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मुख्यमंत्री बिहार के: जिस सीएम जिसने कहा- जहरीली मछली से जा सकती है मेरी जान; कामराज प्लान ने ले ली थी कुर्सी

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 27 Jun 2025 07:26 AM IST

सार

'मुख्यमंत्री बिहार के' पहले अंक में हमने राज्य के पहले सीएम रहे श्रीकृष्ण सिन्हा से जुड़े कुछ अनोखे किस्सों की बात की थी। अब इसी कड़ी में जुड़ते हैं बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री- बिनोदानंद झा से, जो कि अपने 2 साल और 226 दिन के कार्यकाल में लगातार सुर्खियों में रहे। 
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बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा। - फोटो : अमर उजाला
बिहार में सियासी सरगर्मी तेज होती जा रही है। साल अंत तक राज्य को नई सरकार मिलेगी। इसके साथ ही यह भी तय होगा कि मुख्यमंत्री का चेहरा बदेलगा या जाने परखे चेहरे को ही फिर मौका मिलेगा। इस चुनावी मौसम में अमर उजाला की खास सीरीज 'मुख्यमंत्री बिहार के' की दूसरी कड़ी में बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री- बिनोदानंद झा की बात करेंगे। 

उन्होंने अपने 2 साल और 226 दिन के कार्यकाल में लगातार सुर्खियां बटोरीं। कभी मुख्यमंत्री पद पाने के लिए जातीय समीकरण संभालने की वजह से तो कभी अपनी ही पार्टी के साथी सदस्यों पर अपनी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाकर। झा 1961 में श्रीकृष्ण सिन्हा के निधन के बाद कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए और शपथग्रहण के बाद से अपने पूरे कार्यकाल के दौरान अलग-अलग तरह से संघर्ष करते रहे। 


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बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा। - फोटो : अमर उजाला
बिहार में सियासी सरगर्मी तेज होती जा रही है। साल अंत तक राज्य को नई सरकार मिलेगी। इसके साथ ही यह भी तय होगा कि मुख्यमंत्री का चेहरा बदेलगा या जाने परखे चेहरे को ही फिर मौका मिलेगा। इस चुनावी मौसम में अमर उजाला की खास सीरीज 'मुख्यमंत्री बिहार के' की दूसरी कड़ी में बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री- बिनोदानंद झा की बात करेंगे। 

उन्होंने अपने 2 साल और 226 दिन के कार्यकाल में लगातार सुर्खियां बटोरीं। कभी मुख्यमंत्री पद पाने के लिए जातीय समीकरण संभालने की वजह से तो कभी अपनी ही पार्टी के साथी सदस्यों पर अपनी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाकर। झा 1961 में श्रीकृष्ण सिन्हा के निधन के बाद कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए और शपथग्रहण के बाद से अपने पूरे कार्यकाल के दौरान अलग-अलग तरह से संघर्ष करते रहे। 

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संविधान सभा के सदस्य भी रहे 
देवघर के बिनोदानंद झा संथाल परगना क्षेत्र में एक अहम चेहरे के तौर पर उभरे। झा मैथिली ब्राह्मण थे और उन्होंने इसी क्षेत्र से अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन आदि में हिस्सा लिया। कांग्रेस में शामिल होने के बाद 1924 से 1927 के बीच उन्होंने देवघर निकाय में सदस्य के तौर पर काम किया। 1936 में उन्हें बिहार विधानसभा के लिए चुना गया। इस दौरान वे राज्य में संसदीय सचिव के पद पर रहे। 1946 में बिनोदानंद झा विधानसभा में लौट गए। उन्होंने राज्य सरकार में कई विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इनमें स्वास्थ्य, श्रम और राजस्व मंत्रालय शामिल रहा। बिहार में उनके ही कार्यकाल में पंचायती राज कानून, 1947 पारित हुआ। इसके तहत बिहार को त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था मिली। 1949 में झा ने संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासियों की जमीन संरक्षण के लिए कानून पर काम किया था। बिनोदानंद झा ने भारत के संविधान को बनाने वाली संविधान सभा के सदस्य के तौर पर भी जिम्मेदारी निभाई।  


