ये भी सुझाव दिया गया है कि समिति में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के साथ ही बार काउंसिल के सदस्यों, कानून के जानकारों, जेल अधिकारियों और सुधार कार्यकर्ताओं के साथ ही धार्मिक नेताओं और साइबर क्राइम विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
केंद्र सरकार द्वारा बीते दिनों संसद सत्र के दौरान आपराधिक न्याय विधेयक पेश किए गए थे। इनमें आईपीसी की जगह लेने वाला भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023, सीआरपीसी की जगह लेने वाला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक, 2023 और एविडेंस एक्ट की जगह लेने वाला भारतीय साक्ष्य विधेयक 2023 शामिल हैं। इन विधेयकों की जांच एक संसदीय समिति द्वारा की जा रही है। अब विपक्षी सांसदों ने मांग की है कि पूर्व सीजेआई यूयू ललित और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन लोकुर को भी इस जांच समिति में शामिल किया जाए।
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विपक्षी सांसदों ने दिए ये सुझाव
संसदीय समिति में शामिल विपक्ष के एक सांसद ने 16 विशेषज्ञों की एक लिस्ट जमा की है, जिसमें वरिष्ठ वकील फाली एस नरीमन और वकील मेनका गुरुस्वामी का नाम भी शामिल है। ये भी सुझाव दिया गया है कि समिति में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के साथ ही बार काउंसिल के सदस्यों, कानून के जानकारों, जेल अधिकारियों और सुधार कार्यकर्ताओं के साथ ही धार्मिक नेताओं और साइबर क्राइम विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
विपक्षी सांसदों ने लगाए थे आरोप
विधेयकों की जांच कर रही संसदीय समिति में शामिल एक और विपक्षी सांसद ने कहा है कि जिस तेजी से विधेयकों की जांच की जा रही है, उसे देखते हुए इस काम में एक या डेढ़ साल का लंबा वक्त लग सकता है। हालांकि विपक्षी सांसदों ने कहा कि इस काम में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि इन विधेयकों का बड़ा असर होगा। इससे पहले विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया था कि उन्हें अपनी बात रखने के पर्याप्त मौके नहीं दिए जा रहे हैं। संसदीय समिति को तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देनी है। जिसके बाद इन विधेयकों को संसद के शीतकालीन सत्र में सदन के पटल पर रखा जाएगा। इन विधेयकों की जांच कर रही संसदीय समिति की अध्यक्षता भाजपा सांसद ब्रजलाल कर रहे हैं।