22 सितंबर 2017 को रिलीज हुई फिल्म 'न्यूटन', जिसे भारत की ओर से ऑस्कर के लिए नामित किया गया था, यह फिल्म सीआरपीएफ के पूर्व एसआई तमल सान्याल को आहत कर गई। सान्याल का कहना था कि इस फिल्म में जानबूझकर देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल की छवि खराब की गई है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सीआरपीएफ की जांबाजी से देश का बच्चा-बच्चा परिचित है। हैरानी की बात यह थी कि सीआरपीएफ ने भी इस मामले में कभी पूर्व एसआई का साथ नहीं दिया। सान्याल ने अपनी लड़ाई जारी रखी और फिल्म के खिलाफ अदालत पहुंच गए।
अब दो साल बाद कड़कड़डूमा के सीनियर सिविल जज की अदालत ने मानहानि के केस में न्यूटन फिल्म के निर्माता मनीष मुंद्रा और सेंसर बोर्ड (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) को नोटिस जारी कर दिया है। इन दोनों पक्षों को 5 दिसंबर तक अदालत के समक्ष पेश होना है। 'न्यूटन' को लेकर कड़कड़डूमा अदालत में ही अपराधिक शिकायत का मामला भी लंबित है।
इस फिल्म में सीआरपीएफ को लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया को दागदार करते हुए दिखाया गया है। इसी से आहत होकर पूर्व एसआई तमाल सान्याल फिल्म के खिलाफ अदालत में पहुंच गए। उनका कहना है कि विश्व के सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ को सुनियोजित तरीके से बदनाम किया जा रहा है। इस बल के अफसरों और जवानों ने जम्मू-कश्मीर के अलावा नक्सल प्रभावित राज्यों में शांति स्थापित करने के लिए अपना बलिदान दिया है। पूर्व अर्द्धसैनिक बलों के कर्मियों की वेलफेयर एसोसिएशन की राष्ट्रीय समन्वय कमेटी ने भी फिल्म को लेकर तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को शिकायत दी थी।
सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पंवार ने भी राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था। उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि वे डीजी सीआरपीएफ को आदेश देकर इस मामले की जांच कराएं। साथ ही, सीआरपीएफ को भी इस मामले में अदालत के समक्ष पार्टी बनना चाहिए। खास बात यह रही कि उस वक्त सीआरपीएफ की ओर से एक भी अधिकारी या कर्मचारी आगे नहीं आया। सान्याल के मुताबिक इस फिल्म में बल की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया, लेकिन इसके बावजूद सीआरपीएफ के अफसरों ने चुप्पी साध ली।
गृह मंत्रालय ने जब इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की, तो सान्याल ने शिकायत की एक प्रति भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्रीय फिल्म प्रमाण बोर्ड के चेयरमैन को भेजी थी। सान्याल का कहना है कि सीआरपीएफ व दूसरे अर्धसैनिक बल नक्सल प्रभावित क्षेत्र में सिविक एक्शन कार्यक्रम चलाकर लोगों का जीवन स्तर उपर उठा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जहां पहले मतदान प्रक्रिया निष्पक्ष और शांतिप्रिय नहीं रहती थी, अब वहां पर मतदाता बिना किसी भय के अपना वोट डालते हैं।
नक्सली क्षेत्रों में स्थित गहन जंगलों में जहां स्थानीय पुलिस या चुनाव अधिकारी भी नहीं पहुंच पाते थे, आज सीआरपीएफ व दूसरे बलों ने वहां पर शांतिपूर्वक मतदान सुनिश्चित किया है। उन्हें इस बात पर हैरानी है कि सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को कैसे हरी झंडी दे दी। सेंसर बोर्ड को फिल्म बनाने वाले के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी। फिल्म में डिसक्लेमर भी नहीं दिया गया था।
तमल सान्याल का कहना है कि 2017 में जब 'न्यूटन' रिलीज हुई, तभी से ही वे इसके खिलाफ आवाज उठा रहे हैंl उन्होंने अपने महकमे के कई अफसरों से मदद का आग्रह किया था, लेकिन कोई आगे नहीं आया। सान्याल के मुताबिक दो साल पहले जब वे सिलचर में तैनात थे, तो वहां के डीआईजी से 'न्यूटन' फिल्म के केस में पैरवी करने के लिए छुट्टी मांगी थी, जो नहीं दी गई। मुझे अदालती औपचारिकताएं पूरी करने के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट आना था, लेकिन अधिकारियों ने छुट्टी मंजूर नहीं की।
तमल सान्याल के मुताबिक कई बार पैसे की तंगी सामने आई, लेकिन वे पीछे नहीं हटे। ये लड़ाई मेरी नहीं है, बल्कि सीआरपीएफ के तीन लाख से ज्यादा उन जांबाजों की लड़ाई है, जिनकी छवि को न्यूटन फिल्म में दागदार होते दिखाया गया है। आज भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सीआरपीएफ जैसी बहादुर फोर्स का सम्मान के साथ नाम लिया जाता है। सान्याल ने अपने वकील वैभव कालरा और नेहा भटनागर का आभार जताया है, जिन्होंने उनके केस को यहां तक पहुंचा दिया है। बतौर सान्याल, मुझे उम्मीद है कि अदालत से सीआरपीएफ को न्याय मिलेगा।