देश में अपराध के पिछले दस वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें, तो महिलाओं के साथ हो रहे आपराधिक मामलों में तेजी देखने को मिल रही है। साल 2013 में महिलाओं के खिलाफ हुए ऐसे अपराध, जिनमें आईपीसी की धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए थे, वह संख्या 2,95,896 थी। साल 2022 में अगर इस संख्या को देखें, तो वह 3,65,300 पर पहुंच गई है। रोजाना औसतन एक हजार महिलाओं के खिलाफ आईपीसी में आने वाले अपराध हो रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में तीन बिल प्रस्तुत किए हैं। इंडियन पीनल कोड 1860, द कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 और इंडियन एविडेंस एक्ट 1872। लोकसभा और राज्यसभा ने इन बिलों को पास कर दिया है। शाह का मानना है कि ये बिल सिर्फ संशोधन बिल नहीं हैं, इनकी मदद से पूरा कानून ही बदल जाएगा। ये बिल मौजूदा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में बुनियादी बदलाव लाएंगे।
महिलाओं के प्रति बढ़ रहे आईपीसी अपराध ...
साल आईपीसी के तहत दर्ज मामले
2013 295896
2014 326115
2015 315632
2016 325652
2017 315215
2018 323304
2019 342639
2020 311354
2021 357671
2022 365300
देश में अपराध के पिछले दस वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें, तो महिलाओं के साथ हो रहे आपराधिक मामलों में तेजी देखने को मिल रही है। साल 2013 में महिलाओं के खिलाफ हुए ऐसे अपराध, जिनमें आईपीसी की धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए थे, वह संख्या 2,95,896 थी। साल 2022 में अगर इस संख्या को देखें, तो वह 3,65,300 पर पहुंच गई है। रोजाना औसतन एक हजार महिलाओं के खिलाफ आईपीसी में आने वाले अपराध हो रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में तीन बिल प्रस्तुत किए हैं। इंडियन पीनल कोड 1860, द कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर 1973 और इंडियन एविडेंस एक्ट 1872। लोकसभा और राज्यसभा ने इन बिलों को पास कर दिया है। शाह का मानना है कि ये बिल सिर्फ संशोधन बिल नहीं हैं, इनकी मदद से पूरा कानून ही बदल जाएगा। ये बिल मौजूदा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में बुनियादी बदलाव लाएंगे।
साल आईपीसी के तहत दर्ज मामले
2013 295896
2014 326115
2015 315632
2016 325652
2017 315215
2018 323304
2019 342639
2020 311354
2021 357671
2022 365300
• भारतीय न्याय संहिता ने यौन अपराधों से निपटने के लिए 'महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराध' नामक एक नया अध्याय पेश किया है।
• इस विधेयक में 18 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के बलात्कार से संबंधित प्रोविजन में बदलाव का प्रस्ताव कर रहा है।
• नाबालिग बच्चियों के सामूहिक बलात्कार को पॉक्सो के साथ सुसंगत बनाता है।
• 18 वर्ष से कम आयु की बच्चियों के मामले में आजीवन कारावास या मृत्यु दंड का प्रावधान किया गया है।
• गैंगरेप के सभी मामलों में 20 साल की सजा या आजीवन कारावास का प्रावधान
• 18 वर्ष से कम उम्र की स्त्री के साथ सामूहिक बलात्कार का एक नई अपराध कैटेगरी।
• धोखे से यौन संबंध बनाने या विवाह करने के सच्चे इरादे के बिना विवाह करने का वादा करने वाले व्यक्तियों के लिए लक्षित दंड का प्रावधान करता है।
• e-FIR के माध्यम से महिलाओं के प्रति अपराधों की रिपोर्टिंग के लिए एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण पेश करता है। संवेदनशील अपराधों की त्वरित रिपोर्टिंग में सहायता करता है।
• नए विधेयक उन संज्ञेय अपराधों के लिए e-FIR की भी अनुमति देते हैं, जहां आरोपी अज्ञात होता है।
• इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पीड़ितों को अपराध की रिपोर्ट करने के लिए एक विवेकशील अवसर प्रदान करता है।
◦ इसमें 358 धाराएं होंगी (IPC की 511 धाराओं के स्थान पर)
◦ 20 नए अपराधों को जोड़ा गया है
◦ 33 अपराधों में कारावास की सजा को बढ़ाया गया है
◦ 83 अपराधों में जुर्माने की सजा राशि को बढ़ाया गया है
◦ 23 अपराधों में अनिवार्य न्यूनतम सजा शुरू की गई है
◦ 6 अपराधों में सामुदायिक सेवा का दंड शुरु किया गया है
◦ 19 धाराएं निरस्त/हटा दी गई हैं
◦ इसमें 531 सेक्शन होंगे (CrPC की 484 धाराओं के स्थान पर)
◦ कुल 177 प्रोविजन में बदलाव हुआ है,
◦ 9 नए सेक्शन, 39 नए सब-सेक्शन जोड़े गए हैं
◦ 44 नए प्रोविजन तथा स्पष्टीकरण जोड़े गए है
◦ 35 सेक्शन में टाइमलाइन जोड़ी गई हैं
◦ 35 जगह पर ऑडियो-विडियो का प्रावधान जोड़ा गया है
◦ 14 धाराएं निरस्त/हटा दी गई हैं
◦ इसमें 170 धाराएं होंगी (मूल 167 धाराओं के स्थान पर)
◦ कुल 24 धाराओं में बदलाव किया गया है
◦ 2 नई धारा, 6 उप-धाराएं जोड़ी गई हैं
◦ 6 धाराएं निरस्त/हटा दी गई हैं
भारतीय जरूरतों के अनुसार प्रायोरिटी
• ब्रिटिश शासन को मानव-वध या महिलाओं पर अत्याचार से महत्त्वपूर्ण राजद्रोह और खजाने की रक्षा थी
• इन तीन कानूनों में महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराधों, हत्या और राष्ट्र के विरुद्ध अपराधों को प्रमुखता दी गई है।
• इन कानूनों की प्रायोरिटी भारतीयों को न्याय देने का है, उनके मानवाधिकारों के रक्षा की है
• भारतीय न्याय संहिता में पहली बार आतंकवाद की व्याख्या की गई है
• इसे दंडनीय अपराध बना दिया गया है।
• व्याख्या: भारतीय न्याय संहिता खंड 113. (1): 'जो कोई, भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा या आर्थिक सुरक्षा या प्रभुता को संकट में डालने या संकट में डालने की संभावना के आशय से या भारत में या किसी विदेश में जनता अथवा जनता के किसी वर्ग में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने की संभावना के आशय से बमों, डाइनामाइट, विस्फोटक पदार्थों, अपायकर गैसों, न्यूक्लीयर का उपयोग करके ऐसा कार्य करता है, जिससे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की मृत्यु होती है, संपत्ति की हानि होता है, या करेंसी के निर्माण या उसकी तस्करी या परिचालन तो वह आतंकवादी कार्य करता है।
• आतंकी कृत्य मृत्युदंड या आजीवन कारावास के साथ दंडनीय है जिसमें पैरोल नहीं होगा;
• आतंकी अपराधों की एक श्रृंखला भी पेश की गई है।
• सार्वजनिक सुविधाओं या निजी संपत्ति को नष्ट करना अपराध है,
• ऐसे कृत्यों को भी इस खंड के तहत शामिल किया गया है जिनसे 'महत्वपूर्ण अवसंरचना की क्षति या विनाश के कारण व्यापक हानि' होती है।
संगठित अपराध (ऑर्गेनाइज्ड क्राइम)
• संगठित अपराध से संबंधित एक नई दांडिक धारा जोड़ी गई है।
• भारतीय न्याय संहिता 111. (1) में पहली बार संगठित अपराध की व्याख्या की गई है
• सिंडिकेट से की गई विधिविरुद्ध गतिविधि को दंडनीय बनाया है।
• नए प्रावधानों में सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसक गतिविधियां, अलगाववादी गतिविधियां अथवा भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य को जोड़ा गया है।
• छोटे संगठित अपराधों को भी अपराध घोषित किया गया है, जिसके लिए 7 साल तक की कैद हो सकती है। इससे संबंधित प्रावधान खंड 112 में हैं।
• आर्थिक अपराध की व्याख्या भी की गई है: करेंसी नोट, बैंक नोट और सरकारी स्टांपों का हेरफेर, कोई स्कीम चलाना या किसी बैंक/वित्तीय संस्था में गड़बड़ ऐसे कृत्य शामिल है;
