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मराठवाड़ा: पानी के साथ संवेदनाएं भी सूख रही हैं

Tue, 12 Apr 2016 05:59 PM IST
राहुल सांकृत्यायन/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : Getty Images
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महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में पानी तो 1% के नीचे चला ही गया है साथ ही साथ यहां मानवीय संवेदनाएं भी सूख चुकी है। कागजों पर नेक दिखने वाले सरकारी इरादे, हकीकत की जमीन पर उतरते ही अफसरों और बाबुओं के भ्रष्टाचार का शिकार हो जाते हैं। फसल बीमा का पैसा तब मिलता है जब घर के आंगन से कोई लाश उठती है। पानी के टैंकर 600 की जगह 7000 रुपए में मिल रहे हैं। आइए जानते हैं कि सूखे की मार के बाद किस हाल में है स्मारकों और इमारतों वाला मराठवाड़ा-
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मराठवाड़ा के सात हजार से ज्यादा गांव भयंकर सूखे की चपेट में हैं। लोगों का बुरा हाल है। रोजी रोटी की तलाश में गांव के गांव खाली हो चले हैं। हालात ये है कि गांवों में लोग कम और ताले ज्यादा हैं। सबकी उम्मीद सिर्फ उस आसमान की ओर है जहां से पानी का एक बूंद तक नहीं टपका है। इंसान तो इंसान है, कहीं भी आ-जा सकता है, लेकिन जानवर क्या करें? उनके लिए तो चारा भी नसीब होना मुश्किल हो गया है।

यूं तो मराठवाड़ा में इलाके के लोग मौजूद इमारतों और स्मारकों पर गर्व करते हैं लेकिन जब सूखे और अकाल की बात शुरु होती है तो सारा नशा काफूर हो जाता है। बात करते हैं यहीं के जालना जिले की जहां घाड़ेवाली झील से क्षेत्र को कभी 4 करोड़ लीटर पानी मिलता था लेकिन अब ये सपना बन चुका है। पानी को लेकर बढ़ते विवाद के कारण इलाके में पानी पर धारा 144 लगा दी गई है।
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बात करें औरंगाबाद में गोदावरी नदी पर बने जायकवाड़ी बांध की तो यह औरंगाबाद और जालना में पानी की सारी ज़रूरतें पूरी करता है लेकिन इस साल मार्च में ही इस जलाशय में इतना पानी नहीं बचा कि उसे काम में लाया जा सके। कभी इस जलाशय में 30 % पानी हुआ करता था, वहां अब यह प्रतिशत शून्य पर पहुंच चुका है। बीते साल इस समय यहां पानी 13% तक था। इस इलाके में तीन साल से बारिश के कहीं कोई नामोनिशां नहीं है।

निगाहें आसमान से ज्यादा सरकार की ओर

- फोटो : Getty Images
फसलें बुरी तरह से खराब हो चुकी हैं, पीने का पानी है ही नहीं और अब निगाहें आसमान से ज्यादा सरकार की ओर हैं। मराठवाड़ा के इन इलाकों में हालात यहां तक पहुंच चुका है कि पानी की कमी के चलते लोग अब किडनी और पथरी के रोगों का सामना कर रहे हैं। मराठवाड़ा के लातूर जिले में प्रशासन टैंकरों से पानी की सप्लाई कर रहा है। यह पानी साफ नहीं है। पानी की कमी के कारण लोग बोर वैल का पानी पी रहे हैं।

बोर वैल के पानी में नमक, कैल्शियम और ओकलेट्स की भारी मात्रा होती है। इससे लोगों को किडनी में पथरी बनने की संभावना बढ़ जाती है। इलाके में पानी की कमी के साथ ही बढ़ती गर्मी इन्हें और परेशान कर रही है एवं रोगों को न्योता दे रही है। मराठवाड़ा के औरंगाबाद, लातूर, ओस्मानाबाद, नांदेड, परभणी जिला, बीड, हिंगोली और जालना जिलों में पानी का संकट बड़ी मात्रा में है।

