इतिहास और कला के जानकार डॉ. शुभनीत कौशिक सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि सेंट्रल विस्टा परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए राष्ट्रीय संग्रहालय, राष्ट्रीय अभिलेखागार, शास्त्री भवन, विज्ञान भवन जैसी दूसरी इमारतों के साथ इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र को भी ध्वस्त किया जा रहा है। उन्हीं के शब्दों में कहें तो ‘19 नवम्बर, 1985 को कला केंद्र के उद्घाटन के अवसर पर राजीव गांधी ने पांच भारतीय प्रजातियों के वृक्ष लगाए थे, जो कला केंद्र के पांच विभागों यानी कला निधि, कला कोश, सूत्रधार, जनपद सम्पदा और कला दर्शन के प्रतीक थे।‘ ये सभी अब इतिहास का विषय होकर रह जाएंगे, जो आज एक एतिहासिक कालखंड का गवाही बनते हुए लोगों को आकर्षित कर रहे हैं।
‘भारतीय सभ्यता और परंपरा में भी महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले ये वृक्ष हैं– अश्वत्थ (बोधि वृक्ष), न्यग्रोध, अशोक, अर्जुन और कदम्ब। ये वृक्ष भारतीय परम्परा में ज्ञानोदय, आत्मज्ञान, अध्यात्म, उर्वरता, हर्ष और आनंद, सत्यनिष्ठा, बौद्धिक संयम, रचनात्मकता और कुशाग्रता के प्रतीक रहे हैं। कला केंद्र के परिसर में आज इन वृक्षों की पंक्तियां दिखाई पड़ती है, जो कुछ ही समय में सेंट्रल विस्टा परियोजना की भेंट चढ़ जाएगी।‘
‘संस्कृति मंत्रालय के आधीन स्वायत्त ट्रस्ट के रूप में काम करने वाले इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने अपने अस्तित्व के तीन दशकों में भारतीय कला, साहित्य एवं सांस्कृतिक विरासत को संजोने का उत्कृष्ट प्रयास किया। कला केंद्र लिखित, मौखिक एवं दृश्य कला रूपों के प्रमुख संसाधन केंद्र के रूप में भी उभरा। कला व संस्कृति से जुड़े मूल ग्रंथों, शब्दकोशों, विश्वकोशों के प्रकाशन में भी कला केंद्र ने प्रमुख भूमिका निभाई। जनजातीय व लोक कलाओं एवं भारतीय लोकाचार के व्यवस्थित अध्ययन एवं विविध कला रूपों के बीच रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देने में भी कला केंद्र ने योगदान दिया।‘
‘कला निधि के संदर्भ पुस्तकालय में जहां दो लाख से अधिक पुस्तकें हैं। वहीं इसमें दुर्लभ ग्रंथों का विशाल संग्रह भी शामिल है। जिसमें दो सौ साल पुरानी पुस्तकें भी शामिल हैं, जो अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में प्रकाशित हुई थीं। इसमें यूरोपीय यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत भी शामिल हैं। जो ब्रिटिश सेना के अधिकारियों, सर्वेक्षकों, इंजीनियरों, चिकित्सकों और यात्रियों द्वारा लिखे गए थे और तत्कालीन भारतीय समाज और संस्कृति का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।‘
‘कला निधि संग्रह में जिन विद्वानों के निजी संग्रह शामिल हैं, उनमें भाषा विज्ञानी सुनीति कुमार चटर्जी, आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, ठाकुर जयदेव सिंह, माहेश्वर नियोग, कृष्ण कृपलानी, वीके नारायण मेनन, लांस डेन, आलोचक नामवर सिंह और दिवंगत कलाविद कपिला वात्स्यायन के संग्रह भी शामिल हैं।‘
डॉ. शुभनीत कौशिक लिखते हैं कि कला केंद्र के संग्रह को भले ही स्थानांतरित करने की बात कही जा रही हो, लेकिन राष्ट्रीय संग्रहालय की तरह ही कला केंद्र सिर्फ़ ईंट-पत्थरों से निर्मित एक भवन भर नहीं था, बल्कि वह तो कला व संस्कृति से जुड़े विजन का, दूरदर्शी सोच का एक साकार रूप था, जो अब हमेशा-हमेशा के लिए नष्ट हो जाएगा। क्या इतिहास, कला और पुस्तकों के इन प्रेमियों की बात सरकार के कानों तक पहुंच रही है?
