Dalit Reservation- दिल्ली में दलित आरक्षण पर प्रेस कांफ्रेंस करते विहिप नेता डॉ. सुरेंद्र जैन और पूर
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विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने धर्मांतरण के बाद भी दलित/आदिवासियों के कोटे से आरक्षण की मांग को असंवैधानिक बताया है। संगठन ने कहा है कि संविधान निर्माण के समय बहस करते हुए संविधान निर्माता बाबा साहब आंबेडकर ने भी इस तरह की मांग को असंवैधानिक बताते हुए कहा था कि आरक्षण की व्यवस्था केवल हिंदू समुदाय के दलितों/आदिवासियों के लिए है। इसके बाद सर्वोच्च अदालत में हुई कई सुनवाई में भी कोर्ट ने यही व्यवस्था दी थी। संगठन के मुताबिक़, धर्मांतरण के बाद भी दलित कोटे से आरक्षण की मांग देश को तोड़ने की साजिश है। इस मुद्दे पर जनजागृति के लिए विहिप जनजागृति अभियान चलाएगा।
ईसाई धर्म में कोई जातीय व्यवस्था नहीं
विहिप के वरिष्ठ नेता डॉ. सुरेंद्र जैन ने सोमवार को एक प्रेसवार्ता के दौरान कहा कि इस्लाम और ईसाई धर्म समुदाय हमेशा इस बात का दावा करते रहे हैं कि उनके धर्म में कोई जातीय व्यवस्था नहीं है। संविधान निर्माता बाबा साहब अंबेडकर ने आरक्षण की व्यवस्था हिंदू धर्म में निचले जातीय व्यवस्था में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर उठाने के लिए किया था। ऐसे में जातीय व्यवस्था न होने के कारण धर्मांतरित व्यक्ति को आरक्षण पाने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए।
डॉ. जैन ने कहा कि 1932 में पूना पैक्ट के समय डॉ. भीमराव आंबेडकर और महात्मा गांधी ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण पर सहमति व्यक्त की थी। दुर्भाग्य से 1933 से ही मिशनरी और मौलवी मतांतरित अनुसूचित समाज के लिए आरक्षण की मांग निरंतर उठाते रहे हैं। 1936 में महात्मा गांधी और अंबेडकर ने इस मांग को अनुचित ठहराया था। संविधान सभा में भी जब इस मांग को पुनः उठाया गया, तो संविधान निर्माता अंबेडकर ने इसे देश विरोधी सिद्ध करते हुए ठुकरा दिया था।
नेहरू और इंदिरा ने बताया था अनुचित
विहिप नेता ने दावा किया कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और बाद में पीएम बनीं इंदिरा गांधी ने अपने-अपने समय में इस मांग को अनुचित करार दिया था। इसी मांग को लेकर 1995 में दिल्ली में एक 10 दिवसीय धरने का आयोजन ईसाई मिशनरियों के द्वारा किया गया था, जिसमें मदर टेरेसा ने भी भाग लिया था। विहिप नेता ने आरोप लगाया कि बार-बार ठुकराने के बावजूद इस मांग को लेकर उनकी निरंतरता यह सिद्ध करती है कि उनके पीछे धर्मांतरण करने वाली अंतरराष्ट्रीय शक्तियां काम कर रही हैं।
संगठन के मुताबिक़, 1985 में ‘सुसाइ व अन्य विरुद्ध भारत सरकार’ मामले में तो सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि धर्मांतरित अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण की मांग संविधान की मूल भावना के विपरीत है। इसके बावजूद 2004 में इस मामले को एक बार फिर न्यायपालिका में लाया गया, जिस पर इस समय सुनवाई चल रही है। विहिप इस मांग के विरोध में एक राष्ट्रव्यापी जनजागरण अभियान चलाएगा।
षड्यंत्र नहीं होगा सफल
वाल्मीकि महासभा के अध्यक्ष और पूर्व न्यायाधीश पवन कुमार ने कहा कि अनुसूचित जाति के लोगों के अधिकारों पर डाका डालने का प्रयास सफल नहीं हो पाएगा। अनुसूचित समाज किसी भी स्थिति में इन षडयंत्रों को सफल नहीं होने देगा। उन्होंने कहा कि यह मांग षड्यंत्र पूर्ण, राष्ट्र विरोधी और संविधान विरोधी है।