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छगन भुजबल: भूमि पुत्र से गिरफ्तारी तक

Tue, 15 Mar 2016 03:37 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री और एनसीपी के कद्दावर नेता छगन भुजबल को प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार कर लिया है। सोमवार को करीब 10 घंटे तक हुई पूछताछ के बाद निदेशालय ने उन्हें गिरफ्तार किया।
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दिल्ली में बने महाराष्ट्र सदन घोटाला मामले में उनको गिरफ्तार किया गया है। उन पर मनी लॉंड्रिंग का केस दर्ज किया गया था। महाराष्ट्र सदन घोटाले के मामले में छगन के भतीजे और पूर्व सांसद समीर भुजबल को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। पिछले महीने ईडी ने उनके बेटे पंकज भुजबल से लंबी पूछताछ की थी। वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर छगन भुजबल के राजनीतिक जीवन के उतार-चढ़ाव पर एक नजर दौड़ा रहे हैं।

90 के दशक के आख़िरी में राजनीति में पैसे की अहमियत बहुत बढ़ गई थी। छगन भुजबल ने पैसा इकट्ठा करने के लिए राजनीतिक ताक़त का इस्तेमाल शुरू कर दिया। यह बिल्कुल साफ है कि बिना राजनीतिक संरक्षण के वे इतना पैसा नहीं कमा सकते थे। लेकिन तभी उन्होंने राजनीतिक व्यवहारिकता खो दी। उन्होंने पार्टी के अंदर और बाहर अपने लिए कई दुश्मन बना लिए।
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लेकिन भयानक काली कमाई के आरोपों से जूझ रहे महाराष्ट्र के नेता छगन भुजबल का एक अलग ही तरह का व्यक्तित्व रहा है। वो बाला साहब ठाकरे के प्रिय थे और अगर क‌िस्मत साथ देती तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी बन सकते थे।

शरद पवार ने चली चाल

लेकिन या तो राजनीति को ठीक से नहीं समझ पाने के कारण या फिर शरद पवार की चालाकी की वजह से उन्होंने 1991 में शिवसेना का दामन लगभग 25 साल के बाद छोड़ दिया। शरद पवार जैसे राजनीति के माहिर खिलाड़ी भी भुजबल से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके थे। भुजबल ने इस बात को बड़ी खूबसूरती से उनके सामने रखा कि शिवसेना में दो फाड़ हो जाएंगे और इसका फायदा कांग्रेस उठाएगी।

शरद पवार उस वक्त कांग्रेस में थे और उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति का बेताज बादशाह माना जाता था। यहां तक कि विपक्षी भी उन्हें इसी नज़र से देखते थे। पवार का राजनीतिक करियर उथल-पुथल भरा रहा है। उन्होंने 1978 में पार्टी के अंदर ही विद्रोह कर दिया था और कांग्रेस के मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटील को गद्दी से हटा दिया था।

इसके बाद उन्होंने प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटीक फ्रंट(पीडीएफ) की नींव रखी जो कि उस वक़्त नई बनी कांग्रेस (एस) और कुछ सामाजवादियों और जन संघियों का गठबंधन था। इसलिए विद्रोह की उस राजनीति से उनका परिचय पुराना था जो राजनेता सत्ता पाने के लिए करते हैं। इसलिए उन्हें बहुत ही जल्द इस बात का पता चल गया कि दर्जन भर शिवसेना कार्यकर्ताओं के साथ छगन भुजबल का कांग्रेस में शामिल होना एक रणनीति थी।

1978-80 के दौरान पीडीएफ के दिनों में उन्होंने विपक्ष के साथ एक सेतु बनाने का काम किया था। हालांकि इसमें शिवसेना शामिल नहीं थी। पवार दोबारा 1986 में कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन सभी दलों से उनके अच्छे रिश्ते थे। आज भी ऐसा ही है। हालांकि उस वक़्त लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि उन पर आलाकमान का कोई नियंत्रण नहीं है।

1990 में जब पवार कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री बने थे और शिवसेना-बीजेपी गठबंधन चुनाव हार गई थी तो भुजबल परेशान हो गए थे। शिवसेना-बीजेपी गठबंधन को उम्मीद थी कि उन्हें 1990 के चुनाव में कम अंतर से ही सही लेकिन जीत हासिल होगी।

भुजबल को लगा बाला साहब ठाकरे के अर्शीवाद से बनेंगे सीएम

भुजबल को लग रहा था कि वे बाला साहब ठाकरे के आर्शीवाद और विश्वास की बदौलत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन जाएंगे। वो मुंबई के दो बार मेयर रहे। इस दौरान उनकी छवि एक सक्रिय और मेहनती शिवसेना कार्यकर्ता की रही।उनकी भाषण देने की काबिलियत और आम आदमी से जुड़ने की कला ने उन्हें मतदाताओं के बीच लोकप्रिय बना दिया। वो अन्य पिछड़ा वर्ग से आए बड़े नेता के तौर पर देखे जाते थे।

