किसान नेता ने कहा कि अगर इस कानून को बनाने से पहले किसानों, विशेषज्ञों से और ज्यादा बात की गई होती तो आज के टकराव से बचा जा सकता था, लेकिन इसकी वजह से नरेंद्र मोदी सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करना ठीक नहीं है क्योंकि इसी सरकार ने किसानों के हित में अनेक ऐसे काम किए हैं जो आज तक किसी अन्य सरकार ने नहीं किए।
उन्होंने कहा कि मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल में पूरे पांच साल के दौरान केवल दो लाख करोड़ रुपये से कुछ अधिक के खाद्यान्न की खरीदी की गई थी, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में पांच लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खाद्यान्न की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की गई है। ऐसे में इस सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाना गलत है।
चौधरी के अनुसार किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने भी अपने जमाने में आंदोलन करते हुए यही मांग की थी कि अगर व्यापारी अपनी बनाई सूई को भी अपनी कीमतों पर बेचता है तो किसानों को भी अपनी फसलों को अपने मनचाहे मूल्य पर बेचने की अनुमति क्यों नहीं मिलनी चाहिए। वे भी फसलों को खुले बाजार में बेचने के पक्ष में थे। आज नरेंद्र मोदी सरकार के कानून में इसकी व्यवस्था की जा रही है तो कुछ लोग बिना इसकी असलियत जाने विरोध कर रहे हैं।
किसान नेता ने कहा कि किसानों को डर दिखाया जा रहा है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से उनकी जमीनें छिन जाएंगी, जबकि यह सरासर झूठ है। किसानों और प्राइवेट कंपनियों के बीच समझौता केवल कृषि उपज का होगा, भूमि के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। ऐसे में भूमि छिनने की बात कहना बिल्कुल गलत है।
उन्होंने बताया कि पंजाब में आज भी आलू बीजों का उत्पादन कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए किया जा रहा है। गन्ने की लगभग 80 प्रतिशत खेती आज भी सहकारी समितियों से कॉन्ट्रैक्ट के माद्यम से की जा रही है। ऐसे में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों की जमीन छिन जाएगी, यह बात कहना दुर्भाग्यपूर्ण है।