डेटा सुरक्षा कानून बिल को जल्द ही मानसून सत्र में पेश किया जायेगा जहां पिछले साल अगस्त में बने जस्टिस बी.एन. श्रीकृष्ण समिति की सिफारिशों पर चर्चा होगी और फिर इसे पास किया जा सकता है। लेकिन कमेटी की सिफरिशों को सरकार के पक्ष में ज्यादा बताते हुए कई संस्थायें इसका विरोध जता रही हैं। सुुप्रीम कोर्ट ने पहले ही 'आधार' मामले में निजता के कानून के तहत इसके गलत इस्तेमाल को असंवैधानिक करार देते हुए सरकार से जवाब मांगा था और कुछ हिदायते दी थी। जिस पर सरकार ने आश्वस्त किया था कि आधार के डेटा बिल्कुल सुरक्षित हैं। जबकि हैकिंग के जरिए डेटा लीक के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
4) डेटा सुरक्षा के लिए आधार एक्ट में संशोधन हो लेकिन यह पिछली तारीख से लागू ना हो।
5) डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी का गठन हो। इसके आदेशों पर सुनवाई के लिए सरकार अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाए या मौजूदा ट्रिब्यूनल को अधिकार दे।
इस प्रस्ताव के पक्ष में कई लोगों का मानना है कि समिति की सिफारिशें नागरिक के निजता के अधिकारों की वकालत करती हैं और कानूनों या नीतियों में ऐसे सुधारों की अपेक्षा करती हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा सिटीजन फ्रेंडली हों जबकि विरोध करने वाले इसे सरकार की मनमानी और निगरानी तंत्र का हाथ खुला रखने की कोशिश दिखाते हैं।
सुरक्षा के कड़े कदम
1 रिपोर्ट में आधार एक्ट में सुरक्षा के कड़े कदम उठाने को कहा गया है
2 भारत में इस्तेमाल, जाहिर, इकट्ठा और प्रोसेस होने वाले निजी डेटा को प्रोसेस करने का अधिकार सरकार को होगा।
3 कंपनियों के डेटा या कंपनियों तक पहुंचने वाले ग्राहकों के डेटा पर भी सरकार को प्रोसेस का अधिकाक होगा।
4 कोई कंपनी अगर डेटा सुरक्षा कानून का उल्लंघन करती पाई जाती है तो उसे अपने कुल वैश्विक टर्नओवर का 2 % या 5 करोड़ रुपए, दोनों में जो अधिक हो, बतौर दंड भरना होगा।
5 सार्वजनिक हित, कानून व्यवस्था, आपात परिस्थितियों में राज्य, यूजर से सहमति लिए बगैर उसके डाटा को प्रोसेस कर सकता है अन्यथा यूजर की सहमति लेनी होगा।
कंपनियों पर असर
कानून में विदेशी कंपनियों को डेटा भारत में स्थानिकृत करने का नियम है यानि पर्सनल डेटा को प्रोसेस करने वाली संस्था या इकाई (फिडुश्यरी) को भारत में स्थित किसी सर्वर या डेटा सेंटर में भी उक्त डेटा को अनिवार्य रूप से स्टोर करना होगा। अगर एसा होता है तो छोटी कंपनियों के लिए तो भारत में रहना या निवेश करना मुश्किल होता जाएगा।
राइट टू फॉरगेटिंग का अधिकार?
जानकारों ने ड्राफ्ट बिल के एक और पक्ष को कमजोर बताया है जो है राइट टू फॉरगेटिंग यानी भूलने के अधिकार। राइट टू फॉरगेटिंग को इस बिल में सीमित रखा गया है। जहां यूरोपीय संघ का जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (जीडीपीआर) यूजर को ये अधिकार देता है कि वो कंपनी को अपने ऑनलाइन डेटा को पूरी तरह से डिलीट करने को कह सकता है वहीं भारत का प्रस्तावित बिल, यूजर को ये छूट नहीं देता।
आपको बता दें कि भारत में बड़े पैमाने पर डैटा चोरी के मामले हो चुके हैं जैसे 2017 में याहू कंपनी के करीब तीन अरब एकाउंट पर हैकर्स ने हाथ साफ कर दिया था। 2014 ई-कॉमर्स कंपनी ईबे ने कहा था कि हैकर्स ने कंपनी के करीब 14.5 करोड़ यूजर्स के नाम, पता, जन्मतिथि का डेटा चुरा लिया था। 2017 मे उबर की 5.7 करोड़ यूजर्स के डेटा लीक हो गया। इसी तरह मैक्स भूपा और पिज्जा हट का भी डेटा लीक हो चुका है।
डेटा आज किसी संपत्ति से कम नहीं इसलिए सरकार भी इसे गंभीरता से ले रही है लेकिन सवाल ये है कि क्या आपकी निजता को सरकार संभाल कर रख पायेगी और क्या इस्तेमाल जन कल्याण के लिए होगा? ये सभी सवाल संसद में पूछे जायेंगे। इस ड्राफ्ट बिल पर पहले आईटी मंत्रालय, पीएमओ और कैबिनेट स्तर पर गहन चर्चा होगी और उसके बाद इसे संसद में पेश किया जाएगा।