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1800 गीगावाट पहुंची बिजली की मांग, देश में बिजली उत्पादन का 8% ग्रीन एनर्जी

Fri, 14 Dec 2018 06:44 PM IST
पूजा मेहरोत्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला
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- फोटो : अमर उजाला
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राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण यानि ऊर्जा की बचत और उसका संरक्षण। हमारे देश में सौर, पवन और एनर्जी के कई विकल्प मौजूद हैं जिसकी मदद से हम न केवल देश की ऊर्जा की व्यवस्था को बदल सकते हैं। देश में ऊर्जा के अन्य विकल्पों पर काफी काम हो रहा है आइए जानते हैं फिलहाल देश में इसकी क्या स्थिति है? 
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ऊर्जा संरक्षण का मतलब सीधेतौर पर ऊर्जा की बचत है। वैसे खत्म होते पेट्रोल डीजल और कोयला को देखते हुए सरकार नित्य नए उर्जा के स्रोतों पर विचार कर रही है। शायद यही वजह है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत का उपयोग में देश तेजी से बढ़ने लगा है। सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है साथ ही अक्षय ऊर्जा उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। 

1800 गीगावाट तक पहुंची बिजली की डिमांड 

देश हर दिन विकास के नए आयाम लिख रहा है। इसी वजह से विकास से जुड़े कामों में तेजी लाने के चलते बिजली की मांग भी बढ़ी है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि आने वाले वर्षों में पवन और अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता में विस्तार हो।  2018 अक्तूबर  में पीक आवर में बिजली की मांग 180 गीगावाट तक पहुंच गई थी। बिजली मंत्रालय का कहना है कि यह अब तक की सबसे बड़ी मांग है। 

सरकार लगातार अक्षय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ रही है लेकिन  इसके बावजूद भारत ने पिछले चार वर्षों में कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन किया। उद्योग अनुमानों के मुताबिक भारत में बिजली की मांग 2022 तक करीब 1600 अरब यूनिट तक पहुंचने की उम्मीद है और अगले दशक तक इसके 2100 अरब यूनिट तक पहुंचने की बात की जा रही है। देश में एक शताब्दी से अधिक समय से कोयला आधारित तापीय संयंत्र ही भारत में बिजली का प्रमुख स्रोत रहे हैं। 
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आज बिजली उत्पादन की कुल क्षमता का आधे से अधिक क्षमता कोयला आधारित है। यह देश की बिजली जरूरतों में तीन चौथाई यानी 77 फीसदी से भी अधिक का योगदान देता है। 
इसकी तुलना में अक्षय ऊर्जा लगभग 20 प्रतिशत (69 गीगावाट) के साथ दूसरा सबसे बड़ा स्थापित आधार है, जो लगभग 8 प्रतिशत बिजली की पैदावार करता है। 

2 साल में 20 हजार मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य

कच्चा तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस जैसे संसाधनों की होती कमी और भविष्य में कम और खत्म होने की संभावनाओं के बीच सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे गैर पारंपरिक साधन जो कभी खत्म नहीं हो सकते, इसलिए अब सरकार का पूरा ध्यान इसपर केंद्रित है। सरकार का दावा है कि अगले दो साल में देश में सौर ऊर्जा का उत्पादन बढ़कर 20 हजार मेगावाट से अधिक हो जाएगा। वहीं वर्ष 2035 तक देश में सौर ऊर्जा की मांग 7 गुना बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।

इस क्षेत्र में अपार संभावनाओं को देखते हुए अब विदेशी कंपनियों की निगाहें भारत पर लगी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक वर्ष 2015 से 2017 महज तीन वर्षों के दौरान भारत में सौर ऊर्जा का उत्पादन अपनी स्थापित क्षमता से 4 गुना बढ़कर 10 हजार मेगावाट पार कर गया है। यह देश में बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता का 16 फीसदी है। इससे साफ है कि उर्जा बचाने के साथ ही सरकार उसके विकल्पों पर भी तेजी से काम कर रही है और ऐसा माना जाता है कि देश की जनता को भी इस ओर कदम बढ़ाना चाहिए। 

 
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पवन ऊर्जा उत्पादन के मामले में अग्रणी है तमिलनाडु 

अगर पवन ऊर्जा की बात करें तो भारत दुनिया में पवन ऊर्जा के उत्पादन के मामले में अग्रणी की भूमिका में है। या यूं कहें कि  तमिलनाडु पवन ऊर्जा उत्पादन के मामले में दुनिया का सबसे अग्रणी क्षेत्र बनने की ओर कदम बढ़ा चुका है। अमेरिका स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ एनर्जी इकॉनोमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस की रिपोर्ट के अनुसार साल 2027 तक तमिलनाडु में आधे से ज्यादा ऊर्जा का उत्पादन पवन ऊर्जा से हो पाएगा।

फिलहाल तमिलनाडु 7.85 गीगावाट पवन ऊर्जा उत्पादन कर रहा है। यह क्षमता डेनमार्क और स्वीडन जैसे यूरोपीय देशों से कई गुना अधिक है। मौजूदा समय में भारत में पवन ऊर्जा का उत्पादन करीब 32.56 गीगावाट है। इस ऊर्जा में गैसीय प्रदूषकों के उत्सर्जन जैसी कोई समस्या नहीं होती, जो ग्रीन हाउस प्रभाव को उत्पन्न करके पर्यावरणीय समस्याओं को बढ़ाते हैं।

पवन ऊर्जा में पनचक्की लगाने के अलावा कोई बड़ा खर्च नहीं आता है। महत्वपूर्ण बात है देश में पवन मुफ्त और ढेर सारी मात्रा में दुनिया में मौजूद है और वह कभी समाप्त भी नहीं होने जा रहा है। इसलिए उर्जा के विकल्प के रूप में पवन ऊर्जा आसान विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। 

तेजी से विकसित राष्ट्र की ओर बढ़ रहा भारत बिजली खपत के मामले में तीसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर अमेरिका और दूसरे नंबर पर चीन आता है। बता दें कि 2022 तक अक्षय ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य 175 गीगावाट रखा गया है। 

23 लाख से अधिक एलईडी स्ट्रीट लाइट्स 

बिजली की कम खपत के लिए सीएफएल के बाद सरकार एलईडी लाइट्स के विकल्प पर गंभीरता से कदम उठाए हैं। पिछले वर्ष के मध्य तक 23 लाख से अधिक स्ट्रीट लाइट्स को बदलकर वहां एलईडी लाइट लगाई जा चुकी थीं। आने वाले साल में  सरकार की योजना 3.5 करोड़ स्ट्रीट लाइट्स को बदलने की है।

 
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