कोरोना महामारी के चलते भारत समेत कई देशों में विश्वविद्यालयों के सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है और इनका भविष्य खतरे में है। विकसित देशों में तो उच्च शिक्षा अपने चरम पर पहुंच चुकी है। यह दावा विश्वविद्यालयों पर प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट में किया गया है।
इसका कहना है कि महामारी के मद्देनजर रिमोट लर्निंग (ऑनलाइन पढ़ाई) उच्च शिक्षा क्षेत्र में तेजी से आते बदलावों की शुरुआत भर है और जब दोबारा कैम्पस खुलेंगे, तब उनमें पहले जैसी सामान्य स्थितियां नहीं रहेंगी। यह बात विवि के प्रबंधकों को स्वीकार कर नई वास्तविकताएं अपनानी चाहिए। कंसल्टिंग फर्म अर्न्स्ट एंड यंग द्वारा ‘क्या अतीत के विश्वविद्यालय अब भी भविष्य हैं’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर, भारत और ऑस्ट्रेलिया के 29 विश्वविद्यालय लीडरों के साक्षात्कार पर आधारित है। इसमें उच्च शिक्षा के भविष्य का विश्लेषण पेश किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर पेश रिपोर्ट में कहा गया है, विश्वविद्यालयों को वर्ष 2030 को ध्यान में रखते हुए दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्हें जनसांख्यिकी बदलाव, भू राजनीतिक चुनौतियों, बदलती कार्यस्थलों की मांग और छात्रों की डिजिटल अनुभवों की अत्यधिक अपेक्षाओं के मद्देनजर नई वास्तविकताओं से तेजी से तालमेल बिठाना होगा।
रिपोर्ट में कहा, विश्वविद्यालयों को वर्ष 2030 को ध्यान में रखते हुए जनसांख्यिकी बदलाव, भू राजनीतिक चुनौतियों, बदलती कार्यस्थलों की मांग और छात्रों की डिजिटल अनुभवों की अत्यधिक अपेक्षाओं के मद्देनजर नई वास्तविकताओं से तालमेल बैठाना होगा
मीडिया, खुदरा जैसे क्षेत्रों में आया संकट अब विश्वविद्यालयों पर
दुनियाभर में विश्वविद्यालय दो साल से महामारी की तगड़ी मार झेल रहे हैं। अस्थायी रिमोट लर्निंग उच्च शिक्षा के क्षेत्र में त्वरित परिवर्तन की शुरुआत भर है। मीडिया, खुदरा और ऊर्जा क्षेत्र में दिग्गज कंपनियों को नीचे ले जा रहा कारोबार पुनर्निर्माण अब उच्च शिक्षा के लिए भी चुनौती खड़ी कर रहा है। अगर विश्वविद्यालय लीडरों ने उनके उद्देश्यों पर पुनर्विचार नहीं किया तो महामारी से उत्पन्न चुनौतियां उनके अस्तित्व पर तेजी से खतरा बढ़ा सकती हैं। ऐसे में विश्वविद्यालयों को कठिन सवालों के जवाब ढूंढते हुए महामारी काल में पैदा हुए अवसरों की ओर देखते हुए नवाचार करना होगा।