 

बिनोदानंद झा के शुरुआती दिनों का एक किस्सा भी काफी प्रचलित है। बताया जाता है कि 1934 में जब महात्मा गांधी देवघर पहुंचे थे, तो उनकी कार पर हमला हो गया था। यह हमला कुछ पंडों की तरफ से किया गया था, जो कि हरिजनों को मंदिर में प्रवेश दिए जाने के खिलाफ थे। खुद ब्राह्मण होने के बावजूद बिनोदानंद झा ने गांधीजी पर इस हमले की कड़ी निंदा की थी। बताया जाता है कि अपनी इस स्पष्ट छवि की वजह से कांग्रेस में उनकी पहचान और रुतबा तेजी से बढ़ा।

कैसे बिहार के मुख्यमंत्री बने बीएन झा?
बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा का 31 जनवरी 1961 को निधन हो गया। उनके निधन के बाद कांग्रेस के सामने विधायक दल का नेता चुनने की चुनौती पैदा हो गई। दरअसल, श्रीकृष्ण सिन्हा के मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी बिहार में जातिवाद की राजनीति का अपना अलग स्थान था। हालांकि, केंद्र के सिन्हा को समर्थन और उनकी खुद की मजबूत छवि की वजह से कांग्रेस में जाति के आधार पर धड़े तो जरूर बन चुके थे, लेकिन यह धड़े पर्दे के पीछे से ही फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश करते थे। 

हालांकि, एसके सिन्हा के निधन के बाद कांग्रेस में जातीय आधार पर बने धड़े सत्ता लपकने के लिए खुलकर आगे आ गए। इनमें एक धड़ा था ब्राह्मण नेता बिनोदानंद झा का, जो कि एक समय मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा को चुनौती देने वाले राजपूत नेता अनुग्रह नारायण सिंह के कैंप के करीबी थे। दूसरा धड़ा था- कायस्थ नेता कृष्ण बल्लभ सहाय का। कांग्रेस में एक और धड़ा भी था भूमिहार नेता महेश प्रसाद सिन्हा का।

बिहार में बिनोदानंद झा के मुख्यमंत्री बनने का सबसे बड़ा कारण 1957 से 1962 का वह दौर था, जब विधानसभा में कांग्रेस विधायकों का सबसे बड़ा हिस्सा पिछड़ा वर्ग से आता था। इसके बाद अनुसूचित जाति-जनजाति के विधायकों का समर्थन किसी भी नेता को सत्ता में लाने के लिए काफी था। बताया जाता है कि 1961 में एसके सिन्हा के निधन के बाद बिनोदानंद झा ब्राह्मण और पिछड़ा वर्ग को साथ लाने में सफल हुए। अनुग्रह नारायण सिंह का करीबी होने का भी उन्हें फायदा मिला और कांग्रेस के राजपूत नेता भी उनके साथ जुड़ गए। इसकी वजह से कायस्थ नेता केबी सहाय और भूमिहार नेता महेश प्रसाद सिन्हा का मुख्यमंत्री पद पर दावा कमजोर हो गया और बिनोदानंद झा बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री बन गए।

1962 के विधानसभा चुनाव में फिर मिली दूसरे धड़े से चुनौती
बिनोदानंद झा भले ही श्रीकृष्ण सिन्हा के बाद बिहार के मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए थे, लेकिन उनकी राह बिल्कुल भी आसान नहीं रही। दरअसल, बिहार में 1962 में विधानसभा चुनाव होने थे। इस चुनाव में अपने-अपने करीबियों को टिकट दिलाने के लिए सीएम झा, केबी सहाय और महेश प्रसाद सिन्हा तीनों ही कोशिशों में जुटे थे। इन तीनों के बीच विवाद को बढ़ता देख देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तब कांग्रेस की राज्य इकाई में टिकट बंटवारे को लेकर हो रहे विवाद का संज्ञान लिया और इसे सुलझाने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन कर दिया। इसमें सरदार स्वर्ण सिंह, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को शामिल किया गया।

