पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण में रविवार को जिस उत्तर बंगाल में मतदान होना है, वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। खासकर डुआर्स इलाके की 20 सीटों पर ममता की साख दांव पर है। इलाके के बंद चाय बागानों में कुपोषण और भुखमरी से सैकड़ों मौतें हो चुकी हैं, लेकिन ममता ने अपने हाल के चुनावी दौरे में दावा किया कि भुखमरी से किसी की मौत नहीं हुई है। इससे मजदूरों में भारी नाराजगी है। यह चुनाव निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
इस दौर की अहमियत को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर सोनिया गांधी, सीताराम येचुरी और ममता बनर्जी तक इलाके में चुनावी रैलियों को संबोधित कर चुके हैं। इलाके के वोटरों में आदिवासियों के अलावा छोटी-बड़ी 60 जनजातियों के लोगों की भरमार है। देश में सबसे कम मजदूरी इसी इलाके में है। अब चुनावी सीजन में तमाम राजनीतिक चाय मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ा कर 332 रुपये प्रतिदिन करने के वादे कर रहे हैं, लेकिन इन मजदूरों का भरोसा अब राजनीतिक दलों से उठ चुका है।
इलाके में एक दशक से बंद पड़े रेड बैंक चाय बागान की महिला मजदूर पंचमी मुंडा कहती हैं कि तृणमूल कांग्रेस सरकार ने भी हमारे लिए कुछ नहीं किया। वह सिर्फ दो रुपये किलो चावल व आटा के साथ 1500 रुपये महीने देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती हैं।
मुंडा के मुताबिक, बागानों में पीने के पानी या स्वास्थ्य की कोई सुविधा नहीं है। तृणमूल कांग्रेस दक्षिण बंगाल में तो मजबूत है, लेकिन उत्तर बंगाल में उसे वाम मोर्चा, कांग्रेस और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है।