सर्वोच्च न्यायालय ने आज दिए एक महत्वपूर्ण निर्णय में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के आर्थिक अपराधों की जांच करने और इनसे जुड़े मामलों में गिरफ्तारी करने के अधिकार को सही ठहराया है। इससे विपक्ष का केंद्र सरकार के द्वारा ईडी का राजनीतिक दुरुपयोग करने का आरोप फिलहाल कुंद पड़ गया है। इससे सोनिया गांधी और राहुल गांधी की ईडी से हो रही पूछताछ के विरोध में कांग्रेस के विरोध को भी झटका लगा है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद ईडी की कार्रवाई पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में टकराव बढ़ने की उम्मीद है। चर्चा है कि नई परिस्थितियों में ईडी के निशाने पर कई अन्य विपक्षी दलों के नेता आ सकते हैं। बड़ा प्रश्न यह है कि विपक्षी दलों के नेताओं पर कार्रवाई कर सरकार क्या संदेश देना चाहती है?
विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार ईडी का राजनीतिक दुरुपयोग कर रही है। इसके जरिए विपक्ष की सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है। आरोप है कि महाराष्ट्र में ईडी के सहारे ही एनसीपी और शिवसेना के मजबूत नेताओं को कटघरे में खड़ा किया गया और इसके बाद उद्धव ठाकरे सरकार को गिराया गया। महाराष्ट्र की ही तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी और टीएमसी के एक अन्य कद्दावर नेता पार्थो चटर्जी के खिलाफ भी जांच चल रही है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के करीबी लोगों पर भी कार्रवाई की गई है तो झारखंड में भी कुछ नेता ईडी की रडार पर हैं।
उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक लगभग हर राज्य में विपक्षी दलों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के अलग-अलग मामलों में जांच शुरू हो चुकी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी-सोनिया गांधी पर हेराल्ड केस में जांच जारी है। जम्मू-कश्मीर के नेता फारूख अब्दुल्ला पर जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन के एक मामले में जांच जारी है तो महबूबा मुफ्ती के करीबियों के यहां छापे पड़ चुके हैं। पंजाब कांग्रेस के नेता चरणजीत सिंह चन्नी और उनके करीबियों के यहां ईडी के छापे पड़ चुके हैं तो उत्तराखंड के नेता हरीश रावत पर भी सीबीआई जांच की आंच आ चुकी है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के भाई के घर छापे पड़ चुके हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी नेता सत्येंद्र जैन पर ईडी आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है तो एक अन्य मामले में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर भी गिरफ्तार होने का खतरा मंडरा रहा है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के एक करीबी को सीबीआई ने जमीन फ्रॉड के एक मामले में गिरफ्तार कर लिया है। झारखंड में एक वरिष्ठ अधिकारी के घर मिले करोड़ों रुपयों की आंच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी परेशानी में डाल सकती है। सरकार के कुछ अन्य मंत्री भी रडार पर हैं। केरल में गोल्ड स्मगलिंग का मामला मुख्यमंत्री पिनराई विजयन तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
विपक्ष का आरोप है कि ईडी और सीबीआई के जरिये विपक्षी दलों की सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश की जा रही है। महाराष्ट्र में एनसीपी-शिवसेना के नेताओं को ईडी-सीबीआई जांच के घेरे में लाकर उद्धव ठाकरे सरकार को गिराया गया है। विपक्ष के कई नेता इस समय भी जेल में हैं। आरोप है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार पर भी इसी तरह का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर भी ईडी का शिकंजा कसा हुआ है। माना जा रहा है कि पार्थो चटर्जी की ‘काली डायरी’ का काला जादू ममता दीदी को कटघरे में खड़ा कर सकता है। संभवतः इसीलिए स्ट्रीट फाइटर ममता बनर्जी के रूख नरम पड़े हैं।
कार्रवाई क्यों?