• संगठित अपराध में, किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई है, तो आरोपी को मृत्यु दंड या आजीवन कारावास की सजा
• जुर्माना भी लगाया जाएगा, जो 10 लाख रुपये से कम नहीं होगा।
• संगठित अपराध में सहायता करने वालों के लिए भी सजा का प्रावधान किया गया है।
क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में विक्टिम-सेंट्रिक सुधार के 3 प्रमुख फीचर्स होते है:
1. पार्टिसिपेशन का अधिकार (विक्टिम को अपनी बात रखने का मौका, BNSS 360)
2. इनफार्मेशन का अधिकार (BNSS खंड 173, 193 और 230)
3. नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति का अधिकार
और यह तीनों फीचर्स नए कानूनों में सुनिश्चित किये गए हैं
• जीरो FIR दर्ज करने की प्रथा को संस्थागत बना दिया गया है (BNSS 173)
FIR कहीं भी दर्ज कर सकते हैं, भले ही अपराध किसी भी इलाके में हुआ हो।
• विक्टिम को FIR की एक प्रति निःशुल्क प्राप्त करने का अधिकार।
• विक्टिम को 90 दिनों के भीतर जांच में प्रगति के बारे में सूचित करना ।
• पीड़ितों को पुलिस रिपोर्ट, FIR, गवाह के बयान आदि के अनिवार्य प्रावधान के माध्यम से उनके मुकदमे के ब्योरे की जानकारी का एक महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करता है।
• जांच और मुकदमे के विभिन्न चरणों में पीड़ितों को जानकारी प्रदान करने के लिए उपबंध शामिल किए गए हैं।
जो कोई, जानबूझकर या प्रयोजन पूर्वक, बोले गए या लिखे गए शब्दों से, या संकेतों द्वारा, या दृश्य प्रतिनिधित्व द्वारा, या इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा या वित्तीय साधनों के उपयोग से, या अन्यथा, अलगाव या सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को उत्तेजित करता है या उत्तेजित करने का प्रयास करता है, या अलगाववादी गतिविधियों की भावनाओं को प्रोत्साहित करता है या भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालता है; या ऐसे किसी भी कार्य में शामिल होता है या करता है तो उसे आजीवन कारावास या कारावास जिसे सात साल तक बढ़ाया जा सकता है, से दंडित किया जाएगा और जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
टाइम-लाइन:
• आपराधिक कार्यवाही शुरू करने, गिरफ्तारी, जांच, आरोप पत्र, मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही, कॉग्निज़ंस, चार्जेज, प्ली बारगेनिंग, सहायक लोक अभियोजक की नियुक्ति, ट्रायल, जमानत, जजमेंट और सजा, दया याचिका आदि के लिए एक समय-सीमा निर्धारित की गई है।
• 35 सेक्शन में टाइमलाइन जोड़ी गई है, जिससे स्पीडी डिलीवरी ऑफ़ जस्टिस संभव होगी।
• BNSS में, इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन के माध्यम से शिकायत देने वाले व्यक्ति द्वारा तीन दिनों के भीतर FIR को रिकॉर्ड पर लिया जाना होगा।
• यौन उत्पीड़न के पीड़ित की चिकित्सा जांच रिपोर्ट मेडिकल एग्जामिनर द्वारा 7 दिनों के भीतर जांच अधिकारी को फॉरवर्ड की जाएगी।
• पीड़ितों/मुखबिरों को जांच की स्थिति के बारे में सूचना 90 दिनों के भीतर दी जाएगी।
• आरोप तय करने का काम सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप की पहली सुनवाई से 60 दिनों के भीतर किया जाना होगा।
• मुकदमे में तेजी लाने के लिए, अदालत द्वारा घोषित अपराधियों के खिलाफ अनुपस्थिति में मुकदमा शुरू करना आरोप तय होने से 90 दिनों के भीतर होगा।
• किसी भी आपराधिक न्यायालय में मुकदमे की समाप्ति के बाद निर्णय की घोषणा 45 दिनों से अधिक नहीं होगी।
• सत्र न्यायालय द्वारा बरी करने या दोषसिद्धि का निर्णय बहस पूरी होने से 30 दिनों के भीतर होगा, जिसे लिखित में मेंशनड कारणों के लिए 45 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।