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तरक्की के मोर्चे पर पिछड़ते CRPF के ग्राउंड कमांडर: कैडर रिव्यू को लेकर गंभीर नहीं 'गृह मंत्रालय और बल मुख्यालय'

सार

बल मुख्यालय द्वारा 27 सितंबर को कमेटी के सदस्यों को सूचित किया गया है कि कैडर समीक्षा बैठक 30 सितंबर को होगी। कैडर रिव्यू कमेटी को मिली रिपोर्ट में सुझाव आया है कि ग्राउंड कमांडरों के लगभग साढ़े चार सौ पद खत्म कर दिए जाएं। इससे तरक्की जल्द मिल जाएगी। इस बाबत मिनिस्ट्रियल स्टाफ ने एतराज जताया है...
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सीआरपीएफ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सीआरपीएफ के ग्राउंड कमांडर यानी 'सहायक कमांडेंट' भले ही आतंकियों व नक्सलियों से निपटने, राष्ट्रीय आपदा, चुनाव और कानून व्यवस्था के मामले में अव्वल रहते हों, मगर वे तरक्की के मोर्चे पर पिछड़ते जा रहे हैं। हैरानी की बात तो ये है कि इन जांबाज कमांडरों की कैडर समीक्षा प्रक्रिया को लेकर 'केंद्रीय गृह मंत्रालय और बल मुख्यालय' गंभीर नहीं हैं। डीओपीटी द्वारा फरवरी में कैडर समीक्षा प्रक्रिया शुरू करने के लिए कहा गया था। जून 2021 में वह रिपोर्ट कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी 'एमएचए' द्वारा डीओपीटी के पास जमा करानी थी। अभी तक वह रिपोर्ट बल मुख्यालय से ही बाहर नहीं निकल सकी है। सीआरपीएफ कैडर अधिकारियों का कहना है कि 'सहायक कमांडेंट, डिप्टी कमांडेंट और सेकेंड इन कमांड' इन तीन पदों पर प्रमोशन लेना बहुत मुश्किल हो गया है। सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति मिलने में 10-12 साल से ज्यादा समय लग रहा है। अगर यूं ही चलता रहा तो उन्हें कमांडेंट तक पहुंचने में 25 साल लग जाएंगे। मतलब रिटायरमेंट की दहलीज पर जाकर, उन्हें बटालियन को कमांड करने का मौका मिल सकेगा। कैडर अफसरों की नजरें अब 30 सितंबर को बल मुख्यालय में होने जा रही समीक्षा बैठक पर लग गई हैं। सीआरपीएफ एडीजी सेंट्रल जोन, नितिन अग्रवाल ‘कैडर रिव्यू कमेटी ऑफ ग्रुप ए एग्जीक्यूटिव ऑफिसर्स’, की अध्यक्षता करेंगे।

हर पांच साल बाद होती है कैडर प्रक्रिया

बता दें कि पहले तत्कालीन स्पेशल डीजी जेएंडके जोन, संजय अरोड़ा को इस कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था। पिछले दिनों उनकी पोस्टिंग डीजी आईटीबीपी के पद पर हो गई। इसके बाद नितिन अग्रवाल को कैडर रिव्यू कमेटी ऑफ ग्रुप ए एग्जीक्यूटिव ऑफिसर्स, के चेयरमैन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कैडर रिव्यू को लेकर बल की कई यूनिटों से सुझाव लिए गए हैं। बल के कैडर अधिकारियों के अलावा मिनिस्ट्रियल स्टाफ की तरफ से भी रिपोर्ट मिली है। यह कैडर प्रक्रिया हर पांच साल बाद होती है। इससे पहले 15 दिसंबर 2015 को कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी ने सीआरपीएफ के कैडर रिव्यू को लेकर बैठक की थी। उसके बाद केंद्रीय कैबिनेट ने 29 जून 2016 को कैडर रिव्यू के फाइनल प्रपोजल को मंजूरी दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी पदोन्नति से जुड़े मामले में यह आदेश दिया था कि सीआरपीएफ में कैडर समीक्षा की कार्यवाही 30 जून तक पूरी कर ली जाए। इसके बावजूद केंद्रीय गृह मंत्रालय और सीआरपीएफ मुख्यालय ने गंभीरता नहीं दिखाई। जून तक कैडर समीक्षा रिपोर्ट जमा नहीं हो सकी। 10 सितंबर को डीओपीटी द्वारा केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिमाइंडर भेजा गया है।

