सितंबर में डीएम ने भी इस बाबत आदेश जारी कर दिए, लेकिन किसी ने भी अपने पत्र में यह नहीं दर्शाया कि इस संस्था में लड़कियों को न रखा जाए तो फिर विकल्प क्या होगा। जिले में कोई अन्य बालिका गृह नहीं है। दूसरी संस्था बलिया में है, जो मुख्यालय से करीब 100 किमी दूर है।
मेडिकल और कोर्ट में पेशी के बाद लड़की को बलिया ले जाना और फिर दूसरे दिन ही सुनवाई के लिए समय से कोर्ट में हाजिर करना सिर्फ मुश्किल ही नहीं, खर्चीला भी है। ऐसे में अपनी सहूलियत और कामकाज में आसानी के लिए पुलिस हर बार इसी विकल्प को चुनती थी। अब अपने ही विभाग की ओर से यहां देह व्यापार का पर्दाफाश किए जाने के बाद पुलिसकर्मी मुश्किल में हैं।
जिले के एक थाने में तैनात अधिकारी ने बताया कि वह लोग तो सिर्फ अफसरों के निर्देश का पालन करते थे। अगर वरिष्ठ अधिकारियों की सहमति न होती तो क्यों लड़कियों को वहां रखते। उन्होंने बताया कि एक पूर्व अफसर ने ही बाकायदा मौखिक रूप से पुरानी व्यवस्था को कायम रखने को कहा था। मौजूदा एसपी भी इस पर चुप्पी साधे रहे।