यहां के बीड़ जिले की बात करें तो लोग पानी का टैंकर देखते ही एक दूसरे पर टूट पड़ते हैं। महिलाएं लड़ने लगती है। यहां के 11 तालुको में लोगों को 15 दिनों पर कहीं पानी देखना नसीब होता है। यहां के लोग तो अब अगले साल के लिए पानी का संकट हल करने के लिए अभी से तैयारी कर रहे हैं। लोग पानी की तलाश में 30 फीट गहरे कुएं में उतर रहे हैं ताकि कहीं से पानी की धारा उन्हें फूटती दिख जाए।

इस अकाल के चलते जहां लोगों को पानी की कमी देखनी पड़ रही है वहीं किसान आत्महत्या भी कर रहे हैं। पूरे मराठवाड़ा की बात करें तो इस साल अब तक 273 किसानों ने खुदखुशी कर ली है। देखा जाए तो हर महीने लगभग 90 किसानों ने आत्महत्या की है। पूरे महाराष्ट्र के 43 हजार गांवों में से 27 हजार, 723 गावों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया है और मराठवाड़ा में सिर्फ 5 फीसदी पानी बचा है।

मराठवाड़ा के 25 लाख किसान इस संकट से परेशान होकर गांवों से पलायन कर चुके हैं। महाराष्ट्र के तीन हजार गांवों में पीने के पानी टैंकरों के जरिये पहुंचाया जा रहा है जो आवश्यकता से बहुत कम है। हालात इस हद तक खराब है कि गांव वालों और वहां के किसानों को उनके इस दुर्दिन में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ रहा है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक यहां के सूखाग्रस्त इलाकों में पीने के पानी का एक टैंकर सात हजार में बेचा जा रहा है और रसीद आठ सौ रुपयों की ही काटी जा रही है।

और अरुण ने थाम लिया मौत का दामन

- फोटो : Getty Images
केंद्रीय जल आयोग की मानें तो मराठवाड़ा इलाके के तीन सबसे बड़े जलाशयों में पानी का स्तर खतरे से काफी नीचे पहुंच चुका है। 31 मार्च को मराठवाड़ा इलाके के जायकवाड़ी बांध में स्टोरेज लेवेल डैम के लाइव स्टोरेज कैपेसिटी के शून्य फीसदी तक गिर गया। यानी यह जलाशय अब किसी काम का नहीं रहा। दूसरे जलाशयों की हालत भी काफी खराब हो चुकी है। येलडारी डैम में स्टोरेज लेवेल डैम की स्टोरेज कैपेसिटी का 4 फीसदी और इसापुर डैम में स्टोरेज लेवेल डैम की स्टोरेज कैपेसिटी का सिर्फ 14 फीसदी रह गया है। दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून दो महीने दूर है। इससे यह बात साफ हो चली है कि मराठवाड़ा में पानी का संकट आने वाले दिनों में और गहराता जाएगा। बढ़ती गर्मी और तापमान का पारा जब 45 पार हो जाए तो आप खुद समझ सकते हैं बिना पानी के वहां के लोगों का क्या हाल होगा।

संभव है कि कहने वाले यह कह दें कि सूखा और अकाल जलवायु परिवर्तन की देन है लेकिन सरकारी मदद पर ही जब सवाल उठने लग जाएं तो यह समझने में देर नहीं लगती कि दाल में कुछ तो काला है ही। मराठवाड़ा के बीड़ में सूखे से प्रभावित किसानों के लिए सरकारी मदद का आलम ये है कि फसल बीमा योजना की रकम मिलने में एक तो देर होती है और दूसरे इसके लिए परेशानी अलग से झेलनी पड़ती है।

