बतौर यशोवर्धन आजाद, 'इंटेलिजेंस' का फील्ड उतना आसान नहीं होता, जितना देखने में लगता है। जो भी 'खुफिया' सूचना मिलती है, उसे कई तरह से जांचा-परखा जाता है। उससे हजारों-लाखों लोगों का जीवन जुड़ा होता है, इसलिए ऐसे इनपुट को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इनपुट को कई तरह की प्रक्रिया से गुजारने के बाद ग्रेडिंग दी जाती है। संबंधित एजेंसी के साथ उसे साझा किया जाता है। इसके बाद भी वह सौ फीसदी पुख्ता, इस तथ्य का अभाव रहता है। हर परिस्थिति में एक इनपुट को नहीं काटा जा सकता। काबुल एयरपोर्ट पर अमेरिका ने इनपुट जारी किया कि आत्मघाती हमला हो सकता है। कुछ समय सीमा भी बताई गई थी। यूएस ने तीन गेटों का जिक्र भी कर दिया कि यहां हमला होने की आशंका है। इसके बावजूद हमले को रोका नहीं जा सका और दर्जनभर मरीन कमांडो मारे गए। दरअसल, इस केस में एयरपोर्ट के आसपास जो भीड़ जमा थी, उसने 'हमलावर' की राह आसान कर दी। जहां हजारों लोगों की भीड़ है, अफरातफरी है और स्थानीय पुलिस जैसा कुछ नहीं है। ऐसे में हमले को रोक पाना मुश्किल है।
अमेरिका ने अपने सैनिकों और आम नागरिकों से कह दिया था कि वे तीनों सुरक्षा गेट से हट जाएं। यशोवर्धन आजाद ने कहा, बड़ी समस्या यह थी कि उस भीड़ को वहां से कैसे हटाते, जो नाले के भीतर खड़ी अपनी बारी का इंतजार कर रही है। यूएस ने आत्मघाती हमले का अलर्ट जारी किया था। जाहिर सी बात है कि भीड़ में उसे पहचानना आसान नहीं था, जबकि उस वक्त अमेरिकी सेना के पास लोकल एजेंसी का स्पोर्ट नहीं था। वहां हवाई अड्डे के दो पार्ट हैं। एक मिलिट्री साइड है और दूसरी सिविल लोगों के लिए है। ब्लास्ट करने वाले को यह पता था कि वह गेट के अंदर नहीं जा सकेगा। वहां पहचान या स्क्रीनिंग सिस्टम लगा है। वह बाहर ही भीड़ का हिस्सा बन गया। नतीजा, वह स्क्रीनिंग जैसी प्रक्रिया से बाहर हो गया। यही वजह रही कि उसे ब्लास्ट करने में कोई दिक्कत नहीं आई।
अमेरिका ने जब 'आईएसआईएस-के' आतंकियों की कार पर हमला किया तो उसे इनपुट के मुताबिक सफलता मिल गई। वहां भीड़ नहीं थी, इसलिए ड्रोन की मदद से टारगेट को मार गिराने में कोई दिक्कत नहीं आई। उस कार में विस्फोटक पदार्थों की पेटी बांधे लोग बैठे थे। काबुल एयरपोर्ट के आसपास होटल और दूसरा इंफ्रास्ट्रक्चर भी था। साथ ही हजारों लाखों लोगों की लंबी कतारें, इसके चलते पहले इनपुट के आधार पर हमले को नहीं रोका जा सका।