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30 सितंबर को बैठक

बल मुख्यालय द्वारा 27 सितंबर को कमेटी के सदस्यों को सूचित किया गया है कि कैडर समीक्षा बैठक 30 सितंबर को होगी। कमेटी के अन्य सदस्यों में अजय यादव आईजी, विवेक वैद्य आईजी, बीके शर्मा डीआईजी, निखिल रस्तोगी कमांडेंट, अनुराग सिंह सेकेंड इन कमांड, एके सिंह डिप्टी कमांडेंट और मनुश्री सहायक कमांडेंट शामिल हैं। कैडर रिव्यू कमेटी को मिली रिपोर्ट में सुझाव आया है कि ग्राउंड कमांडरों के लगभग साढ़े चार सौ पद खत्म कर दिए जाएं। इससे तरक्की जल्द मिल जाएगी। इस बाबत मिनिस्ट्रियल स्टाफ ने एतराज जताया। इनका कहना था कि इससे तो निरीक्षक मिनिस्ट्रयल को कभी सहायक कमांडेंट बनने का अवसर ही नहीं मिलेगा। इसी तरह के कई दूसरे प्रपोजल भी बल मुख्यालय को प्राप्त हुए हैं।

ग्राउंड कमांडरों का तर्क है कि वे बल की तरफ से हर छोटा-बड़ा जोखिम उठाते हैं। सभी तरह के ऑपरेशनों को लीड करते हैं। यूपीएससी से नियुक्ति मिलने के बावजूद प्रमोशन में वे पिछड़ जाते हैं। अभी तक 2009 बैच के असिस्टेंट कमांडेंट को पहला प्रमोशन नहीं मिला है। डिप्टी कमांडेंट बनने के लिए उन्हें 12 से 15 साल का समय लग रहा है। 2004 बैच के डिप्टी कमांडेंट को 17 वर्षों के बाद भी 'सेकेंड इन कमांड' का पद नहीं मिल सका। अब बारी आती है कमांडेंट बनने की। 1999 बैच के कैडर अधिकारी 22 वर्षों के बाद कमांडेंट बनने का इंतजार कर रहे हैं।
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कमांडेंट बनने में लगेंगे 25 से 30 साल

कैडर अधिकारियों के मुताबिक, अगर कैडर रिव्यू में कुछ नहीं हुआ तो 3-4 साल बाद कमांडेंट बनने के लिए 25 से 30 साल लगेंगे। नक्सल और आतंकवाद वाले कई इलाके तो ऐसे हैं जहां ग्राउंड कमांडरों को ठीक से मूलभूत सुविधा भी नहीं मिल पाती। सीएपीएफ से रिटायर्ड अधिकारी वीपीएस पंवार और एसएस संधू बताते हैं कि अगर कैडर अफसर अपने हकों की बात मीडिया में करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो जाती है। सीएपीएफ के दस हजार अफसर अपने प्रमोशन को लेकर चिंतित हैं। बीस साल की सेवा के बाद आईपीएस अधिकारी आईजी बन जाता है, लेकिन इस अवधि में कैडर अफसर मुश्किल से कमांडेंट के पद तक पहुंच पाता है। उसे आईजी बनने में 33-35 साल लग जाते हैं। खास बात, यहां तक भी सभी कैडर अधिकारी नहीं पहुंच पाते। डीओपीटी ने 2008-09 के दौरान सीएपीएफ में 'आर्गेनाइज्ड ग्रुप ए सर्विस' के तहत सेवा नियम बनाने के आदेश जारी किए थे। विभाग ने उसी को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

कैडर अधिकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार की 55 संगठित कैडर वाली सेवाओं में अधिकतम बीस साल बाद सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड मिलता है। इसके बाद आईएएस अधिकारी जेएस रैंक पर और आईपीएस, आईजी के पद पर चला जाता है। लिहाजा ये कैडर सर्विस हैं, इसलिए इनमें टाइम बाउंड प्रमोशन यानी एक तय समय के बाद पदोन्नति मिल जाती है। इन सेवाओं में रिक्त स्थान नहीं देखा जाता। जगह खाली हो या न हो, मगर तय समय पर प्रमोशन जरूर मिलता है। सीआरपीएफ में प्रमोशन उस वक्त होता है, जब सीट खाली होती है। अगर किसी फोर्स में एक साथ कई बटालियनों का गठन होता है तो ही प्रमोशन की कुछ संभावना बनती है। इसे नॉन प्लान ग्रोथ कहा जाता है। डीओपीटी ने इस बाबत भी दिशा निर्देश जारी कर कहा था कि किसी भी फोर्स में नॉन प्लान ग्रोथ नहीं होगी। जो भर्ती होगी, वह योजनाबद्ध तरीके से ही की जाएगी। 2001 और 2010 में भर्ती नियमों को बदला गया, लेकिन उनमें इतनी ज्यादा विसंगतियां थीं कि उससे कैडर अफसरों को फायदा होने की बजाए नुकसान हो गया। अधिकारियों को ओजीएएस और एनएफएफयू की मूल भावना को लेकर संघर्ष करना पड़ा है। आईपीएस डीआईजी के पद खाली रहते हैं, लेकिन उन्हें स्थायी तौर पर कैडर अधिकारियों को नहीं दिया जाता।
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