साल 2007 से 2011 तक दिल्ली के मुख्य सचिव रहे राकेश मेहता ने बताया, सरकार जब अपने कार्यों में रुचि नहीं लेती है तो लोग पीआईएल फाइल करते हैं। कोरोनाकाल में जब सभी एजेंसियों को मिलजुल कर काम करना चाहिए, तब इनकी एकजुटता सामने नहीं आ रही। केंद्र और राज्य, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। जब सरकार ठीक नहीं कर रही तो कोर्ट सख्ती बरतती है।
मेहता ने कहा कि कोरोना में कोई मरीज सड़क पर दम तोड़ रहा है तो कोई रिक्शा में। बतौर मेहता, ये किसकी विफलता है, सरकार की ही है। दिल्ली सरकार छह माह से सो रही थी। उसे पहले दिल्ली के स्टेडियम या रामलीला मैदान नहीं दिखा।
अब तीसरी लहर आने का अलर्ट हो गया है तो सरकार जागी है। मेडिकल ऑक्सीजन के प्लांट पहले क्यों नहीं लगाए गए। कोर्ट के पास क्या है, वह तो एक टिप्पणी कर सकती है। जब यह लगे कि सरकार तो बिल्कुल कुछ कर ही नहीं रही है तो आदेश दे देती है। इसके बाद वही काम सरकार को ही करना पड़ता है। इसी वजह से लोग अदालत में जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता देवव्रत कहते हैं, मुसीबत आई है तो लोग कोर्ट जा रहे हैं। सरकार का 'नीतिगत पक्षाघात' सबके सामने है। जब लोग मरने लगे तो कोर्ट चुप कैसे बैठेगी। अलग अलग राज्यों के उच्च न्यायालय आदेश दे रहे हैं। महामारी आई है, लेकिन सरकार की कोई तैयारी नहीं थी। जब किसी तरह की कोई पॉलिसी ही नहीं बनी तो सिस्टम फेल हो गया। जो अफसर पिछले साल से ग्राउंड पर काम कर रहे थे, उनकी रिपोर्ट का क्या हुआ।
दूसरी लहर का अंदाजा पिछले साल ही हो गया था
देवव्रत ने कहा कि कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर का अंदेशा तो पिछले साल ही हो गया था। उसके बाद नए अस्पताल, आईसीयू बेड, ऑक्सीजन प्लांट या कंटेनर आदि का इंतजाम क्यों नहीं हो सका। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ऑक्सीजन क्यों नहीं पहुंच सकी। सरकार के पास पर्याप्त हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। सप्लाई चेन में कहां बाधा आ रही है, सरकार को क्या ये सब मालूम नहीं है। टैंकर, बाहर से मंगाए जा रहे हैं। टैंकर को दूसरे राज्य बीच में ही रोक लेते हैं। सरकार के पास एक साल का समय था, लेकिन कुछ नहीं किया गया।
सरकार जिम्मेदारी पूरी करे : डॉ. चौधरी
सुप्रीम कोर्ट के दूसरे अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी का कहना है कि सरकारों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। कोर्ट हर मामले में दखल नहीं दे सकती। कई सारे तकनीकी इश्यू भी होते हैं, उसके बारे में इतनी जल्द फैसला देना संभव नहीं होता। बेहतर है कि सरकार अपना काम ईमानदारी से करे। जब सरकार निष्क्रिय होती है तो कोर्ट को सक्रिय होना पड़ता है। कारण, लोगों को मुसीबत में अदालत ही एक सहारा नजर आता है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया था कि राज्य में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि सत्ता में बैठे लोगों को 'मेरी मर्जी चलेगी या कुछ नहीं होगा' वाला रवैया छोड़ना होगा। दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी अदालतों से कोई रियायत नहीं मिली।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कोविड महामारी की दूसरी लहर से निपटने के तरीकों को लेकर नाराजगी जताते हुए कहा कि उसका भरोसा हिल चुका है। अगर राज्य सरकार हालात को नहीं संभाल पाती है तो फिर अदालत केंद्र सरकार से दखल देने को कहेगी।
गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा, राज्य सरकार सिर्फ कागजों पर ही काम करती दिख रही है। बाम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार के 'अत्यधिक संवेदनहीन आचरण' पर कड़ी टिप्पणी की थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा, हमें यही लग रहा है कि इस देश को भगवान ही चला रहे हैं।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह आवश्यकता होने पर दो घंटे के भीतर कोविड रोगियों को रेमेडीसीवर इंजेक्शन जारी करे। साथ ही बिना किसी भेद के निजी और गवर्नमेंट दोनों अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करे।
कोर्ट ने बेड उपलब्धता को लेकर पोर्टल पर लगातार अपडेट करने की बात भी कही। कोरोना संकट के बीच चिकित्सा कर्मचारियों की कमी को देखते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को यह सलाह भी दी है कि वे अंतिम वर्ष के छात्रों के साथ-साथ पीजी छात्रों और नर्सिंग स्टाफ की तैनाती आकस्मिक आधार पर करने पर विचार करें।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने केंद्र से कहा, आक्सीजन सप्लाई बढ़ाएं। पटना हाईकोर्ट ने बिहार में बेड की कमी, ऑक्सीजन की किल्लत और दवाइयों की कालाबाजारी जैसी खबरों के सामने आने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि हमारी नज़र में कोविड प्रबंधन में आप लोग फेल हो रहे हैं।
मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा, 'हम सिर्फ अभी अप्रैल में ही कार्रवाई क्यों कर रहे हैं, जबकि हमारे पास एक साल का वक्त था? पिछले एक साल में ज्यादातर वक्त लॉकडाउन रहने के बावजूद हालात को देखें, हम सभी पूरी तरह से निराश और नाउम्मीद की हालत में हैं।