नागालैंड का रुजाजो गांव, जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ब्रिटिश शासनकाल में शरण दी थी, सालों गुजरने के बाद भी आज तक इस गांव में मोबाइल टावर नहीं लग सका है। 1944 में 'नेताजी' यहां पर आए थे। गांव के लोगों ने नेताजी और आजाद हिंद फौज की हर संभव मदद की थी। जाते वक्त सुभाष चंद्र बोस ने इस गांव की तकदीर बदलने की बात कही थी। सीआरपीएफ के पूर्व एसआई एवं बनारस की सुभाष संस्था के पदाधिकारी तमल सान्याल ने यहां पर मोबाइल टावर लगाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के समक्ष यह मुद्दा उठाया था। बीएसएनएल ने टावर लगाने के लिए फंड नहीं होने की बात कही। हालांकि उन्होंने यह भी लिखा है कि जब नागालैंड में 4जी तकनीक के उपकरण लगेंगे, तो इस गांव पर विचार किया जाएगा। अब नरेंद्र मोदी सरकार ने बीएसएनएल में नई जान फूंकने 1.64 लाख करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। ऐसे में 'रुजाजो' के लोगों को यहां एक टावर लगने की उम्मीद है।
नेताजी अपनी फौज के साथ रुजाजो के निकटवर्ती गांव जेसामी में पहुंचे थे। बाद में वे रुजाजो आ गए। उस वक्त लड़ाई चल रही थी। ब्रिटिश आर्मी के सैनिक लगातार बमबारी कर रहे थे। तमल सान्याल, जिन्होंने इस गांव में मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने के लिए नागालैंड प्रशासन के साथ कई बार पत्राचार किया है, साथ ही उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय तक को चिट्ठी लिखी। वे बताते हैं कि 1944 में सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना नौ दिन तक इस गांव में रही थी। सौ वर्ष से ज्यादा आयु के बपोसूयुवी स्वोरो ने सान्याल के साथ 'नेताजी' से जुड़ी कुछ यादें साझा की थीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने अस्थायी तौर पर इस गांव को अपना मुख्यालय बना लिया था। वे गांव में पत्थरों के बीच ऊंचाई वाली जगह पर आजाद हिंद फौज के अफसरों के साथ बैठक करते थे।