उनका मुंबई की सब्ज़ी मंडी के एक सब्ज़ी बेचने वाले परिवार से ताल्लुक़ है। इसलिए वो इस शहर की गरीबी, झुग्गी-झोपड़ी, गंदगी और प्रदूषण से अच्छी तरह से वाक‌िफ थे। मेयर के तौर पर उन्होंने 'ग्रीन एंड क्लीन मुंबई' के लिए अभियान चलाया।

उस वक्‍त मराठी मीडिया ने उनकी खूब तारीफ की थी। उन्होंने 1990 के चुनाव में शिवसेना के लिए कड़ी मेहनत की थी और सोचा था कि शिवसेना-बीजेपी गठबंधन की जीत होगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्हें लगा कि अब मंत्री बनने के लिए 1995 तक का इंतजार करना पड़ेगा।

इसलिए उन्होंने अपनी पार्टी छोड़कर सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया। यह एक साहसिक फ़ैसला था। वो जानते थे कि शिवसेना के कट्टर समर्थक उन पर हमला कर सकते हैं। पवार के साथ मजबूत संबंध बनाने के बाद और अपनी राजनीतिक और शारीरिक सुरक्षा को निश्चित करने के बाद ही उन्होंने पार्टी छोड़ने की घोषणा की।

9 डिग्री के भूकंप जैसा था भुजबल को यह कदम

भुजबल का यह कदम शिवसेना के लिए रिक्टर पैमाने पर 9 डिग्री के भूकंप के जैसा था। पवार ने उन्हें मंत्री बनाया जो उनके लिए एक नई राजनीतिक ऊंचाई पाने जैसा था और इससे उन्हें सुरक्षा भी मिली। उन्होंने सोचा था कि शिवसेना-बीजेपी गठबंधन कभी भी सत्ता में नहीं आएगी। लेकिन उनका यह अंदाजा गलत निकला।

दो साल के अंदर ही देश और राज्य की राजनीति ने करवट ली। मई 1991 में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई और संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया। इसने आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति के लिए दरवाजा खोल दिया।

हिंदुत्व के इस नई लहर पर सवार होकर शिवसेना-बीजेपी गठबंधन 1995 में महाराष्ट्र के अंदर सत्ता पर क़ाबिज़ हो गई। अगर भुजबल शिवसेना में होते तो बाला साहब उन्हें मुख्यमंत्री बनाते। शिवसेना प्रमुख ने कई बार इसे इशारों-इशारों में जाहिर भी किया था।

लेकिन भुजबल ने अपनी पुरानी पार्टी से मुक़ाबला करने का फैसला लिया। 1995 से लेकर 1999 के बीच वो विधानसभा के अंदर सबसे मुखर कांग्रेसी नेता थे। वो शिवसेना को अंदर से जानते थे और वो उसकी कमजोरियों से भी अच्छी तरह से वाकिफ थे।

भुजबल ने राजनीति को समझने में दूसरी गलती 1999 में की। उनके राजनीतिक मार्गदर्शक शरद पवार ने मई 1999 में कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। उस वक्त छगन भुजबल के पास कांग्रेस में ही रहने का या पवार की नई पार्टी एनसीपी में चले जाने का विकल्प मौजूद था। अगर वो पार्टी के साथ रह जाते तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के लिए उनके नाम पर पार्टी के आलाकमान की ओर से विचार किया जा सकता था।
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भुजबल ने तब सत्ता के लिए दूसरा रास्ता अख्तियार किया

एनसीपी बनने के बाद इस बात को लेकर बिल्कुल अनिश्चितता थी कि ये दोनों दल कभी एक साथ आएंगे। भुजबल ने बातचीत के जरिए दोनों को एक साथ लाने की भूमिका निभाई। कांग्रेस और एनसीपी ने एक साथ मिलकर सरकार बनाई। भुजबल उपमुख्यमंत्री भी बने। लेकिन उन्हें जल्द ही इस बात का अहसास हुआ कि वे इससे आगे नहीं बढ़ पाएंगे।

वो मराठा नहीं थे बल्कि ओबीसी समुदाय से थे। महाराष्ट्र में क़रीब 35 फ़ीसदी मराठा आबादी है और उन्हें स्वभाविक रूप से राज्य का शासक वर्ग समझा जाता है। भुजबल ने तब सत्ता के लिए दूसरा रास्ता अख्तियार करने का फैसला लिया। राजनीतिक ताकत और गठजोड़ पैसे से कायम रखा जा सकता है।

लेकिन ईर्ष्या और लालच उनके लिए अभिशाप बन गए। न उनकी पार्टी, न उनका राजनीतिक कौशल, न उनकी जाति और न ही व्यवस्था को अपने हाथों में रखने की उनकी क़ाबिलियत उन्हें बचा पा रही है। वो अकेले और अलग-थलग पड़े हुए हैं। वो यह नहीं कह सकते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है क्योंकि उन्होंने सत्ता और पैसा धोखे से ही हासिल की थी।
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