इसका सबसे बड़ा लाभ तब मिलेगा जब अध्ययन के निष्कर्ष आगामी माह में केंद्रीय स्तर पर गठित समितियों के समक्ष रखे जाएंगे और इन्हीं परिणामों के आधार पर सरकार देश भर के अस्पतालों के लिए दिशा-निर्देश तैयार करेगी ताकि भविष्य में कोरोना की कोई लहर आती है तो इस वर्ग को समय रहते बचाया जा सके।
डॉ. गजभिए ने कहा, ‘इस अध्ययन के बारे में एक तरह से कहा जा सकता है कि कोरोना महामारी का गर्भवती महिला, प्रसव के बाद महिलाओं का स्वास्थ्य और नवजात शिशुओं की स्थिति इत्यादि के बारे में निचोड़ निकाला जा रहा है, जिसके आधार पर एक निष्कर्ष निकाला जा सके।’
डॉक्टरों के लिए होगा प्रशिक्षण
वैज्ञानिकों का कहना है कि नए दिशा-निर्देश बनने के बाद यह डॉक्टरों के लिए प्रशिक्षण का कार्य करेगा। संक्रमित गर्भवती महिला का उपचार किस तरह से किया जाए? या फिर प्रसव के बाद मां व शिशु का बचाव कैसे किया जा सकता है? डॉक्टरों को यह भी बताने का प्रयास किया जा रहा है कि किन मानकों के आधार पर मरीज पर असर को पहले जान सकते हैं?
दो साल में जुटाए आंकड़ों की मदद
वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि 2020 में कोरोना ने भारत में प्रवेश किया। गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं में जोखिम काफी अधिक है। इसी के चलते आईसीएमआर ने प्रेग्कोविड-19 एक रजिस्ट्री भी बनाई थी। इसमें मार्च 2020 से मई 2022 तक देश के 19 अस्पतालों से डाटा एकत्रित किया जाएगा।