दुर्गा पूजा (प्रतिकात्मक तस्वीर)
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करीब 450 वर्षों पुराना सिंदूर खेला बंगाली परंपरा को आज भी लोग उसी सिद्दत से मनाते हैं। दशमी के दिन महाआरती के बाद महिलाएं मां का श्रृंगार करती हैं। आज भी उसी तरह से मां को सजाया जाता है, क्योंकि मां नौ दिनों तक पिता के घर पर रहने के बाद वापस ससुराल जा रही होती हैं। आज उतपाता के लोगों के लिए खास था, क्योंकि उनके गांव के लोगों को अपने ही गांव, अपने ही पाड़ा में सिंदूर खेलने का मौका करीब 450 वर्षों के बाद मिला।
पश्चिम मेदिनीपुर जिले के उतपाता (मालीग्राम) के भक्त इस बार कुछ ज्यादा ही भावुक हुए, क्योंकि पहली बार इस गांव में दुर्गापूजा का आयोजन किया गया था। यहां के स्थानीय लोगों ने बताया कि पहली बार उन्होंने दुर्गापूजा आयोजन करने की सोची। स्थानीय लोगों ने मिलकर प्रयास किया और इतना सफल आयोजन हो पाया। पूजा कमेटी के लोगों ने बताया कि यह पहला प्रयास था, लेकिन इतना सुंदर से सब कुछ हो पाया, मां की कृपा है। यहां पर पहली बार सिंदूर खेला का भी आयोजन किया गया। महिलाओं ने बताया कि पहले उनको दूसरी जगह जाना पड़ता था लेकिन अपने ही गांव में, अपने ही पाड़ा में सिंदूर खेलने का मौका मिला। इसके लिए उन्होंने पूजा कमेटी के सदस्यों का आभार जताया।
ऐसे किया जाता है मां का श्रृंगार
सबसे पहले सुहागिन महिला, मां के हाथ-पैरों को धोती हैं। उसके बाद उनका श्रृंगार किया जाता है। उनके बालों को सजाया जाता है। उनको सिंदूर लगाया जाता है। फिर उसके बाद उनको मिठाई खिलाई जाती है। उनके मुंह को पल्लू से साफ किया जाता है। मां को शीशा दिखाया जाता है। फिर उनकी आरती उतारी जाती है। इसके बाद दो पान के पत्तों पर सिंदूर लगाकर मां के गालों पर धुमाया जाता है। इसके बाद फिर सुहागिन महिला उसी पान के पत्ते को अपने गाल पर लगाती हैं। इसके बात माता के साथ गणेश और परिवार के सदस्यों की पूजा की जाती है। इस तरह से कई सुहागिन महिलाएं मां का श्रृंगार करती हैं।
एक-दूसरे को लगाती हैं सिंदूर
इसके बाद सभी सुहागिन महिलाएं मां के आशीर्वाद से लिए गए सिंदूर को मिलाकर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और अखंड सौभाग्य की एक-दूसरे को शुभकामनाएं देती हैं। इस दौरान मां के गीतों में धुनुची नृत्य भी महिलाएं करती हैं। आज पूरी दुनिया में जहां भी बंगाली समुदाय निवास करता है, वहां दुर्गापूजा के अभिन्न अंग सिंदूर खेला को खेला जाता है। इसके बाद मां को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। अगर इसके इतिहास पर नजर डालें तो बताया जाता है करीब 450 वर्ष पहले इस परंपरा का आरंभ हुआ था। तबसे लेकर आज तक इसे उसी तरह से निभाया जाता है, जैसे पहले दिन मनाया गया था। आज का दिन उतपाता (मालीग्राम), मेदिनीपुर के लोगों के लिए खास था क्योंकि, उनके लोगों को यह अवसर 450 वर्ष बाद मिला।