाजे भी खुल गए हैं। हालांकि 2022 के पंजाब चुनाव में इसकी संभावना कम है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इन पुराने दोस्तों को एक बार फिर साथ देखा जा सकता है।

कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगेगा
संजय कुमार कहते हैं कि कृषि कानून वापिस लेने का सबसे बड़ा फायदा अमरिंदर सिंह को होगा और सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस का। कांग्रेस से इस्तीफा देते समय कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा था कि यदि किसानों का मुद्दा सुलझ जाता है तो वे भाजपा के साथ गठबंधन के लिए तैयार हैं। तब से कयास लगाए जा रहे थे कि कृषि कानूनों पर केंद्र सरकार बड़ा फैसला ले सकती है। निश्चित रूप से अमरिंदर सिंह इसका श्रेय लेने की कोशिश करेगी और भाजपा इस बात को काटेगी नहीं। दूसरी तरफ कांग्रेस इस बात से आश्वस्त थी कि किसान आंदोलन के कारण भाजपा यहां अपना जनाधार नहीं बना पाएगी लेकिन अब कांग्रेस को राज्य में नए सिरे से अपनी रणनीति बनानी होगी।

 
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