दोनों वैक्सीन में है ये फर्क
कोवाक्सिन को भारत बायोटेक ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के साथ मिलकर बनाया किया है। कोवाक्सिन एक इनएक्टिवेटेड वैक्सीन है, जो बीमारी पैदा करने वाले वायरस को निष्क्रिय करके बनाई गई है। शुरुआत में कोवाक्सिन पर काफी प्रश्न उठाए गए थे। लेकिन अब दुनियाभर के एक्सपर्ट ने इस वैक्सीन की कार्य क्षमता की प्रशंसा की है। व्हाइट हाउस के मेडिकल एडवाइजर एंथॉनी फाउची ने खुद एक हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि कोवाक्सिन B.1.617 वैरिएंट यानी भारत के डबल म्यूटेंट वैरिएंट को बेअसर करने में कारगर है।
कोविशील्ड चिम्पैंजी में पाए जाने वाले एडिनोवायरस वेक्टर पर आधारित वैक्सीन है। इसमें चिम्पैंजी को संक्रमित करने वाले वायरस को आनुवांशिक तौर पर संशोधित किया गया है, ताकि ये इंसानों में ना फैल सके। इस संशोधित वायरस में एक हिस्सा कोरोना वायरस का है जिसे स्पाइक प्रोटीन कहा जाता है। ये वैक्सीन शरीर में इम्यून रिस्पॉन्स बनाती हैं जो स्पाइक प्रोटीन पर काम करता है। ये वैक्सीन एंटीबॉडी और मेमोरी सेल्स बनाती हैं जिससे वायरस को पहचानने में मदद मिलती है।
ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका द्वारा डेवलप कोविशील्ड की इस वैक्सीन को कई और भी देशों में इस्तेमाल किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का दावा है कि ये वैक्सीन कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित करने का काम करती है। हालांकि इन दोनों ही वैक्सीन की खूबियां इन्हें एक दूसरे से अलग बनाती हैं।
कोवाक्सिन और कोविशील्ड दोनों ही रिएक्टोजैनिक साइड इफेक्ट के साथ आती हैं। इसमें इंजेक्शन साइड पर दर्द, बुखार, ठंड लगना, कंपकंपी, चक्कर आना मतली, सिर दर्द या पेट दर्द जैसे साधारण देखने को मिल सकते हैं। हालांकि कोवाक्सिन में अभी तक कोई गंभीर साइड इफेक्ट नहीं देखने को मिला है।
कोविशील्ड पर कई देशों में इसके साइड इफेक्ट्स को लेकर सवाल खड़े हो चुके हैं। कई मामलों में लोगों को ब्लड क्लॉटिंग की समस्या हो चुकी है। जबकि कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहां लोगों को न्यूरोलॉजिकल से जुड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा है।
इम्यून की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया
अध्ययन करने वालों का कहना है कि हमने देश के स्वास्थ्यकर्मियों पर कोविशील्ड और कोवाक्सिन की दोनों खुराक लेने के बाद इम्यून प्रतिक्रिया का मूल्यांकन किया है। देशभर में सभी वर्गों के बीच कोरोनावायरस टीके से संबंधित एंडी बॉडी मापक अध्ययन किया गया, जिसमें दोनों में से किसी भी टीके की दो खुराक लगवाने वाले स्वास्थ्यकर्मियों में 21 दिन या उसके बाद सार्स-कोवी-2 एंटी-स्पाइक बाइंडिंग एंटीबॉडी की मात्रा का आकलन किया गया।
515 स्वास्थ्यकर्मियों में 305 पुरुष और 210 महिलाओं में से 95 फीसदी में दोनों टीकों में से किसी की भी दो खुराक लगवाने के बाद सीरो-पॉजिटिविटी देखी गई। कोविशील्ड लगवाने वाले 425 में 98.1 फीसदी सीरो-पॉजिविटी देखी गई, जबकि कोवाक्सिन के 90 प्राप्तकर्ताओं में 80 फीसदी सीरो-पॉजिटिविटी देखी गई। सीरो-पॉजिटिविटी का मतलब रक्त के सीरम में एंटीबॉडी मौजूद होना है। शोधार्थियों ने कहा कि इस अध्ययन का मूल उद्देश्य कोविशील्ड और कोवाक्सिन की प्रत्येक खुराक के बाद एंटीबॉडी प्रतिक्रिया और आयु, लिंग, रक्तसमूह, बॉडी मास इंडेक्स तथा सह-रुग्णता के बीच संबंधों का विश्लेषण करना था।