पार्टी के एक महासचिव कहते हैं कि कांग्रेस 100 साल से अधिक पुरानी और सबको साथ लेकर चलने वाली लोकतांत्रिक पार्टी है। सूत्र का कहना है कि हम कोई तानाशाह नहीं हैं। बहुत कुछ परंपराएं लेकर चलनी पड़ती है। वहीं एक पूर्व महासचिव का कहना है कि परंपरा लेकर चलने वाले से पूछ लीजिए कि हासिल क्या हुआ? पूर्व महासचिव का कहना है कि मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि हम रास्ते से भटके थे, भटकते चले जा रहे हैं। जब तक हम राजनीति में समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाएंगे, भटकाव बना रहेगा। पूर्व महासचिव को कभी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और वर्तमान कार्यवाहक अध्यक्ष का भरपूर विश्वास हासिल था। अभी भी दोनों उनपर भरोसा करते हैं और वह पार्टी के कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं।
नाम न छापने की शर्त पर कर्नाटक के एक नेता का कहना है कि यही कांग्रेस पार्टी की नियति बन गई है। जो फैसले समय पर लेने चाहिए, वह नहीं हो पाते। जिनके लिए कुछ इंतजार किया जाना चाहिए, वह पहले ले लिए जाते हैं। वह कहते हैं कि इस समय संगठनात्मक स्तर पर कुछ बड़े और कड़े फैसले लेने की जरूरत है। ये फैसले लंबे समय से अटके हैं। इसका असर पार्टी के कामकाज पर पड़ रहा है, लेकिन नहीं लिए जा रहे हैं। वहीं पंजाब में कैप्टन की जिद और नवजोत सिंह सिद्धू के दबाव में पार्टी ने समस्या का इस तरह से हल निकाल दिया। कई राज्यों में तो हमने ऐसे नेताओं के हाथ में कमान दे दी है, जिसका अभी तक पार्टी का निचला कार्यकर्ता नाम ही नहीं जानता।
कांग्रेस अध्यक्ष पद का रुतबा घटने के सवाल पर एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री कहते हैं कि इसका जवाब देना मुश्किल है। इसे बस इतने से समझिए कि जब आप सत्ता में होते हैं तो एक हनक होती है। सब आपकी सुनते हैं। जब आप बाहर होते हैं तो स्थितियां बदल जाती हैं। एक राज्यसभा सांसद का कहना है कि इस तरह के सवाल पर कांग्रेस का कोई नेता हां कैसे कह देगा? कांग्रेस अध्यक्ष के निर्णय लेने, संदेश भिजवाने, बात करने के बाद भी यदि पार्टी का कोई नेता अपनी चलाना चाहता है तो इसका अर्थ आप खुद लगा सकते हैं। हालांकि वह इसमें एक बात और जोड़ते हैं। कहते हैं कि राजनीति में लोग अपने लिए ज्यादा जीने लगे हैं। वह इसके लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद का उदाहरण देते हैं। राज्यसभा सदस्य का कहना है कि हमारे ये दोनों युवा नेता कांग्रेस अध्यक्ष के परिवार के सदस्य की तरह से थे, लेकिन पार्टी छोड़कर चले गए।
पार्टी के बारे में पूछने पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री कहते हैं कि मेरे विचार में एक बड़ी गलती हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को घेरने के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के संगठन और जमीन के स्तर से बदलाव पर विशेष ध्यान देना होगा। हमारी पार्टी ऐसा नहीं कर पा रही है। यह केवल प्रधानमंत्री मोदी की कटु आलोचना करके भाजपा से राजनीतिक मुकाबला करना चाहती है। पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है कि ऐसा करके हम भाजपा से चुनाव नहीं जीत सकते। सूत्र का कहना है कि कोरोना संक्रमण जैसी विसंगतियां हैं, फिर भी सावधानी के साथ आगे तो बढ़ना ही होगा। बिना संगठन में धार दिए कांग्रेस जैसी पुरानी राजनीतिक पार्टी को अपना लक्ष्य नहीं मिल सकता।