राजनयिक समन्वय के बाद जर्मनी की पुलिस ने खालिस्तानी आतंकवादी संगठन के सदस्य जसविंदर सिंह मुल्तानी को एरफर्ट शहर से गिरफ्तार किया है। भारतीय पुलिस अधिकारियों का एक दल जल्द ही जर्मनी पहुंचकर मुल्तानी से पूछताछ करेगा। पंजाब चुनाव में 'पाकिस्तान-खालिस्तान' के दो खतरनाक 'प्लान', को लेकर अब जांच एजेंसियों को अहम जानकारी मिल सकती है। साथ ही प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन, सिख फॉर जस्टिस, बब्बर खालसा इंटरनेशनल, खालिस्तान टाइगर फोर्स और खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स आदि के साथ मिलकर पाकिस्तान ने पंजाब चुनाव में तोड़फोड़ की जो साजिश रची है, उसका खुलासा होने की उम्मीद है। फिलहाल पंजाब में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
प्लान में 'सार्वजनिक स्थल और नेता', दोनों शामिल हैं
केंद्रीय सुरक्षा एवं जांच एजेंसियों ने चुनाव वाले राज्यों को अलर्ट कर दिया है। खासतौर पर पंजाब चुनाव को लेकर कई तरह के बड़े अलर्ट राज्य पुलिस के साथ साझा किए गए हैं। सूत्रों का कहना है, पंजाब चुनाव में 'पाकिस्तान-खालिस्तान' के दो खतरनाक प्लान सामने आए हैं। पहला, सार्वजनिक स्थलों पर विस्फोट किया जाए। दूसरा, नेताओं को टारगेट कर उन पर हमला हो सकता है। ये दोनों प्लान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी 'आईएसआई' ने तैयार किए हैं। इसके लिए खालिस्तानी संगठनों को मोहरा बनाया गया है। इन संगठनों को विस्फोट सामग्री एवं हथियार सहित दूसरे संचार उपकरण, पाकिस्तान द्वारा मुहैया कराए जाएंगे। राज्य पुलिस से कहा गया है कि रेलवे ट्रैक, पावर हाउस, ब्रिज और बस अड्डों पर अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए जाएं।
जांच एजेंसियों को इस तरह गुमराह कर सकता है पन्नू
गुरपतवंत सिंह पन्नू ने भारतीय जांच एजेंसियों को गुमराह करने के लिए अपने मैसेज का सहारा लिया है। लुधियाना विस्फोट के बाद सीधे तौर पर पन्नू ने यह नहीं कहा कि ये सब उनके संगठन या दूसरे सहयोगी समूहों का काम है। उसने केवल इतना कहा, अब दिल्ली आईएसबीटी यानी अंतरराज्यीय बस अड्डे की बारी है। वहां पर विस्फोट किया जाएगा। इस बाबत केंद्रीय जांच एजेंसी के सूत्र बताते हैं कि आतंकी संगठन इस तरह प्लानिंग, सुरक्षा बलों को गुमराह करने के लिए करते हैं। इसका मकसद सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान बांटना होता है। मौजूदा समय में सुरक्षा बल, आतंकियों के दोनों प्लान को तोड़ने की नीति पर काम कर रहे हैं। इसके लिए केंद्र एवं राज्य पुलिस के कुछ अधिकारियों को समन्वय की जिम्मेदारी दी जा रही है। पंजाब में बलबीर राजेवाल सहित दूसरे जिन नेताओं को खतरा है, उनके आसपास खुफिया पहरा बढ़ा दिया गया है।
पन्नू के खिलाफ कार्रवाई में हैं ये बड़ी अड़चन
जर्मनी की पुलिस द्वारा मुल्तानी की गिरफ्तारी, द्विपक्षीय संबंधों की दिशा में एक बड़ा कदम है। सिख फॉर जस्टिस एवं दूसरे प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठनों को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने आतंकी संगठनों की सूची में शामिल कर रखा है। इतना होने पर भी उनके खिलाफ भारतीय जांच एजेंसियां शिकंजा नहीं कस पा रही हैं। वजह, ये संगठन विदेश में बैठकर अपनी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई में कई तरह की अड़चनें आ रही हैं। सिख फॉर जस्टिस के संस्थापक गुरपतवंत सिंह पन्नू सहित दूसरे आतंकी संगठनों के पदाधिकारी विदेशों में रहते हैं। भले ही उनके खिलाफ पंजाब, हरियाणा और दूसरे राज्यों में केस दर्ज हैं। मौजूदा समय में वे लोग हमारे देश के नागरिक नहीं हैं। यही वो कारण है, जिससे जांच एजेंसियों के हाथ बंध जाते हैं। सभी देशों के साथ बहुपक्षीय संधियां और समझौते ऐसे नहीं होते हैं कि जिसके चलते वहां से किसी अपराधी को तुरंत भारत लाया जा सके।
द्विपक्षीय संबंध खराब होने का खतरा बना रहता है
किसान आंदोलन में गणतंत्र दिवस पर हुए उपद्रव के बाद भी पन्नू ने पंजाब के युवाओं को खालिस्तान की मांग के लिए उकसाया है। आईबी में लंबे समय तक रहे पूर्व आईपीएस प्रदीप भारद्वाज कहते हैं, आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू को भारत लाना बहुत मुश्किल है। वहां के कानून इस तरह की इजाजत नहीं देते। कोई ऐसा मामला जो भारत में अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन अमेरिका या दूसरे राष्ट्र में वह अभिव्यक्ति का हिस्सा हो सकता है। जिस देश के साथ ऐसे मामलों को लेकर कोई संधि नहीं है, वहां द्विपक्षीय संबंध भी देखे जाते हैं। ऐसे मामलों में संबंध खराब होने का खतरा बना रहता है।
अब कूटनीतिक बातचीत का रास्ता बचता है। यह भी तभी संभव है, जब कोई भारतीय नागरिक, अपराध कर उस देश में कहीं छिप गया हो। ये भी हो सकता है कि उसने वहां शरण ले ली हो। आतंकी गुरपतवंत सिंह के पास विदेशी नागरिकता है। इस कारण से उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती। अब मुल्तानी को जर्मनी में पकड़ा गया है। इस मामले में राजनयिक समन्वय की बात कही जा रही है। ये काबिल-ए-तारीफ है। अगर हमारी एजेंसियां ठोस सबूत पेश करती हैं तो मुल्तानी को भारत लाया जा सकता है। अगर उससे पूछताछ में कुछ ठोस निकलता है तो इसके बाद अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में रह रहे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता प्रशस्त हो सकता है।