कैंसर के इलाज के लिए मरीजों को बड़े शहरों का रुख न करना पड़े, इसके लिए देश के 28 राज्यों में सरकारी कैंसर उपचार का हब-स्पोक नेटवर्क विकसित करने की सिफारिश की गई है। संसदीय स्थायी समिति ने हर राज्य में एक सरकारी अस्पताल को मुख्य कैंसर केंद्र और उसके साथ एम्स, सरकारी मेडिकल कॉलेज व अन्य सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को जोड़ने पर जोर दिया गया है।
क्या है हब-स्पोक व्यवस्था?
650 करोड़ में मुख्य केंद्र, 400 करोड़ में इकाई
समिति के अनुसार, एक मॉडल कैंसर केंद्र तैयार करने में करीब 650 करोड़ रुपये और सालाना करीब 120 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं। वहीं, इससे जुड़े जिला या मेडिकल कॉलेज स्तर के केंद्र के लिए करीब 400 करोड़ रुपये शुरुआती लागत और 40 करोड़ रुपये सालाना खर्च का अनुमान है।
विशेषज्ञों की कमी सबसे बड़ी चुनौती
समिति ने ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और पैथोलॉजिस्ट समेत प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को बड़ी चुनौती बताया है। केवल मेडिकल सीटें बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञ डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बड़े स्तर पर प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई है।
मेडिकल सीटें बढ़ाने से नहीं चलेगा काम
समिति ने कहा कि कैंसर मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले विशेषज्ञों की उपलब्धता कम है। इसलिए केवल मेडिकल सीटें बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञ डॉक्टरों और संबद्ध स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बड़े स्तर पर प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करनी होगी।
टीएमसी के लिए अकेले संभव नहीं
समिति का मानना है कि देशभर में इतने हब और स्पोक तैयार करना अकेले टाटा मेमोरियल सेंटर के लिए संभव नहीं होगा। इसलिए पहले से मौजूद सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की क्षमता का इस्तेमाल कर राष्ट्रीय कैंसर देखभाल नेटवर्क को मजबूत किया जाना चाहिए।