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'सूखा' प्रकृति का कोप या न्योता देकर बुलाया गया मेहमान?

Tue, 12 Apr 2016 09:48 AM IST
अनुज कुमार मौर्या/अमर उजाला, नई दिल्ली
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सूखा प्राकृतिक है या लोगों द्वारा पैदा किया गया? - फोटो : getty
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इस समय भारत में सूखे की समस्या ने एक विकराल रूप ले लिया है। महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं, जिनके कुछ हिस्से इस समय सूखे की समस्या से जूझ रहे हैं। सूखे की बात आते ही हर कोई भगवान को दोष देने लगता है और इसे एक प्राकृतिक आपदा का नाम दे दिया जाता है। लेकिन क्या सूखे के लिए सिर्फ प्रकृति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? या इसके लिए और भी कोई दोषी है? आइए जानते हैं-
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सरकार है सबसे अधिक जिम्मेदार

भारत में सूखा पड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन क्या इसके लिए पहले से तैयार नहीं रहा जा सकता है? अगर बात करें सूखा पड़ने के कारण की, तो इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है सरकार की पॉलिसी। भारत में हर साल किसी न किसी क्षेत्र में सूखा जरूर पड़ता है और कई ऐसी जगहें भी हैं, जहां साल दर साल कमोबेश सूखे की स्थिति पैदा हो ही जाती है। बावजूद इसके सराकार की तरफ से कोई कड़े कदम नहीं उठाए जा रहे।

इस ओर न तो राज्य सरकार ध्यान देती है, न ही केन्द्र सरकार उस सूखी जमीन को हरा भरा करने की सोचती है। आलम ये है कि सूखे से परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहा है और नौजवान गांव छोड़कर शहरों की ओर रोजी रोटी की तलाश में निकल जा रहे हैं। गांव में बच रही हैं तो सिर्फ महिलाएं और लड़कियां।
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कई गांवों का तो ये हाल है कि लड़कियों की शादी भी नहीं हो रही है। सरकार पानी जमा करने का कोई इंतजाम नहीं करती है, बल्कि जब कहीं सूखा पड़ता है तो मदद के नाम पर चंद टैंकर पानी की भीख पहुंचा दी जाती है, जो उस गांव के प्यासे लोगों के बीच कुछ ऐसे गायब हो जाता है, जैसे बरसों से तपती जमीन पर पानी की बूंद पड़ते ही हवा हो जाती है।

2015 में स्टॉकहोम वॉटर प्राइज हासिल कर चुके राजस्थान के मशहूर जल सरंक्षणकर्ता राजेन्द्र सिंह भी कहते हैं कि यह प्राकृतिक नहीं, बल्कि इंसानों द्वारा पैदा किया गया सूखा है। वह कहते हैं कि हमारे पास रिजर्व पुलिस है, रिजर्व आर्मी है, लेकिन रिजर्व पानी नहीं है। राजेन्द्र का मानना है कि यह सूखा सरकारी अनदेखियों का नतीजा है।

पानी का गलत प्रबंधन

पानी का गलत प्रबंधन - फोटो : getty
देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर हर साल लगातार सूखे जैसे हालात बन रहे हैं, जहां पर फसलों को बचाने के लिए सिंचाई की सुविधा नहीं पहुंच पा रही है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल ऐसी दिक्कत होने के बावजूद हम बारिश के पानी पर ही निर्भर क्यों हैं? आखिर ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में पानी की व्यवस्था हो सके।

जिन क्षेत्रों में सूखे की सबसे अधिक परेशानी साल दर साल आ रही है, उन क्षेत्रों में बारिश के पानी को संरक्षित करने के तरीके बताए जाने चाहिए। साथ ही, ऐसे क्षेत्रों में सरकार की तरफ से जल संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि सूखे जैसी स्थिति पैदा होने से पहले ही लोगों को पानी मुहैया कराया जा सके। ऐसा करने से न केवल सूखे से निपटा जा सकता है, बल्कि उन सैकड़ों किसानों की जान बचाई जा सकती है, जो सूखे की वजह से आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।

