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CJI: अयोध्या पर 'सुप्रीम' फैसले में जज का नाम क्यों नहीं? समलैंगिक शादी केस पर भी बोले; चीफ जस्टिस का इंटरव्यू

Mon, 01 Jan 2024 05:58 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

बीते तीन-चार साल के दौरान सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले चर्चित रहे हैं। इनमें अयोध्या का राम जन्मभूमि भूमि विवाद, जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना और समलैंगिक शादी की कानूनी वैधता पर फैसलों को बड़ी सुर्खियां मिलीं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने तमाम सवालों पर इंटरव्यू में विस्तार से जवाब दिया है।
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चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (फाइल) - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले नजीर बनते हैं। बीते पांच साल में कई ऐसे फैसले हुए जिनका अक्सर जिक्र होता है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ से पारित ऐतिहासिक फैसलों और उनसे जुड़े सवालों पर विस्तार से बात की है। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने समलैंगिक शादियों को कानूनी रूप से वैध मानने, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अलग-अलग पहलुओं पर बात की है। उन्होंने पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ के फैसले पर भी बात की।
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अयोध्या पर फैसले में जजों का नाम क्यों नहीं?
जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया, संघर्ष के लंबे इतिहास और राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद भूमि विवाद के विविध दृष्टिकोणों को ध्यान में रखते हुए, शीर्ष अदालत ने अयोध्या मामले पर एक स्वर में बोलने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि मुकदमे की संवेदनशीलता और फैसले के प्रभाव को देखते हुए अयोध्या मामले में न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से फैसला लिया कि अदालत के फैसले में किसी लेखक (authorship ascribed to judgement) की भूमिका तय नहीं की जाएगी।

क्या फैसले के बाद जजों को पछतावा होता है?
समलैंगिक विवाह पर शीर्ष अदालत के फैसले पर समाचार एजेंसी पीटीआई के साथ एक इंटरव्यू में सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, अदालतों की पीठ में शामिल जजों के लिए फैसला करना कभी भी व्यक्तिगत नहीं होता, कोई पछतावा भी नहीं होता। उन्होंने कहा, वह शीर्ष अदालत के फैसले की खूबियों पर टिप्पणी नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि समलैंगिक जोड़ों को अपने अधिकार हासिल करने के लिए 'लंबी और कठिन लड़ाई' लड़ी, इसे स्वीकार करना होगा। 
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न्यायाधीश की भूमिका पर क्या बोले CJI
बकौल चीफ जस्टिस चंद्रचूड़, 'एक बार किसी मामले का फैसला हो जाने के बाद आप खुद को परिणाम से दूर कर लेते हैं। मैं कई मुकदमों पर पारित फैसलों में बहुमत में रहा हूं। कई मामलों में अल्पमत में भी रहा हूं। लेकिन यह न्यायाधीश के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कभी भी खुद को मुकदमे से नहीं जोड़ना होता। फैसले के बाद, मैं मुकदमे को वहीं छोड़ देता हूं। बता दें कि अदालत ने समलैंगिक विवाह को कानूनी दर्जा देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, 17 अक्तूबर को सुनाए गए इस अहम फैसले में शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ने समलैंगिक लोगों के लिए समान अधिकार और उनकी सुरक्षा को मान्यता भी दी।

आलोचना से असर नहीं पड़ता, लोग अपनी राय बनाने के लिए आजाद
सीजेआई चंद्रचूड़ ने जम्मू-कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने के फैसले पर भी बात की। उन्होंने न्यायविदों और अन्य लोगों की आलोचना का जवाब देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश किसी मामले का फैसला 'संविधान और कानून के अनुसार' बहुत ही सख्ती से करते हैं। आलोचनाओं पर चीफ जस्टिस ने कहा, न्यायाधीश फैसलों के माध्यम से अपने मन की बात कहते हैं। अदालत के फैसले के बाद यह राय सार्वजनिक संपत्ति बन जाती है। एक स्वतंत्र समाज में लोग इसके बारे में अपनी राय बनाने के लिए आजाद हैं। उन्होंने कहा, 'मेरे लिए आलोचना का जवाब देना या अपने फैसले का बचाव करना उचित नहीं।'

कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी नहीं
उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाली कॉलेजियम प्रणाली का बचाव करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया की आलोचना करना बहुत आसान है। हालांकि, न्यायाधीश की नियुक्ति से पहले परामर्श की उचित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने के लिए कॉलेजियम हर संभव प्रयास कर रहा है। कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाना सही नहीं है। 

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की स्वतंत्रता पर चीफ जस्टिस का बयान
निष्पक्ष फैसले की भावना बनी रहे, लेकिन उन्हें कॉलेजियम को लेकर कुछ कहना चाहिए। यही उनकी आपत्ति (caveat) है। जब हम सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिए न्यायाधीशों के नाम पर विचार के दौरान हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के करियर का फैसला करना होता है। इसलिए कॉलेजियम के भीतर होने वाले विचार-विमर्श का विवरण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। कॉलेजियम की चर्चा में न्यायाधीशों की गोपनीयता भी अहम होती है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को अगर स्वतंत्र और स्पष्ट वातावरण में चर्चा करनी है तो वीडियो रिकॉर्डिंग या दस्तावेज तैयार नहीं किए जा सकते। इस प्रणाली को भारतीय संविधान ने अपनाया है। समाज की विविधता को ध्यान में रखते हुए यह भी महत्वपूर्ण है कि हम अपनी निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भरोसा करना सीखें।


अदालत की विश्वसनीयता पर भी बोले CJI चंद्रचूड़
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के मुताबिक अदालत की पीठ में शामिल जज का हस्ताक्षरित फैसला कारण साफ दिखाता है। मुझे भी इसे वहीं छोड़ देना चाहिए। सीजेआई ने 'बेंच हंटिंग' से जुड़े सवाल पर कहा, 'मेरे मन में यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता बरकरार रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पीठों में मामलों की सुनवाई या मुकदमों का आवंटन 'वकील की तरफ से संचालित' (lawyer-driven) नहीं होना चाहिए।

न्यायाधीशों की क्षमता पर भरोसा करना होगा
चीफ जस्टिस ने राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मामलों को सुप्रीम कोर्ट के विशेष न्यायाधीशों को सौंपे जाने के आरोपों पर कहा, मुकदमों का आवंटन सुप्रीम कोर्ट में निर्धारित प्रणाली के अनुसार किया जाता है। आपको न्यायाधीशों की क्षमता पर भरोसा करना होगा। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत में स्पष्ट तरीके से 'परिभाषित संरचनाएं' (well-defined structures) हैं। चीफ जस्टिस के मुताबिक उन्हें मास्टर ऑफ रोस्टर कहा जाता है। इसके अनुसार सुनवाई वाले मुकदमों की सूची (Cause List or Subject Matter) प्रकाशित करने के अधिकार मुख्य न्यायाधीश के पास होते हैं। सूची का अग्रिम प्रकाशन भी किया जाता है।

वकील इस बात पर जोर नहीं दे सकता कि विशेष ...
सीजेआई चंद्रचूड़ के मुताबिक, 'रोस्टर अधिसूचित होने के बाद सभी संबंधित लोग इसे देख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित होने के कारण यह सार्वजनिक होता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक न्यायाधीश को सीजेआई की तरफ से सौंपे गए किसी भी मामले पर निर्णय लेने का पूरा अधिकार होता है। चीफ जस्टिस ने दो टूक कहा कि कोई भी वकील इस बात पर जोर नहीं दे सकता कि उसके मुकदमे का फैसला अमुक जज की अदालत या किसी विशेष न्यायाधीश की पीठ में ही किया जाएगा। ऐसा करने पर न्यायाधीश की विश्वसनीयता या न्याय प्रशासन की शुचिता के साथ न्याय नहीं होगा।

दूसरी पीठ के पास कब जाता है केस
उन्होंने कहा कि अगर कोई न्यायाधीश किसी मामले से खुद को अलग कर लेता है तो सीजेआई इसे फिर से किसी वरिष्ठ या कनिष्ठ न्यायाधीश को सौंपते हैं। चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ के मुताबिक एक बार जब मामला न्यायाधीश को सौंप दिया जाता है, तो उसका फैसला उन्हें ही करना होता है। हालांकि, न्यायाधीश के बीमार पड़ने, अगले महीने ड्यूटी पर नहीं होने या मुकदमे की सुनवाई को लेकर अनिच्छा जाहिर करने पर मुकदमे को दूसरी पीठ में भेजा जाता है।
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