जांच एजेंसी ने राउत की जमानत याचिका के जवाब में दायर हलफनामे में कहा कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोपी द्वारा संवैधानिक आधार पर जमानत मांगना न्यायोचित नहीं है। राउत ने अपनी याचिका में कहा था कि उनकी हिरासत अनुचित है और यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के खिलाफ है।
हलफनामे में कहा गया है, 'इस तरह के अपराध के आरोपी के लिए संवैधानिक आधार पर राहत मांगना न्यायोचित नहीं है, जबकि उसका कृत्य अपने आप में राज्य और समाज के हित के खिलाफ है।' एजेंसी ने दावा किया कि राउत द्वारा किए गए कथित कृत्यों का भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा और संप्रभुता पर सीधा प्रभाव पड़ा।
इसमें आगे कहा गया है कि नक्सली-माओवादी विद्रोह ने इस देश को त्रस्त कर दिया है, इसने लोगों, पुलिस आदि के जीवन को नष्ट कर दिया है। एनआईए ने कहा कि इस उग्रवाद का नेतृत्व भाकपा (माओवादी) ने किया था, जिसके राउत सदस्य थे। कार्यकर्ता को जून 2018 में गिरफ्तार किया गया था और वर्तमान में वह न्यायिक हिरासत में है।
न्यायमूर्ति एएस गडकरी और न्यायमूर्ति एस जी दिगे की खंडपीठ ने मंगलवार को राउत की याचिका पर सुनवाई के लिए 12 जुलाई की तारीख तय की।