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Supreme Court: शीर्ष अदालत ने पूछा- उस जमानत का क्या अर्थ? जब भारी शर्तें लगाकर जो दिया, उसे छीन लिया जाए

Thu, 22 Aug 2024 08:05 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अत्याधिक जमानत, जमानत नहीं है, जब राहत देने के बाद भारी शर्तें लगाकर बाएं हाथ से छीन लिया जाए, जो दाहिने हाथ से दिया गया।
 
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Supreme Court - फोटो : ANI
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विस्तार
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एक अहम फैसले में समाज की कठोर वास्तविकता को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक आरोपी को हर मामले में अलग-अलग जमानती या जमानतदार देने की जरूरत नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि जमानत देना और उसके बाद अत्यधिक और बोझिल शर्तें लगाना, असल में दाएं हाथ से दी गई चीज को बाएं हाथ से छीन लेना है।

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जस्टिस बीआर गवई व जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने एक व्यक्ति की उस याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें उसने एक मामले में दी गई जमानती का इस्तेमाल सभी अन्य मामलों में करने की बात कही थी। पीठ ने कहा, जमानत पर रिहा हुए आरोपी की मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए जमानती जरूरी है। साथ ही कोर्ट के सामने ऐसी स्थिति आती है, जहां जमानत पर रिहा आरोपी को कई मामलों में आदेश के अनुसार जमानती नहीं मिल पाता, वहां जमानती देने की जरूरत को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकारों के साथ संतुलित करने की भी जरूरत है। शीर्ष अदालत ने गिरीश गांधी की रिट याचिका को स्वीकार कर लिया जिसमें धोखाधड़ी और अन्य अपराधों के संबंध में हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और केरल जैसे कई राज्यों में कई मामलों का सामना किया है। उसका कहना था कि दो मामलों में उसके जमानती को अन्य सभी 11 मामलों में इस्तेमाल करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उसका यह भी कहना था कि हालांकि उसे जमानत मिल गई है लेकिन जमानतदार पेश न कर पाने के कारण वह अभी भी हिरासत में है। अदालत ने याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि यह निर्देश न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगा और आनुपातिक और उचित होगा।पीठ ने कहा, "इससे अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति के मौलिक अधिकार की रक्षा होगी और साथ ही उपस्थिति की गारंटी भी होगी।"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह प्राचीन काल से चला आ रहा सिद्धांत
याचिका का विरोध करने वाले राज्यों समेत अन्य पक्षों की सुनवाई के बाद पीठ ने कहा, प्राचीन काल से यह सिद्धांत रहा है कि अत्यधिक जमानत कोई जमानत नहीं है। जमानत देना और उसके बाद अत्यधिक और बोझिल शर्तें लगाना, दाएं हाथ से दी गई चीज को बाएं हाथ से छीनने जैसा है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून के दायरे में ही समाधान खोजना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि चाहे किसी व्यक्ति को ऋण लेनदेन के लिए गारंटर के रूप में खड़ा करना हो या आपराधिक कार्यवाही में जमानतदार के रूप में, किसी व्यक्ति के पास विकल्प बहुत सीमित हैं। पीठ ने कहा, यह अक्सर कोई करीबी रिश्तेदार या पुराना दोस्त होता है। आपराधिक कार्यवाही में यह दायरा और भी छोटा हो सकता है क्योंकि सामान्य प्रवृत्ति यह होती है कि अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए रिश्तेदारों और दोस्तों को उक्त आपराधिक कार्यवाही के बारे में नहीं बताया जाता। ये हमारे देश में जीवन की कठोर वास्तविकताएं हैं और अदालत के रूप में हम इनसे आंखें नहीं मूंद सकते।
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