सार
नेचर जर्नल में प्रकाशित एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि तेल, गैस और कोयला कंपनियों के उत्सर्जन ने 2000 से 2023 के बीच दर्ज हीटवेव की तीव्रता को औसतन 50% तक बढ़ा दिया। भारत की 2022 की लू सहित 213 घटनाओं का विश्लेषण कर वैज्ञानिकों ने चेताया कि कई लू मानवजनित जलवायु परिवर्तन के बिना संभव नहीं थीं।
जलवायु परिवर्तन को लेकर चेतावनी अब और भी गंभीर हो गई है। कारण है कि एक ताजा अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में दावा किया गया कि तेल, गैस और कोयला जैसी जीवाश्म ईंधन उत्पादक कंपनियों के उत्सर्जन ने दुनिया भर में हीटवेव यानी लू की तीव्रता को औसतन 50 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है। रिसर्च के मुताबिक कई ऐसी भीषण गर्मी की घटनाएं हैं जो मानवजनित जलवायु परिवर्तन के बिना हो ही नहीं सकती थीं। यह अध्ययन प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ है और इसमें 2000 से 2023 के बीच दुनिया में दर्ज 213 हीटवेव का विश्लेषण किया गया है। इसमें भारत में 2022 में पड़ी भयंकर लू भी शामिल है।
बता दें कि शोधकर्ताओं ने दुनिया की 180 सबसे बड़ी कार्बन मेजर कंपनियों की भूमिका का अध्ययन किया। इनमें सऊदी अरामको, रूस की गजप्रोम, शेवरॉन, और कोयले पर निर्भर भारत और चीन जैसे देश शामिल हैं। रिसर्च में पाया गया कि इन कंपनियों के उत्सर्जन ने न सिर्फ हीटवेव को और अधिक तीव्र बनाया, बल्कि कई घटनाएं तो ऐसी थीं जो जलवायु परिवर्तन के बिना लगभग असंभव होतीं।
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हीटवेव की बढ़ती तीव्रता के लिए जिम्मेदार कौन?
अध्ययन में इस बात पर जोर दिया गया कि सभी हीटवेव की तीव्रता में आधे बदलाव के लिए कार्बन मेजर्स जिम्मेदार हैं। बताया गया कि वर्ष 2000–2009 के दौरान, मानवीय कारणों से हीटवेव की संभावना 20 गुना बढ़ी। जो कि 2010–2019 में यह संभावना बढ़कर 200 गुना हो गई। ऐसे में कुछ कंपनियों की वजह से 16 से 53 हीटवेव ऐसी हुईं जो बिना जलवायु परिवर्तन के संभव ही नहीं थीं।
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अब समझिए क्यों है यह रिपोर्ट अहम?
गौरतलब है कि इस अध्ययन को यह विश्लेषण करता है कि किस हद तक जलवायु परिवर्तन ने किसी आपदा जैसे हीटवेव को प्रभावित किया। ऐसे अध्ययन अब कानूनी और नीतिगत स्तर पर जवाबदेही तय करने के लिए अहम माने जा रहे हैं। ऐसे में रिसर्चरों ने कहा कि भले ही कुछ कंपनियां छोटी हों, लेकिन उनका भी योगदान हीटवेव जैसी आपदाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण रहा है। जलवायु परिवर्तन अब केवल वैश्विक बहस नहीं, बल्कि इसके पीछे की जिम्मेदार इकाइयों की पहचान और जवाबदेही का सवाल बन चुका है।