दुनियाभर में अभी कौन सी कोरोना वैक्सीन का हो रहा इस्तेमाल?
भारत में कोरोना की जिन दो वैक्सीन को मंगलवार को मंजूरी दी गई है, वे दोनों ही प्रोटीन बेस्ड टीके हैं। दुनिया में अब तक ज्यादातर कंपनियां अलग-अलग तकनीक पर टीकों का निर्माण कर रही हैं। जैसे अमेरिका की फाइजर और मॉडर्ना मैसेंजर आरएनए (mRNA) वैक्सीन है, जबकि ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड और जॉनसन एंड जॉनसन के टीके वेक्टर बेस्ड वैक्सीन हैं। इसके अलावा भारत बायोटेक द्वारा निर्मित कोवाक्सिन डेड वायरस पर आधारित टीका है।
क्यों कोरोना से लड़ाई का चेहरा बन सकती हैं प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन?
अब दुनिया में दो प्रोटीन आधारित टीकों के इस्तेमाल शुरू होने की जल्द उम्मीद जताई जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन का प्रसार बढ़ेगा, वैसे ही पूरी दुनिया के टीकाकरण अभियान में तेजी आएगी। रिसर्चर्स यह दावा करते हैं कि प्रोटीन आधारित वैक्सीन के सुरक्षा मानकों की वजह से ही दुनिया में कई लोगों ने अब तक दूसरी तकनीक पर बना टीका नहीं लगवाया है।
दरअसल, प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन कई और बीमारियों के इलाज में लंबे समय से इस्तेमाल होती आई हैं। फिर चाहे वह इन्फ्लुएंजा हो, टिटनस हो या कोई और वायरस से फैलने वाली बीमारी। प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन्स को संक्रमण रोकने में ज्यादा प्रभावी, सुरक्षित और कारगर माना जाता है। साथ ही इनके साइड इफेक्ट्स भी दूसरी तकनीक पर बने टीकों से कम होते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इन वैक्सीन्स के निर्माण का खर्च मौजूदा वेक्टर या एमआरएनए टीकों के मुकाबले काफी कम है। साथ ही प्रोटीन बेस्ड टीकों को दो से आठ डिग्री सेल्सियस तक के तापमान पर भी रखा जा सकता है, जिससे इन्हें अफ्रीका जैसे देशों में पहुंचाना भी आसान होगा। mRNA वैक्सीन्स को माइनस तापमान में रखने की जरूरत होती है, जिसकी वजह से इन्हें स्टोर करने का इन्फ्रास्ट्रक्चर हर देश के लिए जुटाना नामुमकिन है।
बाकी वैक्सीन्स से कितनी अलग होती हैं प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन?
प्रोटीन आधारित कोरोना वैक्सीन्स में कोविड-19 वायरस के स्पाइक प्रोटीन का अंश या हूबहू इसके जैसा दिखने वाला नैनोपार्टिकल मौजूद रहता है। यह नैनोपार्टिकल इंसान के शरीर में जाने के बाद प्रतिरोधक क्षमता को तैयार कर देता है। इसका असर यह होता है कि जब असल कोरोनावायरस का स्पाइक प्रोटीन इंसानी शरीर को निशाना बना कर वायरस को फैलाने की कोशिश करता है, तो इम्यून सिस्टम उसे पहचानकर एंटीबॉडीज तैयार कर लेता है और स्पाइक प्रोटीन की वायरस को फैलाने की कोशिश को खत्म कर देता है।
क्यों ज्यादा असरदार होती हैं प्रोटीन आधारित वैक्सीन?
इंसानों की प्रतिरोधक क्षमता प्रोटीन आधारित वैक्सीन्स पर जल्दी क्रियाशील हो जाती हैं। इसकी वजह यह है कि वायरस का बाहरी आवरण मुख्यतः प्रोटीन का बना होता है (स्पाइक प्रोटीन)। जहां बाकी तकनीक से बने टीकों में इंसान के इम्यून सिस्टम को रोगाणु को पहचानकर उसके खिलाफ प्रोटीन तैयार करना पड़ता है, वहीं प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन पहले ही किसी वायरस के बाहरी आवरण की तरह बर्ताव कर प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय कर देती हैं। इसलिए इस तरह की वैक्सीन वायरस के खिलाफ जल्दी और ज्यादा कारगर साबित होती हैं।
प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन में असली वायरस का डीएनए मौजूद नहीं होता, जिससे यह कोई साइड इफेक्ट पैदा नहीं करतीं। लेकिन इनका असर सिर्फ वायरस के स्पाइक प्रोटीन पर ही निर्भर नहीं करता। वैक्सीन को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए निर्माता इनमें एड्जुवेंट्स जोड़ देते हैं, जो कि इनके असर को तेज और मजबूत कर देती हैं। भारत में मंजूर हुई नोवावैक्स की कोवोवैक्स वैक्सीन 90.4 फीसदी प्रभावी पाई गई है। यानी लगभग फाइजर-मॉडर्ना जैसी mRNA वैक्सीन्स के बराबर एफिकेसी।