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एक्सप्लेनर : क्या जीएसटी के दायरे में आने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम हो जाएंगी?

अमित शर्मा
Updated Sun, 24 Oct 2021 06:27 PM IST

सार

पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अन्दर लाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि देश को पेट्रोल-डीजल की बेतहाशा महंगाई से बचाने का यही एकमात्र रास्ता बचा है।
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पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। - फोटो : अमर उजाला
पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान पर हैं और इसकी महंगाई से पूरा औद्योगिक क्षेत्र चरमरा रहा है। परिवहन की बढ़ी लागत के कारण उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में बेतहाशा वृद्धि हुई है तो मांग कम होने से व्यापार भी लगभग ठप पड़ गया है। इसे देखते हुए पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अन्दर लाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि देश को पेट्रोल-डीजल की बेतहाशा महंगाई से बचाने का यही एकमात्र रास्ता बचा है। लेकिन क्या पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अंदर लाना इतना आसान है? इस राह में अड़चनें क्या हैं और इसका बाज़ार पर क्या असर देखने को मिल सकता है?   

अखिल भारतीय व्यापार मंडल के अध्यक्ष सदीप बंसल ने कहा है कि पेट्रोल-डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि से बाज़ार ठप पड़ गया है। नवरात्रि-दशहरा और दीवाली का त्योहारी सीजन होने के बाद भी ग्राहक बाज़ार से दूर है क्योंकि उसके हाथ में खर्च करने के लिए पैसा नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार पेट्रोल कीमतों को जीएसटी के अन्दर लाती है तो इससे महंगाई पर अंकुश लगेगी और बाज़ार में गति आएगी।   
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पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। - फोटो : अमर उजाला
पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान पर हैं और इसकी महंगाई से पूरा औद्योगिक क्षेत्र चरमरा रहा है। परिवहन की बढ़ी लागत के कारण उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में बेतहाशा वृद्धि हुई है तो मांग कम होने से व्यापार भी लगभग ठप पड़ गया है। इसे देखते हुए पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अन्दर लाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि देश को पेट्रोल-डीजल की बेतहाशा महंगाई से बचाने का यही एकमात्र रास्ता बचा है। लेकिन क्या पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अंदर लाना इतना आसान है? इस राह में अड़चनें क्या हैं और इसका बाज़ार पर क्या असर देखने को मिल सकता है?   

अखिल भारतीय व्यापार मंडल के अध्यक्ष सदीप बंसल ने कहा है कि पेट्रोल-डीजल के दामों में बेतहाशा वृद्धि से बाज़ार ठप पड़ गया है। नवरात्रि-दशहरा और दीवाली का त्योहारी सीजन होने के बाद भी ग्राहक बाज़ार से दूर है क्योंकि उसके हाथ में खर्च करने के लिए पैसा नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार पेट्रोल कीमतों को जीएसटी के अन्दर लाती है तो इससे महंगाई पर अंकुश लगेगी और बाज़ार में गति आएगी।   

कितनी व्यावहारिक है ये मांग

दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर डॉ. देवेश बीरवाल ने अमर उजाला को बताया कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से पहले कई पहलुओं पर गहराई से विचार-विमर्श की आवश्यकता है। नई कर निर्धारण नीति के बाद राज्यों के पास आय के साधन बहुत सीमित रह गए हैं। वैट व्यवस्था लागू करने के बाद भी राज्यों की कमाई में कमी आई है। चूंकि, कल्याणकारी योजनाओं में निवेश के लिए राज्यों को भी धन की बहुत अधिक आवश्यकता होती है, राज्यों की आय सुनिश्चित किये बिना पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाना एक उचित कदम नहीं कहा जा सकता। संभवत: यही कारण है कि लखनऊ में जीएसटी काउंसिल की बैठक में राज्यों ने ही पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अन्दर लाने से इनकार कर दिया। 

सभी राज्यों की आर्थिक और सामाजिक स्थितियां अलग-अलग हैं। दिल्ली, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य अपेक्षाकृत ज्यादा विकसित हैं, बेहतर आर्थिक ढांचा विकसित होने के कारण उनके पास पेट्रोल पर टैक्स के अलावा आय के दूसरे अनेक संसाधन उपलब्ध हैं। वहीं ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य विकास की दौड़ में पीछे हैं। पेट्रोल-डीजल पर टैक्स के अलावा अन्य संसाधनों से कमाई के इनके स्रोत बेहद कम हैं। जबकि इन राज्यों में कल्याणकारी योजनाओं में निवेश की आवश्यकता कहीं ज्यादा है।