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पीएम नेहरू द्वारा गठित इस कमेटी ने बिनोदानंद झा के मुख्यमंत्री होने का मान रखा और उनकी पसंद को ध्यान में रखते हुए केबी सहाय और दूसरे धड़ों के टिकट काट दिए गए। समिति के इस कदम के पीछे का तर्क यह था कि वह बिहार में एक नेता के अंतर्गत पार्टी ज्यादा मजबूत रहेगी और सत्ता के लेकर संघर्ष भी नहीं होगा। 

1962 के बिहार विधानसभा चुना में कांग्रेस को 318 में से 185 सीटें मिलीं। यह 1957 के 210 सीटों के आंकड़े से कुछ कम था। हालांकि, एंटी इन्कंबेंसी के मापदंड के मद्देनजर बीएन झा के प्रदर्शन को बेहतर बताया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री के चुनाव के लिए हुई कांग्रेस विधायक दल की बैठक, जिसमें एक बार फिर बीएन झा को चुनौती दे रहे थे केबी सहाय। झा ने एक बार फिर राजपूत और पिछड़ी जाति के विधायकों को अपने साथ मिला लिया और इस तरह दोबारा मुख्यमंत्री पद हासिल करने में सफलता पाई।



 

चुनाव जीतने के बाद एक गलती पड़ गई राजनीतिक करियर पर भारी
1962 के विधानसभा चुनाव में बिनोदानंद झा को भले ही जीत मिल गई थी, लेकिन उनकी आगे की राह कतई आसान नहीं हुई। कृष्ण बल्लभ सहाय के पोते राजेश सहाय ने अपने एक ब्लॉग में कहा था कि बिनोदानंद झा खुद जानते थे कि कृष्ण बल्लभ सहाय हार के बावजूद चुप नहीं रहेंगे। इसलिए कांग्रेस में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए सीएम रहते हुए झा ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) का वार्षिक अधिवेशन बिहार में आयोजित कराया। इस कार्यक्रम में बेहतर इंतजामों की वजह से बीएन झा ने तारीफ भी बटोरीं। 

सीएम बनने के बाद भी बीएन झा को घरेलू स्तर पर चुनौतियां मिलनी कम नहीं हुईं। केबी सहाय के धड़े ने बिनोदानंद झा से कैबिनेट में उन्हें जरूरी प्रतिनिधित्व देने की मांग की। अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए खुद सहाय भूमिहार नेता महेश प्रसाद सिन्हा के कैंप में शामिल हो गए। लेकिन सहाय को बड़ा झटका तब लगा, जब खुद सिन्हा ने कहा कि बिनोदानंद झा बिहार कांग्रेस विधायक दल के निर्विवादित मुखिया हैं और उनके पास अपना कैबिनेट चुनने का पूरा अधिकार है।

इस घटना के बावजूद केबी सहाय की तरफ से बिनोदानंद झा को चुनौतियां मिलना जारी रहीं। बिनोदानंद झा ने अपने मंत्रिमंडल में सहाय को शामिल भी किया। लेकिन दोनों के बीच तनाव जगजाहिर रहा। बताया जाता है कि इसी दौरान बीएन झा अपने प्रतिद्वंद्वियों को पूरी तरह खत्म करना चाहते थे और यहीं से हुआ एक ऐसा घटनाक्रम, जिसकी कीमत बीएन झा को अपनी कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़ी।

'जहरीली मछली' का वो कांड, जिसकी वजह से सीएम झा हुए 'कामराज्ड'
राजेश सहाय के ब्लॉग के मुताबिक, बिनोदानंद झा ने इस बीच एक शिकायत आगे बढ़ाई। उन्होंने अपनी शिकायत के पीछे राज्य के खुफिया विभाग की एक जांच रिपोर्ट का हवाला दिया। सीएम झा ने कहा कि उन्हें राज होटल से जहरीली मछली खिलाकर मारने की साजिश रची गई। जिस राज होटल का नाम बीएन झा ने लिया, वह उस वक्त केबी सहाय के करीबी विश्वनाथ वर्मा का था। मुख्यमंत्री की शिकायत में साजिश के पीछे राम लखन सिंह यादव का हाथ होने की बात कही गई थी और वे भी केबी सहाय के खास लोगों में से थे। 

