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सरकार की आलोचना करना राजद्रोह नहीं : सुप्रीम कोर्ट

Tue, 06 Sep 2016 12:44 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार की तीखी आलोचना पर तो राजद्रोह की बात छोड़िए, मानहानि का भी मुकदमा नहीं बनता। शीर्ष अदालत ने पुलिस और ट्रायल जज सहित तमाम अथॉरिटी को संविधान पीठ की उस व्यवस्था को अपनाने का निर्देश दिया है,जिसमें कहा गया है कि हिंसा भड़कने की आशंका या हिंसा के मामले में ही भारतीय दंड संहिता की धारा-124 ए (राजद्रोह का मुकदमा) लगाई जा सकती है।
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न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने कहा कि राजद्रोह के आरोप को लेकर एफआईआर दर्ज करने के लिए दिशानिर्देश जारी करना आपराधिक न्यायशास्त्र के दायरे में नहीं आना चाहिए। संविधान पीठ ने जरूरी दिशानिर्देश बनाए हैं, जिसे सभी अथॉरिटी को पालन करना चाहिए।

पीठ ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति सरकार की कड़ी आलोचना करता है तो उसपर देशद्रोह का मुकदमा तो दूर आपराधिक मानहानि का मामला भी नहीं बनता। पीठ ने सभी अथॉरिटी को केदार नाथ सिंह बनाम बिहार मामले में 1962 में संविधान पीठ द्वारा दी गई व्यवस्था का पालन करने के लिए कहा है।
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'जिनमें कानून का दुरुपयोग हुआ हो ऐसे मामले सामने लाए'

सुप्रीम कोर्ट
अदालत गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज और एसपी उदयकुमार की ओर से दाखिल उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें राजद्रोह कानून का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग का आरोप लगाया गया हे। याचिका में गुहार की गई है कि सरकारों को 1962 में केदारनाथ बनाम बिहार मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि आमतौर पर पुलिसवालों को केदारनाथ मामले में शीर्ष अदालत द्वारा दिशानिर्देश के बारे में पता नहीं होता है। लिहाजा मनमाने तरीके से लोगों को गिरफ्तार किया जाता है। कई मामलों में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है। उन्होंने शिकायत की थी कि सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र नेता, पत्रकार, कार्टूनिस्ट, लेखक, अभिनेता आदि पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जाता है।

राजद्रोह एक गंभीर अपराध है लेकिन घोर नाराजगी की स्थिति में इससे जुड़े कानून का व्यापक दुरुपयोग किया जा रहा है। इस पर पीठ ने प्रशांत भूषण से कहा कि आप ऐसे मामले सामने लाएं, जिनमें इस कानून का दुरुपयोग हुआ हो, हम उचित आदेश पारित करेंगे। इस पर भूषण ने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के आंदोलनकारियों और कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर लगाए गए देशद्राह का हवाला दिया।

'आदेश मामला-दर-मामला पर आधारित होगा'

सुप्रीम कोर्ट
हालांकि अदालत ने साफ किया कि हर मामले पर आदेश एकसमान नहीं हो सकता। आदेश मामला-दर-मामला पर आधारित होगा। अदालत ने इस तरह का निर्देश देने से इनकार किया कि राजद्रोह का मुकदमा दर्ज करने से पहले पुलिस महानिदेशक का अप्रूवल अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। अदालत ने साफ किया एफआईआर दर्ज करने की एक प्रक्रिया है, हम निर्देश जारी कर उसमें बदलाव नहीं कर सकते।

पीठ ने यह भी कहा कि हम यह बात नहीं मान सकते कि पुलिस महानिदेशक और ट्रायल जज को केदारनाथ मामले पर संविधान पीठ के फैसले की जानकारी न हो। बावजूद इसके हम उन्हें फिर से याद दिला रहे हैं। याचिका में कहा कि हर सरकार अपने विरोधियों की आवाज दबाने के लिए धारा-124ए का दुरुपयोग कर रही है।

राजनीतिक फायदे के लिए बड़े पैमाने पर विभिन्न सरकारें इसका इस्तेमाल कर रही हैं। गिरफ्तारी और राजद्रोह का मुकदमा दर्ज करने में पुलिस और सरकारें शायद ही सुप्रीम कोर्ट की पाबंदियों का सम्मान करती है। याचिका में नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि वर्ष 2014 में राजद्रोह के 47 मुकदमे दर्ज किए गए थे। इन मामलों में 58 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन केवल एक ही मामले में सरकार आरोपी पर दोष साबित करने में सफल रही।
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क्या है संविधान की पीठ की व्यवस्था

हिंसा भड़कने की आशंका या हिंसा के मामले में ही भारतीय दंड संहिता की धारा-124 ए का इस्तेमाल करते हुए राजद्रोह का मुकदमा दायर किया जा सकता है। 

संविधान में देशद्रोह की परिभाषा
संविधान की धारा 124 (अ) में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति देश के खिलाफ लिखकर, बोलकर, संकेत देकर या किसी भी अभिव्यक्ति से विद्रोह करता है, लोगों को उकसाता है, नफरत फैलाने का काम करता है तो आईपीसी की धारा 124 (अ) के तहत उस पर केस बनता है। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने वाले को अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान है।

 - सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के केस में फैसला सुनाते हुए फेडरल कोर्ट ऑफ इंडिया (ब्रिटिश) से सहमति जताई थी। उस समय यह व्यवस्था दी थी कि सरकार की आलोचना या प्रशासन पर टिप्पणी देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आती है।

मामले : नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक साल 2014 में देशद्रोह के कुल 47 मुकदमे दाखिल हुए और 58 लोगों को गिरफ्तार किया गया। दोष सिर्फ एक मामले में साबित हो पाया।

- 2016 के आठ माह में देशद्रोह के 18 केस में 19 लोगों को अभियुक्त बनाया गया है।
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