ऐसे में जीएसटी की किसी एक नीति में अलग-अलग आर्थिक-सामाजिक स्थितियों वाले राज्यों को लाना बहुत उपयुक्त नहीं होगा। लेकिन, यदि केंद्र और राज्य सरकारें विचार-विमर्श के बाद जमा टैक्स के एक सुविचारित वितरण की उपयुक्त व्यवस्था बना सकें तो इस पर विचार किया जाना चाहिए। यह तरीका पेट्रोल कीमतों को कम करने का माध्यम बन सकता है, लेकिन इसके कारण अन्य आवश्यक कार्यों पर असर भी नहीं पड़ना चाहिए, इसका ध्यान रखा जाना चाहिए।  

महंगाई पर लगाम नहीं लगी तो विकास दर होगी प्रभावित

डॉ. देवेश बीरवाल ने कहा कि पेट्रोल-डीजल की महंगी कीमतें परिवहन की लागत के साथ-साथ कई रूपों में औद्योगिक क्षेत्रों की लागत बढ़ाती हैं। चीजों के दाम बढ़ने से उद्योगों को अपेक्षित लाभ मिलने की संभावना कम रह जाती है। यही कारण है कि महंगाई होने पर उद्योगपति निवेश करने से बचने लगते हैं, इससे विकास की गति ठहरने का खतरा पैदा हो जाता है। विकास दर बनाये रखने के लिए सरकार को महंगाई पर नियंत्रण करने के उपाय करने चाहिए। 

इसका कुछ असर इस समय बाज़ार में दिखने भी लगा है। इस समय ब्याज दरें अपने सबसे निचले स्तर पर हैं, लेकिन इसके बाद भी औद्योगिक क्षेत्र कर्ज लेने और नया निवेश करने से बच रहे हैं। महंगाई बढ़ने से लोगों की बचत प्रभावित होती है और खर्च करने की क्षमता में कमी आ जाती है। इससे वस्तुओं की बिक्री कम होती है और मांग में कमी आती है। इससे पूरी प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। सुझाव है कि सभी क्षेत्रों की विकास दर बनाये रखने के लिए सरकार को महंगाई पर अविलंब अंकुश लगाना चाहिए।  

जनता के कल्याण के लिए ही पैसे का उपयोग

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और आर्थिक मामले के जानकार राजीव जेटली ने कहा कि इस समय सरकार सड़कों के निर्माण, बेघरों को आवास देने, हर घर तक टोंटी से जल देने, 80 करोड़ से अधिक परिवारों को निःशुल्क राशन उपलब्ध कराने, लगभग 10 करोड़ किसान परिवारों को प्रतिवर्ष छ: हजार रूपये की आर्थिक सहायता देने, पूरे देश को निःशुल्क कोरोना टीका लगाने और अस्पतालों-मेडिकल कालेजों के निर्माण में भारी धन खर्च कर रही है। यह धन इन्हीं टैक्सों से आता है। इसके बिना ये सभी सामाजिक कार्य बाधित हो जाएंगे, लिहाजा सरकार को एक उचित टैक्स प्रणाली अपनाने की जरूरत पड़ती है।

उन्होंने कहा कि जनता को यदि यह विश्वास हो कि उसके दिए टैक्स का उचित कार्यों में इस्तेमाल होगा तो वह इसे गलत नहीं मानती। चूंकि जनता केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की जनहितकारी कार्यों को देख-सुन रही है, यही कारण है कि लोग सरकार के साथ हैं।

पेट्रोल कीमतों में कमी के ये उपाय दिखाएंगे असर

केंद्र सरकार ने सरकारी और प्राइवेट कंपनियों को एक पूल बनाकर एक साथ क्रूड आयल खरीदने का प्रस्ताव किया है। अनुमान है कि इससे थोक में भारी मात्रा में क्रूड आयल की खरीद होगी और इसके दाम अपेक्षाकृत कम होंगे। दूसरे, केंद्र सरकार ने अपने रिज़र्व आयल का इस्तेमाल करने का निर्णय ले लिया है। इससे तेल की खरीद में कमी करने और कीमतों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। 
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