राम लखन सिंह यादव ने 1998 में अपने संस्मरण में इस घटना का जिक्र भी किया। उन्होंने बताया था कि तब यह मामला प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक पहुंचा था। उन्होंने मुख्यमंत्री झा की ओर से लगाए गए आरोपों की जांच के लिए खुफिया विभाग के प्रमुख भोला नाथ मलिक से बात की। यादव ने संस्मरण में बताया कि आईबी प्रमुख और एक जांच अधिकारी ने इस मामले में कुछ महीने जांच की और बाद में मुख्यमंत्री की हत्या की साजिश रचने के आरोपों को निराधार पाया। यादव के मुताबिक, उनके साथ 36 और लोगों को क्लीन चिट मिल गई और पूरी जांच रिपोर्ट प्रधानमंत्री के पास पहुंची। 

बताया जाता है कि इस घटनाक्रम के बाद केंद्रीय नेतृत्व बिनोदानंद झा को हटाने का मन बना चुका था। हालांकि, केंद्र सरकार बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में मुख्यमंत्री के प्रभाव को देखते हुए उन्हें हटाने का तत्कालीन जोखिम नहीं लेना चाहती थी। ऐसे में कुछ समय बाद जब कांग्रेस के अनुभवी नेता कामराज नादर, जो कि कांग्रेस के संगठन को मजबूत करने के लिए अपना 'कामराज प्लान' लेकर आए, तब पार्टी को बिनोदानंद झा को मुख्यमंत्री पद से हटाने का बहाना मिल गया। 

कामराज प्लान का सार यह था कि जो भी कांग्रेसी नेता 10 साल से सत्ता में हैं और सरकार में पद संभाल चुके हैं, उन्हें सत्ता छोड़कर संगठन को मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए। इसी एवज में पहली कैंची मुख्यमंत्रियों पर चलना तय हुआ। जिन आठ मुख्यमंत्रियों को हटाकर संगठन में वरिष्ठ नेता के तौर पर लाने की लिस्ट बनी, उसमें एक नाम बिनोदानंद झा का भी था। बताया जाता है कि झा के अलावा तब जोर-जबरदस्ती से पांच और मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे हुए थे। इनमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र भानू गुप्ता, ओडिशा के सीएम बीजू पटनायक और मध्य प्रदेश के सीएम भगवंतराव मंडलोई का नाम शामिल था।

शुरुआत में तो बिनोदानंद झा कांग्रेस हाईकमान का आदेश मानने के लिए तैयार नहीं दिखे। हालांकि, स्थितियां बदलती देख उन्होंने अपने एक करीबी कोइरी नेता बीर चंद पटेल को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने की मांग रख दी। दूसरी तरफ बीएन झा की कमजोर होती स्थिति के बीच कृष्ण बल्लभ सहाय खुद सक्रिय हो गए। सहाय ने इस बार बिना कोई गलती करते हुए कायस्थ, कुर्मी-कोइरी और यादव जाति के नेताओं को अपने साथ मिलाने की कोशिशें शुरू कर दीं। उनकी यह कोशिशें रंग भी लाईं और बिहार में इस जातीय ढांचे को 'त्रिवेणी संगम' के तौर पर पहचाना गया। इस नई व्यवस्था के जरिए केबी सहाय ने ब्राह्मण-राजपूत और भूमिहार समूहों को मुश्किल में डाल दिया। आखिरकार इस जातीय राजनीति की बदौलत केबी सहाय बाद में बिनोदानंद झा की जगह लेने में सफल हुए। कुछ इस तरह बिनोदानंद झा के 2 साल 7 महीने तक चले शासन का अंत हुआ।
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