कर्नल पुरी कहते हैं कि आतंकियों के साए में चलने वाली इमरान सरकार ने अफगानिस्तान की पंजशीर घाटी में गृह युद्ध को भड़काने के लिए अल-कायदा और हक्कानी नेटवर्क को सक्रिय कर दिया। उनका कहना है कि तालिबानी पंजशीर घाटी में कब्जा नहीं जमा पा रहे थे, तो उनकी मदद के लिए उन्हें अल-कायदा और हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तानी सैन्य उपकरणों के साथ सक्रिय करना पड़ा। वह बताते हैं कि इस वक्त के ताजा हालात जो पंजशीर घाटी में बने हैं वह सिर्फ पाकिस्तान के सैन्य उपकरणों की वजह से ही बने हुए हैं।
पाकिस्तान ने तालिबानियों के साथ सैन्य मदद का भरोसा देकर एक तरह से अहसान भी जताया और अपने आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क और अलकायदा को सक्रिय भी कर दिया। क्योंकि हक्कानी नेटवर्क और अलकायदा के बीच सब कुछ ठीक नहीं है, ऐसे में आईएसआई चीफ का सीधे तौर पर दखल देने का मतलब स्पष्ट है कि वह मध्यस्थता के लिए ही काबुल में बैठा है ताकि अफगानिस्तान में सिर्फ पाकिस्तान की ही चले।
विदेश मामलों के जानकारों का कहना है की पाकिस्तान को सैन्य उपकरणों की खरीद-फरोख्त के लिए अमेरिका को अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ती है। क्योंकि पाकिस्तान के पास वित्तीय व्यवस्थाएं ऐसी नहीं हैं कि अत्याधुनिक हथियारों और गोला-बारूद का जखीरा बड़ी मात्रा में अमेरिका, चीन या रूस से लगातार खरीद सके। ऐसे में पाकिस्तान की नजर अमेरिका के अफगानिस्तान में छूटे अरबों डॉलर के अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों के साथ-साथ भारी मात्रा में गोला-बारूद के जखीरे पर भी लगी हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान में सीधे दखल देकर मुफ्त में मिलने वाले सैन्य उपकरण और गोला बारूद पर अपना एकाधिकार जमा लिया जाए। यही वजह है कि पाकिस्तान सरकार के गृह मंत्री से लेकर उनके खुफिया विभाग के प्रमुख तक अफगानिस्तान में ऐसी ऐसी चालें चल रहे हैं, जिससे अफगानिस्तान में गृह युद्ध छिड़े और पूरी दुनिया के नक्शे से अफगानिस्तान का नामोनिशान तक मिट जाए।