पंकज लाल का बेटा सिर्फ 13 साल का है। उसे एक दलाल के भरोसे, बिहार से सैकड़ों किलोमीटर दूर राजस्थान में चूड़ी की फैक्ट्री में काम पर भेजने का फैसला उन्होंने तब लिया जब लॉकडाउन के चार महीनों में उनका अपना ठेला चलाने का काम ना के बराबर रह गया।
फोन पर मुझसे कहा कि घर में खाने को कुछ नहीं था, "भूखे पेट तीन बेटे और दो बेटियों का मुंह देखा नहीं गया, दलाल से कहा कि हमें काम दे दो पर उसने कहा बच्चे की उंगलियों के लायक ही काम है, बड़ों की कोई जरूरत नहीं।"
जब मैंने पूछा कि डर नहीं लगा छोटे बेटे को भेजते हुए और उसने मना नहीं किया जाने से? तो पंकज फफक कर रो पड़े। दलाल ने बेटे को काम सिखाने के बाद उन्हें महीने का 5,000 रुपये भेजने का वायदा किया था।
लॉकडाउन से जुड़ी आवाजाही पर लगी रोकटोक के बावजूद दलाल उनके बेटे समेत दो दर्जन लड़कों को एक लग्जरी बस में बिहार से जयपुर तक, कई राज्यों के बॉर्डर पार करवाने में कामयाब रहा।
लेकिन चूड़ी की फैक्ट्री पहुंचने से ठीक पहले बस जयपुर में पकड़ी गई। पंकज का बेटा अब वहां के बाल गृह में है। क्वारंटीन की मियाद पूरी होने के बाद बाकी बच्चों के साथ उसे घर पहुंचा दिया जाएगा।
पंकज ने कहा, "मुझसे भूल हो गई, दिमाग़ में तब बस आ गया तो भेज दिया, पर हमें ठोकर लग गई, अब कभी नहीं करेंगे, दो जून की रोटी खाएंगे पर बच्चे को बाहर नहीं भेजेंगे।" पंकज का मामला अब बाल सुधार समिति और स्थानीय ग़ैर-सरकारी संगठन, 'सेंटर डायरेक्ट' की नजर में है ताकि वो दोबारा अपने किसी भी बच्चे को बाल मजदूरी में धकेलने की कोशिश ना करें।
भारत में बाल मजदूरी एक बड़ी समस्या है। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में पाँच से 14 साल की उम्र के करीब 26 करोड़ बच्चों में से एक करोड़ बाल मजदूरी करने को मजबूर थे। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद देश के सबसे ज्यादा (4,51,590) बाल मजदूर बिहार राज्य में थे।
लॉकडाउन और बाल तस्करी
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक बिहार में बाल तस्करी बहुत व्याप्त है, और साल 2018 में बिहार में लगभग रोज एक बच्चा तस्करों के चंगुल से छुड़ाया गया। गरीबी और जागरूकता की कमी के चलते, बच्चों की तस्करी के व्यापार को पनपने के लिए मानो लॉकडाउन में अनुकूल परिस्थितियां मिल गई हैं।
सेंटर डायरेक्ट के सुरेश कुमार के मुताबिक तस्करी के मामले पिछले साल की तुलना में दोगुने हो गए हैं, "पिछले महीनों में ये बड़े पैमाने पर हुआ है, गांव के गांव ख़ाली हो गए हैं, ट्रेन नहीं तो बसें सही, तस्करों ने बच्चों को भगाने के नए रास्ते निकाल लिए हैं और छोटी-पतली उंगलियों के काम की माँग है तो बेरोजगारी से परेशान मां-बाप उसकी पूर्ति के लिए बच्चे देने को तैयार हो जाते हैं"।
लॉकडाउन से पहले भी राजस्थान की चूड़ी फैक्ट्रियों में काम करने के लिए बिहार से बच्चों की तस्करी की जाती रही है। तस्करों को पकड़ना बड़ी चुनौती है और वो अक्सर जुर्माना देकर छूट जाते हैं।
पिछले सालों में सामाजिक कल्याण विभाग, श्रम विभाग, पुलिस और ग़ैर-सरकारी संगठनों के तालमेल से कुछ तस्करों की गिरफ्तारी हुई है और तस्करी के मामलों में गिरावट भी दर्ज की गई है पर ये व्यापार ताकत, पैसे और जरूरत के बल पर अब भी मजबूत है।
सुरेश बताते हैं, "साल 2016 में बिहार से जयपुर बच्चों की तस्करी करनेवाला एक शख़्स पकड़ा गया और तीन साल बाद उसे उम्र कैद की सजा हुई, लेकिन उसके बाद शिकायत करनेवाला परिवार अग़वा कर लिया गया, ये दिखाता है कि तस्कर बहुत ताकतवर होते हैं, उन्हें सुरक्षा हासिल है, और उनके जाल को तोड़ना बहुत मुश्किल।"