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दीदी...ओ...दीदी: हर चुनावी रैली में यह रट क्यों लगा रहे हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी? जानिए क्या है वजह

Mon, 12 Apr 2021 10:44 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • अपनी लोकप्रियता के सहारे भुनाना चाहते हैं ममता के खिलाफ गुस्सा
  • दीदी-भाइपो नाम लेकर फोड़ रहे हैं हिंसा की राजनीति का ठीकरा
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बंगाल में रैली को संबोधित करते पीएम मोदी - फोटो : Twitter@bjp4india
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विस्तार
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आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सिलिगुड़ी या पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव की कोई भी जनसभा सुन लीजिए। प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाम लिए बिना हुए उन्हें हर दूसरी-तीसरी लाइन में दीदी....दीदी....ओ दीदी....अरे दीदी कहकर संबोधित करते नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री व्यंग्य, तंज से लेकर कई अंदाज में दीदी को निशाने पर लेते हैं। आइये जानते हैं कि प्रधानमंत्री ऐसी रट बार बार क्यों लगा रहे हैं?

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पश्चिम बंगाल में पहले चरण से चुनाव प्रचार और राजनीतिक गतिविधियों की कवरेज के लिए गए पंकज सिन्हा कहते हैं कि हिन्दी भाषी, दूसरे राज्यों से गए लोगों की प्रधानमंत्री की जनसभा में संख्या ठीक-ठाक होती है। पंकज के मुताबिक हिन्दी पट्टी से गए लोग पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लोगों से परेशान हैं। इसलिए जब प्रधानमंत्री दीदी...दीदी कहते हैं तो हिन्दी पट्टी से लेकर तृणमूल कांग्रेस की राजनीति से निराश लोगों को काफी खुशी होती है। बताते हैं कि जनसभा में बीच-बीच में भाजपा के कार्यकर्ता और अन्य लोगों से नारे लगवाकर वह उत्साह बढ़ाते हैं।

प्रधानमंत्री को ऐसा बोलना शोभा नहीं देता : सुब्रत मुखर्जी

तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और ममता सरकार में मंत्री रहे सुब्रत मुखर्जी ने कहा कि प्रधानमंत्री को राज्य की जनता जवाब देगी। उनके यह बोल अब लोगों में चिढ़ पैदा कर रहे हैं। सुब्रत मुखर्जी का कहना है कि एक देश के प्रधानमंत्री के मुंह से इस तरह की भाषा शोभा नहीं देती। इसका जवाब उन्हें दो मई को मिल जाएगा। 

 

क्या यही है महिला का सम्मान: पार्थ चटर्जी

ममता सरकार के एक अन्य मंत्री का कहना है कि प्रधानमंत्री की इस भाषण शैली पर वह कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते। दीदी कहकर चिकोटी काटने वाली रट लगाने का सवाल आपको प्रधानमंत्री से पूछना चाहिए। उनसे पूछना चाहिए कि क्या यही महिलाओं का सम्मान है? पार्थ चटर्जी कहते हैं कि उन्हें कहने दीजिए। दो मई के बाद हम सरकार बनाने जा रहे हैं। टीएमसी के अन्य नेता का कहना है कि प्रधानमंत्री जिस तरीके से भाषण देते हैं, बहुत तकलीफ होती है। वह इसके जरिए अपने पूरे व्यक्तित्व की झलक दिखाते हैं।  

ममता के खिलाफ नाराज लोगों पर है पीएम की नजर

अरुण कोचगवे और विनीत सान्याल मूलत: बंगाल के ही है। दोनों का कहना है कि प्रधानमंत्री के दीदी कहने और भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा जयश्री राम का नारा लगाने से तीन लोगों को चिढ़ पैदा होती है। इस नारे से चिढ़ कुछ महीने पहले ममता बनर्जी के प्रतिक्रिया देने के बाद तेजी से बढ़ी है। 

भाजपा को हो सकता है नुकसान : कोचगवे
कोचगवे कहते हैं कि इससे राज्य का अल्पसंख्यक, तृणमूल का कार्यकर्ता, नेता और तृणमूल का साथ देने वाले बंगाल मूल के लोग चिढ़ते हैं। हालांकि सान्याल का कहना है कि इससे भाजपा को जितना फायदा होगा, उससे अधिक नुकसान हो सकता है। क्योंकि सभ्य बंगाली समाज में इस तरह के व्यवहार की अधिक गुंजाइश नहीं रहती। 

बंगाल को चिढ़ा रहे पीएम: शांतनु बनर्जी

वरिष्ठ पत्रकार शांतनु बनर्जी कहते हैं कि प्रधानमंत्री और केन्द्रीय गृहमंत्री के भाषण को आप ध्यान से सुनिए। खुद समझ में आएगा। दोनों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को न केवल चिढ़ाकर प्रवोक (भड़काने की कोशिश) करते हैं, बल्कि इसके सहारे लोगों तक पहुंचना भी चाह रहे हैं। 

शांतनु कहते हैं कि प्रधानमंत्री की पश्चिम बंगाल में फॉलोइंग है। उनकी जनसभा में भीड़ भी होती है। वह और अमित शाह पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार में पर्याप्त समय दे रहे हैं। कुल मिलाकर मकसद मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़कर ममता बनर्जी और तृणमूल को नुसकान पहुंचाना ही है।
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किसी के साथ बुरा बर्ताव करके अच्छी छवि नहीं बना सकते : विशेषज्ञ

झारखंड और दिल्ली में विधानसभा चुनाव के दौरान एक राजनीतिक दल की टीम के लिए चुनाव विशेषज्ञ यानी सेफालॉजिस्ट के तौर पर काम करने वाले सूत्र का कहना है कि यह राजनीतिक दल के नेताओं के संवाद का अपना-अपना तरीका है। इसके फायदे भी हैं और नुकसान भी। 

सूत्र का कहना है कि कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का सीधा हमला बोलने का एक तरीका है, लेकिन यह गुजरात विधानसभा चुनाव के अलावा कहीं नहीं चल पा रहा है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव के सलाहकारों ने उन्हें कुछ समझ दी होगी और वह नीतीश कुमार पर सीधा हमला बोलने के बोलने के बजाय मुद्दों पर ज्यादा केन्द्रित हो गए। 

दिल्ली के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा बैटिंग कर रही थी तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया ने जनता में अपनी छवि का ख्याल रखकर संतुलित रास्ते को चुन लिया। 

बताते हैं भाजपा को झारखंड, दिल्ली दोनों को याद रखना चाहिए। मेरे विचार में चुनाव के दौरान नेताओं का संवाद बड़ा असर डालता है। यह ठीक उसी फार्मूले पर होता है कि आप किसी के साथ बुरा व्यवहार करके अपनी छवि को अच्छा नहीं बना सकते। इससे विरोधी पक्ष को सहानुभूति मिलने की पूरी संभावना रहती है।
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