देखा जाए तो सरकारी इरादे सिर्फ कागज पर ही नेक दिखते नजर आ रहे हैं। बीते साल यहीं के अरुण की फसल बर्बाद हो गई। उन पर करीब दो लाख का कर्ज तो था ही परिवार का भूख मिटाने की जिम्मेदारी अलग से थी। सरकार की ओर से फसल बीमा के मिलने वाले 11 हजार रुपए के लिए अरुण बेहद परेशान थे और बार बार बैंक जाते थे लेकिन उन्हें पैसा नहीं मिला। आखिरकार उन्होंने मौत का दामन थाम लिया। मौत के बाद उनके परिवार वालों को 11,000 रुपए मिल गए लेकिन मुआवजा अब तक नहीं मिला है। यहां के किसानों का कहना है कि प्रशासन का यह रवैया किसानों को खुदकुशी की ओर ढकेल रहा है। किसानों का कहना है कि ऐसे दुर्दिन में अब केवल चाराघर ही उनका सहारा है। सरकारी चाराघर ही ऐसी जगह है जहां उन्हें पूरे दिन पानी मिलता है। अपने जानवरों के साथ-साथ उन्होंने अपना घर भी वहीं बसा लिया है और दूध बेचकर कुछ पैसा कमा लेते हैं।
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अब जानवर हैं आखिरी उम्मीद?

सच कहना चाहें तो यह भी कह सकते हैं कि अब जानवर ही सूखाग्रस्त इलाकों में रह रहे लोगों की आखिरी उम्मीद बन चुके हैं। जालना के चरवाहे ईश्वर का कहना है कि जब पानी का इंतजाम खत्म हो जाता है तो वो अपनी भैसों को बेच देते हैं। ऐसा वो ही नहीं बल्कि और लोग भी करते हैं, क्योंकि सरकारी मुआवजे में देरी और खाने के लिए अनाज न होने पर वो इसी के सहारे अपनी जिंदगी काट रहे हैं। इस इलाके में लगभग सारे बाजार बंद कर दिए गए हैं।

इलाके के लोगों ने अपने खर्च कम कर दिए। लोग कहीं घूमने-फिरने नहीं जा रहे हैं, किसी जश्न में शामिल नहीं हो रहे हैं ताकि ज्यादा पानी खर्च न हो। सभी लोगों ने अनाज खरीदने की मात्रा कम कर दी है। दिन-ब-दिन गरीब होते जा रहे लोग, धीरे-धीरे पूरी तरह से सरकारी मुआवजों और मदद पर आश्रित हो चले हैं। बात महाराष्ट्र के विदर्भ की करें तो यहां भी सूखे ने अपना डेरा डाल रखा है। यहां हालात और भी ज्यादा खराब हैं। जल संकट के साथ-साथ किसानों की आत्महत्या की मार झेल रहे विदर्भ के इलाके में इन दिनों आईपीएल के मैच हो रहे हैं।

कितना अजीब है न कि जिन सरकारों को जनता अपना सब कुछ मान बैठती है उनके लिए सरकारों को फैसला लेने में कोर्ट की ओर आदेश का इंतजार रहता है। इस समय देश के 9 राज्य सूखे से पीड़ित है। आए दिन अदालतें अपने फैसलों से सरकरों को फटकार लगाती हैं तब जाकर कहीं सरकारों की आंख खुलती है। मराठवाड़ा में बीते रविवार को रेलवे के तेल वाले टैंकरों से पीने का साफ पानी भेजा गया है। ध्यान रहे कि रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इसे ट्वीट भी किया है।

सूखे के इस हालात में बीसीसीआई के सेक्रेटरी और भारतीय जनता पार्टी के नेता अनुराग ठाकुर ने महाराष्ट्र सरकार से आईपीएल मैचों के संबंध में कहा था कि यह सरकार तय करे कि उसे 100 करोड़ चाहिए या फिर पानी? ये सवाल बताता है कि जमीन से पानी, गांव वालों की आंख से आंसू ही नहीं बल्कि देश की राजनीति से संवेदनाएं भी सूख चुकी है। वो भी तब जबकि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार है।
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