यह है सरकारी आवास का नियम
बीएसएफ अधिकारियों ने अपनी याचिका में कहा है कि दिल्ली से जिन एग्जीक्यूटिव अफसरों, मिनिस्ट्रियल स्टाफ या जवानों को 'नॉन फैमिली स्टेशन' की पोस्टिंग पर भेजा जाता है, वे अधिकांश जोखिम वाले इलाकों में स्थित हैं। इनमें त्रिपुरा, मणिपुर, जम्मू, मलकानगिरी, मेघालय, उधमपुर, सिल्चर, बांदीपोर, कश्मीर, तेलीमोरा, शिलांग में मोपत, नौशेरा, असम, धूबरी और मिजोरम सहित कई अन्य नक्सल एवं उग्रवाद प्रभावित इलाके शामिल हैं। दिल्ली से सिविल विभाग का कोई कर्मी इन इलाकों में जाता है तो वह तीन साल में वापस लौट आता है। ऐसे में उसका सरकारी आवास खाली होने से बच जाता है।
दूसरी तरफ बीएसएफ है, यहां पर पोस्टिंग का कोई तय समय ही नहीं है। हो सकता कि दोबारा से दिल्ली पहुंचने में छह साल लग जाएं। उसके बाद भी दिल्ली स्टेशन मिलने की गारंटी नहीं है। जो दूसरी पोस्टिंग मिलती है, वह दोबारा से जोखिम वाले इलाकों की हो सकती है। ऐसे में पहले वाले पोस्टिंग स्टेशन पर पहुंचने में आठ या इससे ज्यादा साल भी लग सकते हैं। इस हालत में उन पर सरकारी आवास खाली करने का दबाव डाला जाता है।
क्या कहते हैं अधिकारी और जवान...
सीमा सुरक्षा बल के अधिकारी और जवान, जिनमें डीआईजी, कमांडेंट, सीएमओ, टूआईसी और निरीक्षक से लेकर सिपाही तक शामिल हैं, का कहना है कि केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय की यह नीति ठीक नहीं है। मंत्रालय को फोर्स और सिविल जॉब में अंतर समझना चाहिए। सिविल महकमे का कर्मी तो तीन साल में वापस आ सकता है, लेकिन फोर्स वाला नहीं। उसे तो वह भी मालूम नहीं होता कि अगली पोस्टिंग कहां होनी है। सेंट्रल गवर्नमेंट रेजिडेंशियल अकोमोडेशन रूल्स 2017 के तहत तीन साल की शर्त लगाई गई है। इसका मतलब है कि अगर किसी कर्मी का दिल्ली से बाहर तबादला हो जाता है तो वह तीन साल तक सरकारी आवास अपने पास रख सकता है। उसके बाद या तो वह दोबारा से अपनी पोस्टिंग दिल्ली करा ले या भारी भरकम आर्थिक जुर्माना भरे।
याचिका में कहा गया है कि अब कोरोनाकाल है। डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन का हवाला देकर कहा है कि ऐसे में आवास तलाशने का भी जोखिम है। परिवार को दूसरी जगह शिफ्ट नहीं कर सकते। 'नॉन फैमिली स्टेशन' पर परिवार को नहीं ले जा सकते। वहां तो मकान भी नहीं मिलता। इस अदला-बदली में बच्चों की शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित होगी। याचिका में अधिकारियों और जवानों ने 'आश्रय' को मौलिक अधिकार बताते हुए इस संबंध में अदालतों द्वारा पूर्व में दिए गए कई फैसलों का जिक्र किया है। इस मामले में हाईकोर्ट के समक्ष केंद्रीय गृह सचिव, बीएसएफ डीजी, आईजी बीएसएफ और सचिव, केन्द्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय को पार्टी बनाया गया है।