2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने ‘भ्रष्टाचार पर वार’ को अपना प्रमुख नारा बनाया था। माना जाता है कि यूपीए 2.0 में हुए कथित भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के कारण जनता को मोदी का यह मंत्र खूब भाया और उसने जमकर सरकार को समर्थन दिया। हाल ही में संपन्न हुए यूपी विधानसभा के चुनावों में भाजपा को बड़ी सफलता मिलने के पीछे भी योगी आदित्यनाथ सरकार का भ्रष्टाचार पर कठोर रूख अपनाना माना जाता है।
भ्रष्टाचार के मामले में सरकार केवल विपक्षी दलों पर ही कठोर नहीं है। उसने केंद्र सरकार में उच्च पदों पर बैठे हुए वरिष्ठ नौकरशाहों पर भी नकेल कसी है। अब तक सैकड़ों की संख्या में नौकरशाहों को जबरन रिटायर कर दिया गया है या उन्हें स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का विकल्प देकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। इससे भी जनता के बीच केंद्र की छवि भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई करने वाली सरकार की बनी है।
माना जा रहा है कि विपक्षी दलों के नेताओं और सरकार के वरिष्ठ नौकरशाहों पर भ्रष्टाचार के मामले में कठोर कार्रवाई इसी बात का संकेत दे रही है कि सरकार 2024 के आम चुनाव में इसे अपना प्रमुख हथियार बना सकती है।
भ्रष्टाचार पर कठोर नीति अपनाने का दांव भाजपा पर कई बार उल्टा भी पड़ा है। यूपी चुनाव के दौरान भाजपा के सहयोगी रहे स्वामी प्रसाद मौर्य और ओमप्रकाश राजभर ने अलग रास्ता अपना लिया था। कहा जाता है कि योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री रहकर इन नेताओं ने अपने पद का दुरूपयोग करने की कोशिश की थी, जिसकी योगी आदित्यनाथ की तरफ से स्वीकृति नहीं मिली। यही कारण था कि चुनाव के समय इन्होंने अपना अलग झंडा बुलंद कर लिया।
यहां तक कि हाल ही में योगी आदित्यनाथ सरकार के मंत्री दिनेश खटीक ने भी सरकार के खिलाफ झंडा बुलंद कर दिया था और अमित शाह को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। अपने इस्तीफे में उन्होंने खुलेआम यह आरोप लगाया था कि उनके कहने पर एक अधिकारी का ट्रांसफर तक नहीं किया जा रहा है, ऐसे में उनके मंत्री रहने का कोई अर्थ नहीं है।
कहा जाता है कि दिनेश खटीक की नाराजगी केवल तभी दूर हुई जब पार्टी के केंद्रीय नेताओं से दिल्ली में हुई मुलाकात में उन्हें भ्रष्टाचार को लेकर पार्टी के गंभीर रूख के बारे में बताया गया। यह पूरी कोशिश बताती है कि पार्टी अपने ऊपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगने देना चाहती। यही कारण है कि यूपी में हर फाइल मुख्यमंत्री के पास से होकर ही जाती है। केंद्र में यही काम पीएमओ कर रहा है।
भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन हमारा दायित्व: भाजपा
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ल ने अमर उजाला से कहा कि जनता को ‘भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन’ प्रदान करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य है। वे 2014 में प्रधानमंत्री बनने के साथ ही इस उद्देश्य को सफल बनाने में जुटे हुए हैं। भ्रष्टाचार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की कठोर नीति का ही परिणाम है कि सत्ता में आठ साल हो जाने के बाद भी अब तक सरकार पर भ्रष्टाचार का एक दाग तक नहीं लगाया जा सका है।
उन्होंने कहा कि किसी भ्रष्टाचारी पर की गई कार्रवाई को किसी पार्टी पर की गई कार्रवाई की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। यह किसी अपराधी पर की गई कार्रवाई है जिसका उन्हें भी स्वागत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों से भी उनका आग्रह है कि वे अपने दलों में भ्रष्टाचारी नेताओं को प्रश्रय न दें और देश को भ्रष्टाचार मुक्त शासन दिलाने में सरकार का सहयोग करें।