जैव विविधता की भरमार वाले हिमालयी क्षेत्र में हो रहे पर्यावरण परिवर्तन के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यह चेतावनी दी है हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफसर एसपी सिंह ने। सिंह ने सीएसआईआर राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) लखनऊ द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर आयोजित वेबीनार को संबोधित करते हुए कहा कि हिमालय क्षेत्र में 10 हजार से अधिक वनस्पति की प्रजातियां मिलती हैं।
जिसमें बड़ी संख्या में औषधीय गुणों वाले पौधे भी हैं, लेकिन अब इन पर भी पर्यावरण में हो रहे बदलाव का असर पड़ने लगा है। उन्होंने कहा गंगा के विस्तृत मैदानी इलाके में मानवीय गतिविधियों की भरमार के चलते प्रदूषण बढ़ा है। इसके चलते हिमालय के पर्यावरण को काफी नुकसान हो रहा है।
हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की दर अलग अलग देखी जा रही है। पश्चिम हिमालय में पूर्वी हिमालय की तुलना में ग्लेशियरों पर अधिक प्रभाव देखने के मिल रहा है। इसके चलते 50 से अधिक ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। इसका सीधा असर हिमालय में वनस्पतियों के मौसमी जैविकी पर स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है।
इतना ही नहीं पर्यावरण परिवर्तन का प्रभाव उच्च हिमालयी क्षेत्रों के वनों के साथ-साथ निचले हिमालयी क्षेत्रों की फसलों पर भी पड़ रहा है। एनबीआरआई के निदेशक प्रोफेसर एस के बारिक ने इस बार पर्यावरण दिवस की थीम स्वागत करे जैव विविधता पर बोलते हुए कहा कि संस्थान पर्यावरण की सुरक्षा के साथ देश में जैव विविधता के संवर्धन के लिए सदैव तत्पर है।
प्रोफेसर सिंह ने कहा दुनिया के स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभावों मनुष्यों, वनस्पतियों और पशु-पक्षियों सभी पर पड़ रहा है। इसलिए हमें इन बदलावों के साथ जीने की कला सीखने के साथ इनके साथ अनुकूलन स्थापित करने के उपाय भी खोजने होंगे।