राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण यानि ऊर्जा की बचत और उसका संरक्षण। हमारे देश में सौर, पवन और एनर्जी के कई विकल्प मौजूद हैं जिसकी मदद से हम न केवल देश की ऊर्जा की व्यवस्था को बदल सकते हैं। देश में ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर काफी काम हो रहा है आइए जानते हैं फिलहाल देश में इसकी क्या स्थिति है?
ऊर्जा संरक्षण का मतलब सीधेतौर पर ऊर्जा की बचत है। वैसे खत्म होते पेट्रोल डीजल और कोयला को देखते हुए सरकार नित्य नए उर्जा के स्रोतों पर विचार कर रही है। शायद यही वजह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत का उपयोग में देश तेजी से बढ़ने लगा है। सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है साथ ही अक्षय ऊर्जा उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
1800 गीगावाट तक पहुंची बिजली की डिमांड
देश हर दिन विकास के नए आयाम लिख रहा है। इसी वजह से विकास से जुड़े कामों में तेजी लाने के चलते बिजली की मांग भी बढ़ी है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि आने वाले वर्षों में पवन और अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता में विस्तार हो। 2018 अक्तूबर में पीक आवर में बिजली की मांग 180 गीगावाट तक पहुंच गई थी। बिजली मंत्रालय का कहना है कि यह अब तक की सबसे बड़ी मांग है।
सरकार लगातार अक्षय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ रही है लेकिन इसके बावजूद भारत ने पिछले चार वर्षों में कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन किया। उद्योग अनुमानों के मुताबिक भारत में बिजली की मांग 2022 तक करीब 1600 अरब यूनिट तक पहुंचने की उम्मीद है और अगले दशक तक इसके 2100 अरब यूनिट तक पहुंचने की बात की जा रही है। देश में एक शताब्दी से अधिक समय से कोयला आधारित तापीय संयंत्र ही भारत में बिजली का प्रमुख स्रोत रहे हैं।
आज बिजली उत्पादन की कुल क्षमता का आधे से अधिक क्षमता कोयला आधारित है। यह देश की बिजली जरूरतों में तीन चौथाई यानी 77 फीसदी से भी अधिक का योगदान देता है।
इसकी तुलना में अक्षय ऊर्जा लगभग 20 प्रतिशत (69 गीगावाट) के साथ दूसरा सबसे बड़ा स्थापित आधार है, जो लगभग 8 प्रतिशत बिजली की पैदावार करता है।
2 साल में 20 हजार मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य
कच्चा तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस जैसे संसाधनों की होती कमी और भविष्य में कम और खत्म होने की संभावनाओं के बीच सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे गैर पारंपरिक साधन जो कभी खत्म नहीं हो सकते, इसलिए अब सरकार का पूरा ध्यान इसपर केंद्रित है। सरकार का दावा है कि अगले दो साल में देश में सौर ऊर्जा का उत्पादन बढ़कर 20 हजार मेगावाट से अधिक हो जाएगा। वहीं वर्ष 2035 तक देश में सौर ऊर्जा की मांग 7 गुना बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।
इस क्षेत्र में अपार संभावनाओं को देखते हुए अब विदेशी कंपनियों की निगाहें भारत पर लगी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक वर्ष 2015 से 2017 महज तीन वर्षों के दौरान भारत में सौर ऊर्जा का उत्पादन अपनी स्थापित क्षमता से 4 गुना बढ़कर 10 हजार मेगावाट पार कर गया है। यह देश में बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता का 16 फीसदी है। इससे साफ है कि उर्जा बचाने के साथ ही सरकार उसके विकल्पों पर भी तेजी से काम कर रही है और ऐसा माना जाता है कि देश की जनता को भी इस ओर कदम बढ़ाना चाहिए।