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कांग्रेस: नए और पुराने नेताओं में तालमेल की जड़ी बूटी खत्म हो गई? हर राज्य में विरोधाभास

Tue, 20 Jul 2021 04:05 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कांग्रेस के बैनर और अनुशासन से ऊपर होते जा रहे हैं नेता। लगातार कमजोर हो रहा है केन्द्रीय नेतृत्व का रुतबा
 
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कांग्रेस: फाइल फोटो - फोटो : ANI
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विस्तार
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कांग्रेस एक संक्रमण के दौर से गुजर रही है। इस समय पार्टी करीब-करीब हर राज्य में एक राजनीतिक विरोधाभास की शिकार है। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री का पद या मनमाफिक रुतबा नहीं मिला तो कांग्रेस की सरकार गिराकर भाजपा में चले गए। राजस्थान में पिछले छह महीने में दो बार सचिन पायलट गहलोत सरकार के खिलाफ बगावती तेवर अपनाकर विरोध जता चुके हैं। क्या कांग्रेस के पास अपने नए और पुराने नेताओं में तालमेल बनाए रखने वाली बूटी खत्म हो गई है?

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पंजाब में खिंच रही है तलवार, हार रही है जीती बाजी
ताजा मामला पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू का है। कैप्टन और सिद्धू में ठन गई है। ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से नवजोत सिंह सिद्धू शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरी तरफ कैप्टन अपने प्रदेश अध्यक्ष को फूटी आंखों देखना नहीं चाहते। यह भी एक प्रयोग ही है कि अपने नेताओं को मनाने के लिए कांग्रेस को पंजाब में चार कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाने पड़े हैं।

अमरिंदर व सिद्धू में बड़ा फर्क 
लुधियाना में डॉ. अरुण धवन और डॉ. सविता धवन कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता हैं। डा. धवन दंपति कहते हैं कि किसान आंदोलन के बाद पूरे पंजाब में कांग्रेस ने काफी मजबूत राजनीतिक पकड़ बना ली थी, लेकिन हमारे दो धुरंधर नेताओं की लड़ाई में सब कुछ धूमिल हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। कैप्टन के खेमे के एक करीबी नेता का कहना है कि इसकी जिम्मेदार तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। उन्हें समझना चाहिए था। कैप्टन अमरिंदर सिंह और सिद्धू में बड़ा फर्क है। वह तो सिद्धू को सिर पर बिठाने की कोशिश कर रही हैं। सूत्र का कहना है कि सिद्धू से पुराने और बड़े कांग्रेसी नेता पार्टी में हैं। आखिर उन्हें तरजीह क्यों नहीं दी गई? कैप्टन के खेमे से आ रही यह आवाज पंजाब में कांग्रेस के भविष्य के अंधकार की तरह बढ़ने का संकेत कर रही है।

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100 साल से अधिक पुरानी पार्टी है, काफी कुछ ढोना पड़ता है

पार्टी के एक महासचिव कहते हैं कि कांग्रेस 100 साल से अधिक पुरानी और सबको साथ लेकर चलने वाली लोकतांत्रिक पार्टी है। सूत्र का कहना है कि हम कोई तानाशाह नहीं हैं। बहुत कुछ परंपराएं लेकर चलनी पड़ती है। वहीं एक पूर्व महासचिव का कहना है कि परंपरा लेकर चलने वाले से पूछ लीजिए कि हासिल क्या हुआ? पूर्व महासचिव का कहना है कि मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि हम रास्ते से भटके थे, भटकते चले जा रहे हैं। जब तक हम राजनीति में समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाएंगे, भटकाव बना रहेगा। पूर्व महासचिव को कभी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और वर्तमान कार्यवाहक अध्यक्ष का भरपूर विश्वास हासिल था। अभी भी दोनों उनपर भरोसा करते हैं और वह पार्टी के कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं। 

नाम न छापने की शर्त पर कर्नाटक के एक नेता का कहना है कि यही कांग्रेस पार्टी की नियति बन गई है। जो फैसले समय पर लेने चाहिए, वह नहीं हो पाते। जिनके लिए कुछ इंतजार किया जाना चाहिए, वह पहले ले लिए जाते हैं। वह कहते हैं कि इस समय संगठनात्मक स्तर पर कुछ बड़े और कड़े फैसले लेने की जरूरत है। ये फैसले लंबे समय से अटके हैं। इसका असर पार्टी के कामकाज पर पड़ रहा है, लेकिन नहीं लिए जा रहे हैं। वहीं पंजाब में कैप्टन की जिद और नवजोत सिंह सिद्धू के दबाव में पार्टी ने समस्या का इस तरह से हल निकाल दिया। कई राज्यों में तो हमने ऐसे नेताओं के हाथ में कमान दे दी है, जिसका अभी तक पार्टी का निचला कार्यकर्ता नाम ही नहीं जानता।

क्या कांग्रेस अध्यक्ष पद का रुतबा घट रहा है?

कांग्रेस अध्यक्ष पद का रुतबा घटने के सवाल पर एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री कहते हैं कि इसका जवाब देना मुश्किल है। इसे बस इतने से समझिए कि जब आप सत्ता में होते हैं तो एक हनक होती है। सब आपकी सुनते हैं। जब आप बाहर होते हैं तो स्थितियां बदल जाती हैं। एक राज्यसभा सांसद का कहना है कि इस तरह के सवाल पर कांग्रेस का कोई नेता हां कैसे कह देगा? कांग्रेस अध्यक्ष के निर्णय लेने, संदेश भिजवाने, बात करने के बाद भी यदि पार्टी का कोई नेता अपनी चलाना चाहता है तो इसका अर्थ आप खुद लगा सकते हैं। हालांकि वह इसमें एक बात और जोड़ते हैं। कहते हैं कि राजनीति में लोग अपने लिए ज्यादा जीने लगे हैं। वह इसके लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद का उदाहरण देते हैं। राज्यसभा सदस्य का कहना है कि हमारे ये दोनों युवा नेता कांग्रेस अध्यक्ष के परिवार के सदस्य की तरह से थे, लेकिन पार्टी छोड़कर चले गए।
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मोदी विरोध के साथ-साथ संगठन पर ध्यान देना होगा

पार्टी के बारे में पूछने पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री कहते हैं कि मेरे विचार में एक बड़ी गलती हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को घेरने के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के संगठन और जमीन के स्तर से बदलाव पर विशेष ध्यान देना होगा। हमारी पार्टी ऐसा नहीं कर पा रही है। यह केवल प्रधानमंत्री मोदी की कटु आलोचना करके भाजपा से राजनीतिक मुकाबला करना चाहती है। पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है कि ऐसा करके हम भाजपा से चुनाव नहीं जीत सकते। सूत्र का कहना है कि कोरोना संक्रमण जैसी विसंगतियां हैं, फिर भी सावधानी के साथ आगे तो बढ़ना ही होगा। बिना संगठन में धार दिए कांग्रेस जैसी पुरानी राजनीतिक पार्टी को अपना लक्ष्य नहीं मिल सकता।
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