खेती करने की प्रक्रिया

नदी, तालाब, कुएं सब सूख गए - फोटो : getty
सरकार को इन क्षेत्रों में लोगों को खेती करने की सही प्रक्रिया के बारे में बताना चाहिए। इन क्षेत्रों में अभी भी धान और गन्ने जैसी फसलें उगाई जाती हैं, जो पानी बहुत अधिक मात्रा में सोखती हैं। इन फसलों के कारण भी इन क्षेत्रों की जमीन में पानी का स्तर हर दिन गिरता जा रहा है।

किसानों को यह बताया जाना चाहिए कि आखिर वह किन फसलों को उगाएं, जिसमें पानी का इस्तेमाल कम होता है। साथ ही, सरकार की तरफ से ऐसी जगहों के किसानों को कुछ सब्सिडी भी दी जानी चाहिए, ताकि दूसरी फसलों को उगाने से अगर उन्हें कम मुनाफा हो, तो यह सब्सिडी उसकी भरपाई कर दे।

ऐसा करने से न केवल उन क्षत्रों में सूखे की स्थिति को पैदा होने से बचाया जा सकता है, बल्कि एक उपजाऊ जमीन को हमेशा उपजाऊ बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है। ऐसा होने पर न कोई किसान आत्महत्या करेगा और न ही कोई नौजवान अपने गांव की जमीन को बंजर छोड़कर रोजी रोटी की तलाश में शहर में भटकेगा।

अतिरिक्त आय की व्यवस्था

सूखा प्राकृतिक है या लोगों द्वारा पैदा किया गया? - फोटो : getty
किसान अपने खेतों में अनाज उगाकर इतना तो कमा लेता है कि वह आराम से अपना और अपने परिवार का पेट पाल सके, लेकिन अगर कभी बारिश कम हुई या अधिक हो गई, तो किसान की जिंदगी में तूफान सा आ जाता है। या तो सूखे के चलते लहलहाते खेत सूखे घास के मैदान में बदल जाते हैं या फिर अधिक बारिश के चलते किसानों की आंखों के सामने ही उनकी मेहनत पर पानी फिर जाता है।

ऐसी स्थिति से बचने के लिए किसान अपने खेतों के किनारे या मेढ़ों पर पेड़ लगा दिया करते हैं, ताकि जब 5-10 साल बाद वह पेड़ बड़ा हो जाए तो उसे बेचकर कुछ रकम जमा हो सके। अधिकतर किसान पेड़ों को बेचकर अपना घर बनाते हैं, बेटी की शादी करते हैं या फिर किसी ऐसे ही बड़े मौके के लिए पैसों का इंतजाम करते हैं।

कुछ अतिरिक्त आय कमाने के लालच में किसान अपने खेतों के किनारे यूकेलिप्टिस जैसे पेड़ लगा देते हैं, जिनका बाजार में अच्छा मूल्य प्राप्त हो जाता है। लेकिन यूकेलिप्टिस के पेड़ अत्यधिक मात्रा में पानी सोखते हैं, जिससे धरती में पानी का स्तर गिरता है और एक दिन सूखे जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है।

ऐसी स्थिति से निपटने के लिए सरकार को गांव के किसानों को इस बात के लिए जागरुक करना चाहिए कि किस तरह के पेड़ लगाए जाएं ताकि उन्हें अतिरिक्त कमाई भी हो सके और धरती में पानी के स्तर को भी बचाया जा सके। जरूरत पड़ने पर ऐसे क्षेत्रों में यूकेलिप्टिस जैसे पेड़ और गन्ना, धान जैसी फसलों पर बैन भी लगाया जाना चाहिए।
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सूखे से जा चुकी हैं लाखों जानें

सूखा प्राकृतिक है या लोगों द्वारा पैदा किया गया? - फोटो : getty
बंगाल में 1943 में अकाल से बहुत से लोगों की मौत हो गई थी। इस अकाल में भूख और  प्यास से तड़प-तड़प कर करीब 30 लाख लोग बेमौत मारे गए थे।

आपको बता दें कि 1860 के बाद देश में करीब 25 बड़े अकाल आए, जिन्होंने तमिलनाडु, बिहार और बंगाल जैसे प्रमुख राज्यों को अपनी चपेट में लिया।

अगर बात करें दुनियाभर की तो 1876, 1899, 1943-44, 1957, 1966 में पड़े अकालों के दौरान 7 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे। इनमें से अकेले 3 करोड़ लोगों की मौत चीन में 1958-61 के अकाल के दौरान हुई थी। 
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