अपर्णा मां पार्वती का एक नाम है। देवी का एक रूप लक्ष्मी का भी है। मूक-बधिर माता-पिता की जिंदगी में अपर्णा साक्षात लक्ष्मी बनकर आई। दैवीय कृपा से अपर्णा बोल-सुन सकती है। जिंदगी की जद्दोजहद में गुरबत की चक्की में पिसते परिवार के लिए अपर्णा वरदान से कम नहीं है।
19 साल की अपर्णा ने सॉफ्ट ट्वॉयज का कारोबार शुरू किया। परिवार के प्रयास और अपर्णा की मेहनत से अब परिवार अपने पैरों पर खड़ा है। उनके बनाए ट्वायज बहजोई, बदायूं, आगरा, अलीगढ़, बबराला, मुरादाबाद के व्यापारी हाथों-हाथ लेते हैं। अपर्णा के माता-पिता बोल तो नहीं सकते मगर इशारों में कहते हैं- 'मेरी बेटी ही मेरी शक्ति है।'
चंदौसी के गोपाल मोहल्ला निवासी सुनीत अग्रवाल और उनकी पत्नी ममता बचपन से ही मूक बधिर व श्रणव बधिर हैं। सामूहिक विवाह परिचय सम्मेलन में दोनों ने एक दूसरे को जीवन साथी के रूप में चुन लिया। जब संतान हुई तो दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। लेकिन समय उनके धैर्य की और परीक्षा लेना चाहता था।
दोनों संतानें बेटा शुभम और बेटी टीना मूक बधिर थीं। लेकिन इस सब्र का फल भी जल्द ही मिल गया। उनके एक और संतान हुई जिसका नाम उन्होंने अपर्णा रखा। अपर्णा सुन और बोल सकती थी। उसकी यह खासियत परिवार के लिए सफलता की सीढ़ी बन गई।
माता-पिता के लिए आवाज का काम करती है अपर्णा
अपर्णा
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अपर्णा से पहले परिवार तंगहाली में था। अपर्णा बड़ी हुई, लेकिन बेटी बड़ी हुई तो उसने साफ्ट ट्वायज बनाने का कारोबार अपनाया। पूरा परिवार सॉफ्ट ट्वायज बनाता है। पिता सुनीत के साथ बेटी अपर्णा हर जगह जाती है। आर्डर लेने, डिलीवरी, हिसाब-किताब के काम में अपर्णा माता-पिता के कान और आवाज का काम करती है।
वह पिता को इशारों से सभी चीजें समझाती है। परिवार अब खुद को असहाय नहीं मानता। अबोलों के घर में अपर्णा के बोल से घर-आंगन चहचहाता रहता है। सुनीत इशारों में ही बेटी की अहमियत का बखान करते हैं। वाणी से ज्यादा उनकी आंखें बोलती हैं- उनकी बेटी ही उनका धन और अभिमान है।
'मेरे माता-पिता ने मुझे जीवन दिया। उन्हें ईश्वर ने कुछ गुणों से वंचित रखा है। मैं इसे पूरा करना चाहती हूं। भविष्य में बैंकिंग क्षेत्र में नौकरी करना चाहती हूं। विवाह के बाद कभी कुछ सोचा नहीं। लेकिन मम्मी-पापा के साथ हमेशा ऐसे ही रहना चाहती हूं।'
-अपर्णा अग्रवाल