सेंट्रल विस्टा के विरोधी नहीं
डॉ. सिद्धेश्वर शुक्ला कहते हैं कि जैसे ही इतिहास और पर्यावरण के इन सवालों को उठाया जाता है, कुछ लोगों को भ्रम होने लगता है कि हम सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सबसे पहले स्पष्ट हो जाना चाहिए कि हम सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का विरोध नहीं कर रहे हैं। जिस तरह आधुनिक विश्व में सुरक्षा की नई चुनौतियां पैदा हुई हैं, जिस तरह से लोकतंत्र के नए-नए आयाम गढ़े जा रहे हैं, उन्हें देखते हुए एक नई संसद का निर्माण बेहद आवश्यक है, जिसमें सुरक्षा की आधुनिकतम व्यवस्था के साथ-साथ ज्यादा जगह भी उपलब्ध होनी ही चाहिए।
उनका विरोध तो केवल इस बात को लेकर है कि नवनिर्माण के लिए वैकल्पिक स्थान का चयन किया जाना चाहिए था जिससे लुटियन दिल्ली की ऐतिहासिक धरोहर को भी बरकरार रखा जा सकता और देश की नई चुनौतियों से भी निबटा जा सकता। लेकिन दुर्भाग्य से इस प्रश्न को सही तरीके से नहीं देखा गया जिसके कारण हम इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज खोने जा रहे हैं।
‘एतिहासिक धरोहर और पुरानी इमारत में अंतर करना आवश्यक’
वहीं, भाजपा नेता प्रेम शुक्ला कहते हैं कि हमें एतिहासिक महत्व की धरोहर और किसी भी पुराने भवन में अंतर करना सीखना होगा। अगर हम सभी पुराने भवन को एतिहासिक धरोहर बताने लगेंगे तो किसी भी पुराने भवन की जगह कोई नया निर्माण किया ही नहीं जा सकेगा। ऐसे में क्या हम किसी भी नवनिर्माण को हमेशा-हमेशा के लिए टाल देंगे? क्या यह करना उचित है? हम सभी समझते हैं कि ऐसा करना न तो संभव है, और न ही ऐसा करना अपेक्षित है, इसलिए सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर कोई भी विरोध तर्कसंगत नहीं है।
प्रेम शुक्ला ने कहा कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट से कोई भी बड़ी एतिहासिक महत्व की धरोहर को क्षति नहीं पहुंच रही है। यहां तक कि नया संसद भवन जिस परिसर में बन रहा है, उसमें पुराने संसद भवन तक से कोई छेड़छाड़ नहीं की जा रही है। वह अपनी मूल स्थिति में बरकरार रहेगा। ऐसे में इसे एतिहासिक महत्व की धरोहरों के विरुद्ध बताना उचित नहीं है। कुछ बेहद सामान्य क्षेत्र इसकी परिधि में आएंगे जिनका कोई एतिहासिक महत्त्व नहीं है।
सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के योजनाकारों ने पर्यावरण के प्रति भी पूरी सजगता दिखाई है। इसके निर्माण में काटे जा रहे वृक्षों को न केवल नई जगह आरोपित किया जाएगा, बल्कि नवनिर्माण के बाद इस क्षेत्र में पहले की तुलना में ज्यादा हरित क्षेत्र होगा। ऐसे में इस निर्माण में पर्यावरण की चिंता भी निरर्थक है।
उन्होंने कहा कि दिल्ली के सरकारी भवनों को किराए की बिल्डिंग्स में चलाकर कुछ लोग हर साल हजारों करोड़ रुपये की कमाई कर रहे थे। एक लॉबी के जरिए इस तरह के मुद्दे उठाकर वे इसे विवादित बताने और काम को रोकने की साजिश करते रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र के एक बेहद महत्वपूर्ण स्तंभ सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह की सभी आपत्तियों को निरस्त कर यह बता दिया है कि देश आगे बढ़ने और एक नया इतिहास गढ़ने के लिए तैयार है। अब इस प्रोजेक्ट को रोका नहीं जा सकता।