द्वारका-शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के दिघोरी गांव में हुआ था। वह अपनी बेबाक राय से हमेशा चर्चा में रहे। अयोध्या का मुद्दा हो या फिर साईं बाबा को भगवान के रूप में खारिज करने की। उन्होंने हर मुद्दों पर अपनी बात तथ्य के साथ रखी।
उन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए भी लड़ाई लड़ी है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्हें जब ट्रस्ट में जगह नहीं मिली तो वह नाराज हो गए थे। यहां तक कह दिया था कि यह वीएचपी का मुख्यालय बन रहा है। पीएम मोदी ने उनके निधन पर दुख जताया। उन्होंने ट्वीट किया, शंकराचार्य के निधन से दुख हुआ, उनके अनुयायियों के प्रति मेरी संवेदनाएं। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, शंकराचार्य का निधन संत समाज के लिए बड़ी क्षति है।
बेटियां दाह संस्कार करें तो नहीं मिलती तृप्ति
शंकराचार्य ने बेटियों के दाह संस्कार करने को लेकर ऐसा बयान दिया था जिससे वह विवादों में घिर गए थे। उन्होंने कहा था, पितरों को तृप्ति तब मिलती है जब उनका बेटा, पौत्र या बेटी का बेटा दाह संस्कार और तर्पण करे। हिंदू धर्म ग्रंथों में उल्लेख है कि जो बेटियां माता-पिता का अंतिम संस्कार करती हैं, उनके माता-पिता को तृप्ति नहीं मिलती।
धर्म को छोड़ दें महिलाएं
महिलाएं प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सांसद, विधायक बने, यह अच्छी बात है, लेकिन कम से कम धर्माचार्यों को तो छोड़ दें। धर्म के यह पद स्त्री के लिए नहीं हैं। जो संविधान एक देश में लागू होता है, वह उसी रूप में दूसरे देश में लागू नहीं हो सकता। उसी तरह, किसी को शंकराचार्य बना देने की व्यवस्था मान्य नहीं होगी। उन्होंने शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और इससे होने वाले नुकसान को लेकर भी आगाह किया। उन्होंने कहा शनि मंदिर में स्त्री का प्रवेश वर्जित है, क्योंकि शनि कुरूप ग्रह है। उसकी दृष्टि यदि स्त्री पर पड़ी तो उसे नुकसान हो सकता है।
साईं बाबा को अवतार मानने से किया था इनकार
शंकराचार्य ने साईं बाबा को अवतार मानने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि साईं भक्ति अंधविश्वास के सिवा कुछ नहीं। साईं के मंदिर बनाकर पूजा-अर्चना करना सनातन धर्म के विरुद्ध है। इससे हिंदू समाज के बंटने का खतरा पैदा हो गया है। साईं हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक नहीं हैं।
नौ वर्ष में घर छोड़ धर्मयात्रा पर निकले
नौ दिन पहले अपना 99वां जन्मदिन मनाने वाले शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती साधु होने के साथ-साथ वह एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। इसलिए उन्हें क्रांतिकारी साधु भी कहा जाता था। कांग्रेस नेताओं के साथ करीबी के कारण भी वे सुर्खियों में रहे।
शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने काशी में स्वामी करपात्री महाराज से वेद-वेदांग और शास्त्रों की शिक्षा ली थी। शंकराचार्य के बचपन का नाम पोथीराम उपाध्याय था। उनके पिता का नाम धनपति उपाध्याय था। करपात्री महाराज की एक राजनीतिक पार्टी राम राज्य परिषद थी, जिसके वह अध्यक्ष थे।
अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में जेल भी गए
दीक्षा ग्रहण के बाद पोथीराम उपाध्याय आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। जब देश में अंग्रेजों के विरुद्ध भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। उस समय उनकी आयु 19 वर्ष थी। इसके बाद से ही इनके साथी उन्हें क्रांतिकारी साधु के रूप से जानने लगे। साथ ही लोग इन्हें इसी नाम से पुकारते भी थे।
शंकराचार्य की उपाधि 1981 में
स्वामी स्वरूपानंद 1950 में दंडी संन्यासी बन गए थे। उन्होंने शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से दंड-संन्यास की दीक्षा ली थी। इसके बाद से वह स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के नाम से जाने जाने लगे। पहली बार उनको 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली। वह द्वारका और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य थे।