कहावत है कि दूध से जला छाछ फूंक फूंक कर पीता है। इस बार पांच राज्यों विशेषकर तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 2019 के दूध से जली कांग्रेस अब 2024 के लिए 2023 का छाछ फूंक फूंक कर पी रही है। यानी 2018 के विधानसभा चुनावों में इन तीनों राज्यों में जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस 2019 के लोकसभा चुनावों में बुरी तरह हार गई थी। इसलिए इस बार कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में ही लोकसभा चुनावों के लिए अपनी तैयारी और प्रचार शुरू कर दिया है। कांग्रेस के शीर्ष नेता अपने चुनाव प्रचार में विधानसभा चुनावों में जीत के लिए वोट मांगने के साथ ही केंद्र में अपनी सरकार बनने पर क्या काम किए जाएंगे, उन्हें भी गिनाकर लोगों को लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस को वोट देने के लिए तैयार कर रहे हैं। जबकि पिछली बार कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में राज्य स्तर के मुद्दों तक ही खुद को सीमित रखा था।
कांग्रेस की ओर से पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी पूरी तरह से चुनावी प्रचार में उतर गए हैं। खरगे ने जहां दक्षिणी राज्य तेलंगाना में प्रचार की कमान संभाली है, वहीं राहुल प्रियंका ने छत्तीसगढ़ और राजस्थान में तूफानी चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। छत्तीसगढ़ में अपनी चुनावी सभाओं में राहुल गांधी जहां लोगों को बता रहे हैं कि 2018 में उन्होंने प्रचार के दौरान जो वादे किये थे, वो सारे वादे राज्य की कांग्रेस सरकार ने पूरे कर दिए हैं।
राहुल कहते हैं कि वह जो वादा करते हैं उसे पूरा करते हैं और जनता का भरोसा नहीं तोड़ते।इसके साथ ही राहुल गांधी छत्तीसगढ़ के लोगों से वादा करते हैं कि अगर 2024 में दिल्ली यानी केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी तो धान के कटोरे के रूप में मशहूर इस राज्य को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर ले जाएंगे। इसके लिए राज्य के हर जिले में खाद्य प्रस्सकरण केंद्र खोले जाएंगे, जिनमें छत्तीसगढ़ की कृषि उपजों खासकर चावल, फल और सब्जियों के प्रतिउत्पाद तैयार होंगे और इन्हें विश्व के बाजार में भेजने के लिए राज्य में तीन चार अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे बनवाए जाएंगे। केंद्र में सरकार बनने पर राज्य में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हब बनेंगे और छत्तीसगढ़ के युवाओं को विश्व स्तर की कंपनियों में रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। राहुल कहते हैं कि छत्तीसगढ़ का चावल अमेरिका जापान इंग्लैंड यूरोप और दूसरे देशों के लोग खाएंगे और कहेंगे कि छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया।
इसके साथ ही राहुल गांधी जातिगत जनगणना को भी विधानसभा चुनावों के साथ साथ लोकसभा चुनावों का मुद्दा भी अभी से बना रहे हैं। वह हर सभा में कह रहे हैं कि भारत सरकार के लगभग 40 लाख करोड़ के वार्षिक बजट का सिर्फ पांच फीसदी हिस्सा वह अधिकारी खर्च करते हैं जो पिछड़े वर्गों से आते हैं। इसी तरह दलित और आदिवासी अधिकारी भी महज तीन से चार फीसदी हिस्सा खर्च करते हैं, क्योंकि केंद्र सरकार को चलाने वाले शीर्ष अफसरों में कैबिनेट सचिव समेत जो कुल 90 सचिव हैं उनमें सिर्फ तीन ओबीसी हैं और इसी तरह दलित और आदिवासी अधिकारियों की भी तादाद बेहद कम है। यहां भी राहुल गांधी केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए जातीय जनगणना को देशव्यापी केंद्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकता है।
इस तरह राहुल अपने भाषणों से विधानसभा चुनावों के साथ साथ लोकसभा चुनावों के लिए भी राज्य के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को तैयार कर रहे हैं ताकि पार्टी 2019 की तरह गफलत में न रहे। राहुल की इसी लाइन पर उनकी बहन और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी भी अपनी सभाओं में बोल रही हैं। दरअसल, पांच राज्यों जहां चुनाव हो रहे हैं, उनमें तेलंगाना और मिजोरम में कांग्रेस दोनों राज्यों के क्षेत्रीय दलों बीआरएस और एमएनएफ के मुकाबले खुद को मुख्य लड़ाई में ले आई है। उसे उम्मीद है कि इन दोनों राज्यों में वह सरकार बनाने की करीब पहुंच सकती है, जबकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसका भाजपा से सीधा मुकाबला है। यहां मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को जीतने की पूरी उम्मीद है, जबकि राजस्थान में बकौल राहुल गांधी कांग्रेस का भाजपा से कड़ा मुकाबला है।
आम धारणा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदाताओं का फैसला आमतौर पर अलग अलग होता है। कम से कम 2004 से यह सिलसिला जारी है। जब 2003 में भाजपा ने कई विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करके लोकसभा चुनाव 2004 में समय से पहले करवा दिए, लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद से ही लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों के नतीजे अलग अलग आते रहे। 2018-19 इसका सबसे ताजा उदाहरण है। 2018 में उत्तर भारत के प्रमुख राज्य जीतकर कांग्रेस गफलत और गुमान में आ गई कि अब 2019 के लोकसभा चुनावों में वह अकेले भाजपा को हरा देगी, लेकिन नतीजे उलटे रहे।
इसलिए कांग्रेस इस बार पिछली गलतियों से सबक सीख कर फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। जहां 2019 में कांग्रेस ने विपक्षी गठबंधन के लिए कोई ठोस और सार्थक पहल नहीं की थी, वहीं इस बार उसने सभी प्रमुख विपक्षी दलों को एकजुट करके इंडिया गठबंधन बनाने में कामयाबी हासिल की है। उसकी कोशिश है कि नवंबर में हो रहे इन विधानसभा चुनावों में ज्यादा से ज्यादा राज्य जीतकर गठबंधन में अपनी स्थिति ज्यादा प्रभावशाली बनाने के साथ ही भाजपा विरोध की धुरी भी बन जाए और इसका फायदा इस बार उसे उन राज्यों में लोकसभा चुनावों में मिले जिनमें पिछली बार उसका सफाया हो गया था।
इसीलिए इस बार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पूरी रणनीति लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है और चुनाव प्रचार में भी यह बात सामने आ रही है। कहा ये भी जा रहा है कि विधानसभा चुनावों के बाद राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ों यात्रा के दूसरे चरण के रूप में सघन जनसंपर्क के लिए निकल सकते हैं। इस बार उनका लक्ष्य उत्तर और पूर्वी भारत के राज्य होंगे जो पिछली यात्रा में छूट गए थे। अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा विरोधी माहौल की धुरी राहुल गांधी को बनाने की पूरी कोशिश करेगी। लेकिन यह सब विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की सफलता किस हद तक होगी, उस पर निर्भर करेगा।