खास बात ये है कि अभी तक घाटी में मौजूद ज्यादातर आतंकी संगठनों का संबंध पाकिस्तान से रहा है। यह अलग बात है कि वे पाकिस्तान के मार्फत ही अफगानिस्तान में ट्रेनिंग लेने के लिए जाते रहे हैं। कश्मीर में दो नए आतंकी संगठनों के नाम सामने आए हैं। इनमें एक है द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) और दूसरा तहरीक-ए-मिल्लत-ए-इस्लामी (टीएमआई) है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, इन संगठनों की हिजबुल मुजाहिदीन के साथ नहीं बनती। पिछले दिनों कश्मीरी पुलिस वालों और आम नागरिकों पर हमला करने के मामले में ये आतंकी संगठन आमने-सामने हो चुके हैं।
टीआरएफ जैसे आतंकी संगठन का कहना था कि आम कश्मीरी लोगों और लोकल पुलिस वालों को मारकर वे घाटी में ज्यादा दिन तक नहीं चल सकते। इसके लिए उन्हें कॉमन प्रोग्राम पर चलना होगा। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि 'टीआरएफ' पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तयैबा का ही फ्रंटल ऑर्गेनाइजेशन है। काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद भाजपा के पूर्व महासचिव और आरएसएस की मौजूदा कार्यकारिणी के सदस्य राम माधव ने एक ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने लिखा था कि पाकिस्तान का बनाया तालिबान भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है। आईएसआई की ट्रेनिंग वाले 30 हजार से ज्यादा लड़ाकों को तालिबान कहीं और भी भेज सकता है।
जानकारों का कहना है कि भाजपा नेता का इशारा कश्मीर की तरफ रहा है। इसके बाद मध्यप्रदेश भाजपा के प्रभारी मुरलीधर राव भी ऐसा ही ट्वीट कर दिया। उन्होंने लिखा, सच तो यह है कि युद्ध तो अभी शुरू हुआ है। यह भारत के लिए खतरे की घंटी है। अगर कोई मानता है कि युद्ध खत्म हो गया है तो वह मूर्खता होगी। भारत को तैयार रहना होगा। सुरक्षा बलों के अनुसार, लश्कर-ए-तयैबा और कश्मीरी आतंकी संगठन हरकत उल अंसार के आतंकी अफगानिस्तान के ट्रेनिंग कैंपों में जाते रहे हैं।
ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) बताते हैं, यह बात सही है कि तालिबान के आने के बाद अब आतंकी संगठनों को यह लग रहा है कि उन्हें भारी मदद मिल जाएगी। कम से कम जम्मू-कश्मीर में ऐसा नहीं होगा। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला तो ये है कि आतंकी हमलों को लेकर भारतीय सुरक्षा बल पूरी तरह मुस्तैद हैं। घाटी में दशकों से चला आ रहा आतंकवाद अब अपने अंत की तरफ जा रहा है। साल 1993 के दौरान भी अफगान आतंकियों ने कश्मीर में दाखिल होने का प्रयास किया था। वे कामयाब नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें स्थानीय सहयोग नहीं मिल पाया। कोई भी तंजीम हो, उसके आतंकी तभी तक जिंदा हैं, जब तक उन्हें स्थानीय सहयोग मिल रहा है। जिस दिन यह सपोर्ट खत्म हो जाता है, आतंकी संगठन भी वहां से चले जाते हैं या सुरक्षा बलों की गोली का निशाना बन जाते हैं।
पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को कश्मीर घाटी में सपोर्ट मिलती रही है। वजह, वे महिलाओं और बच्चों के साथ कुछ गलत नहीं करते थे। नतीजा, उन्हें स्थानीय सहयोग मिल जाता था। दूसरी तरफ अफगान आतंकी जो कि अब तालिबान के कहने पर चलेंगे, उन्हें घाटी में कोई पसंद नहीं करता है। तालिबानी आतंकी, महिलाओं के साथ बलात्कार और बच्चों का यौन शोषण करते हैं, इस वजह से उन्हें घाटी में जगह नहीं मिलेगी।