ऑस्ट्रेलिया में लगी आग (फाइल फोटो)
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पिछले कुछ सालों में हुई प्राकृतिक घटनाओं पर एक नजर डालें तो पता चलेगा कि जंगल में भीषण आग से लेकर बाढ़ तक कई घटनाओं ने दुनिया को झकझोर दिया है। ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग तो आपको याद ही होगी जिसमें पचास करोड़ से ज्यादा जानवरों की मौत हुई थी। यह आग जंगल के करीब 1 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली थी।
इस आग ने कुआला को विलुप्त प्रजाति में शामिल करने पर मजबूर कर दिया, क्योंकि इस भयंकर आग में 10,000 से अधिक कुआला की मौत हुई थी। फिलहाल दुनिया कोरोना जैसे वायरस से जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है। इन सब घटनाओं से हमें जलवायु परिवर्तन को लेकर बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। इन घटनाओं ने हमें ये पांच सबक दिए हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में...
दुनिया में कोरोना वायरस
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कुछ लोग सोचते थे कि वे वैश्विक संकटों का असर उनपर नहीं पड़ेगा लेकिन कोरोना ने इस सोच को हमेशा के लिए दफन कर दिया। लोगों को लगता था कि सात समंदर पार किसी देश में कोई आपदा आई है तो उसका असर उनके ऊपर नहीं होगा लेकिन चीन के शहर में पैदा हुआ कोरोना वायरस आज पूरी दुनिया में तबाही मचा रहा है और किसी भी देश के पास इसका कोई इलाज मौजूद नहीं है। जलवायु परिवर्तन का यह भी एक सच है।
वैश्विक यानी ग्लोबल परिवर्तन या आपदा के दौरान हमें एक प्रणालीगत यानी सिस्टमेटिक कदम उठाने की जरूरत होती है जो कि सरकारें और कंपनियां ही उठा सकती हैं, लेकिन इनको व्यक्तिगत साझेदारी की भी जरूरत होती है। ऐसे में देखा जाए तो सरकार और कंपनियों के साथ जनता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जैसा कि पिछले कुछ सप्ताह में देखने को मिला है कि कोरोना वायरस के लेकर दुनियाभर की सरकारों ने जो फैसले लिए हैं, उसे जनता ने तुरंत स्वीकार भी किए हैं।
अंग्रेजी में एक कहावत है कि प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर यानी इलाज कराने से बेहतर है कि पहले से ही एहतियात बरती जाए ताकि समस्या पैदा ही ना हो। दूसरे शब्दों में कहें तो किसी चीज की मरम्मत उसकी देखभाल से हमेशा महंगा ही होती है। ऐसे में बेहतर है कि आप पहले से ही सजग रहें और एहतियात बरतें। कोरोना ने भी यही सबक दी है कि एक साथ इतने लोगों का इलाज करने से बढ़िया इससे फैलने से रोकना है। इसके लिए लोगों को एक दूसरे से एक निश्चित दूरी बनाना जरूरी है। बीमारी के मामले में दूरियां हमेशा फायदेमंद रही हैं। इसका फायदा जलवायु परिवर्तन में भी देखने को मिलेगा जिसे पता लगाना आसान होगा कि जलवायु परिवर्तन को कैसे रोका जाए और इस तरह की समस्याओं से कैसे निपटा जाए।
डॉ डी. हिमांशु, कोरोना वायरस से पीड़ित मरीजों के इलाज में लगी डॉक्टरों की टीम
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कोरोना वायरस को लेकर इस वक्त पूरी दुनिया में तमाम तरह के अफवाहें फैली हैं। यह ठीक उसी तरह है जिस तरह की अफवाहें जलवायु परिवर्तन को लेकर हैं, लेकिन सच यही है कि सभी देश के लोगों की निगाहें स्वास्थ्य विशेषज्ञों पर टीकी हैं कि वे क्या बेहतर कर रहे हैं। इसी तरह जलवायु परिवर्तन में भी हमें अफवाहों पर दरकिनार करते हुए विज्ञान पर भरोसा करना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए।
हालांकि कोरोना वायरस और जलवायु परिवर्तन में एक बात अलग है और वह यह है कि कोरोना के संक्रमण को खत्म करने के लिए हमें अलग-अलग रहने की जरूरत है, जबकि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए हमें एक साथ आना होगा। कुल मिलाकर कहें तो कोरोना वायरस पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन को लेकर बड़ा निर्णय लेने पर मजूबर करेगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लड़खड़ाने के कारण इस साल वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आने की संभावना है। यह ठीक वैसा ही जैसे बीमार होने के कारण इंसान का वजन कम होता है। प्रकृति भी कोरोना वायरस के मदद से कुछ ऐसा ही कर रही है।